बेंगलुरु। कर्नाटक में गंभीर सूखे की स्थिति को लेकर राज्य सरकार ने केंद्र से समय पर सहायता उपलब्ध कराने की अपील की है। डिप्टी सीएम और रेवेन्यू मिनिस्टर जी. परमेश्वर ने शनिवार को राज्य का दौरा कर रही इंटर-मिनिस्टीरियल सेंट्रल टीम (IMCT) से सूखे से प्रभावित क्षेत्रों का निष्पक्ष और व्यापक आकलन करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि राज्य के कई हिस्सों में खेती और बागवानी को भारी नुकसान हुआ है, जबकि ग्रामीण इलाकों में पेयजल और आजीविका से जुड़ी समस्याएं भी बढ़ रही हैं।
बेंगलुरु में मुख्यमंत्री के होम ऑफिस 'कृष्णा' में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की अध्यक्षता में केंद्रीय टीम के साथ एक महत्वपूर्ण ब्रीफिंग हुई। बैठक के दौरान राज्य में सूखे से पैदा हुई परिस्थितियों और इससे प्रभावित लोगों की स्थिति की जानकारी केंद्रीय टीम को दी गई। जी. परमेश्वर ने कहा कि कर्नाटक हाल के दशकों में देखी गई सबसे गंभीर सूखे की परिस्थितियों में से एक का सामना कर रहा है। इसका असर केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है।
परमेश्वर ने केंद्रीय टीम के सामने किसानों की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि कई क्षेत्रों में बारिश की कमी के कारण फसलें शुरुआती अवस्था में ही सूख गईं। कुछ स्थानों पर बीज अंकुरित हुए और पौधों में केवल दो पत्तियां आने के बाद वे सूख गए। इसके बाद जब कुछ बारिश हुई तो किसानों ने उम्मीद के साथ दोबारा बुवाई की, लेकिन पर्याप्त वर्षा नहीं होने के कारण दूसरी बार बोई गई फसल भी नहीं बच सकी।
उन्होंने कहा, "यह हमारे समय में देखे गए सबसे गंभीर सूखे में से एक है। कई जगहों पर फसलें अंकुरित हुईं और सिर्फ दो पत्तियां आने के बाद सूख गईं। बारिश के कुछ दौर के बाद किसानों ने दोबारा बुवाई की, लेकिन दूसरी बार बोई गई फसल भी सूख गई। अगर आप आज खेतों में जाएं, तो कई जगहों पर असल में कोई फसल नहीं बची है।"
राज्य सरकार का कहना है कि लगातार फसल खराब होने से किसानों पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। किसानों को एक ही सीजन में दोबारा बीज, खाद और खेती से जुड़े दूसरे संसाधनों पर खर्च करना पड़ा, लेकिन बारिश की कमी ने उनकी उम्मीदों को झटका दिया। जिन किसानों ने कर्ज लेकर खेती की थी, उनके सामने स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो गई है।
सूखे का असर बागवानी क्षेत्र पर भी दिखाई दे रहा है। पानी की कमी के कारण बागवानी फसलों को बचाए रखना किसानों के लिए मुश्किल होता जा रहा है। इसके साथ ही कई ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है। राज्य सरकार ने केंद्रीय टीम से इन सभी पहलुओं को अपने आकलन में शामिल करने का आग्रह किया है।
परमेश्वर ने कहा कि केंद्रीय टीम का दौरा राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसकी रिपोर्ट के आधार पर केंद्र से मिलने वाली सहायता की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। उन्होंने टीम से प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति को करीब से देखने और किसानों की समस्याओं को समझने की अपील की। राज्य सरकार चाहती है कि नुकसान का आकलन केवल आंकड़ों के आधार पर न होकर जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जाए।
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सूखा केवल कृषि संकट नहीं है। इसका सीधा असर ग्रामीण रोजगार, पशुपालन, जल उपलब्धता और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। खेती से होने वाली आय में गिरावट के कारण ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति प्रभावित होती है और दैनिक जरूरतों को पूरा करने में भी कठिनाइयां बढ़ सकती हैं।
राज्य सरकार ने केंद्रीय टीम को सूखा प्रभावित क्षेत्रों और वहां हुए नुकसान से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराई। अधिकारियों की ओर से खेती, बागवानी, पेयजल और ग्रामीण आजीविका पर पड़े प्रभाव की स्थिति से टीम को अवगत कराया गया। सरकार ने उम्मीद जताई है कि केंद्रीय टीम अपनी रिपोर्ट में राज्य के सामने मौजूद संकट की गंभीरता को पर्याप्त रूप से दर्ज करेगी।
परमेश्वर ने समय पर केंद्रीय मदद की जरूरत पर विशेष जोर दिया। उनका कहना था कि सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए सहायता मिलने में देरी होने पर किसानों और ग्रामीण परिवारों की परेशानियां और बढ़ सकती हैं। इसलिए नुकसान के आकलन और उसके बाद सहायता उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेजी से पूरी की जानी चाहिए।
कर्नाटक सरकार अब केंद्रीय टीम के आकलन और उसके आधार पर आगे होने वाली कार्रवाई पर नजर बनाए हुए है। राज्य को उम्मीद है कि प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद केंद्र सरकार से जरूरी सहायता जल्द उपलब्ध होगी। फिलहाल सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती सूखे से प्रभावित किसानों को राहत देने, ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने और कृषि तथा बागवानी क्षेत्र को हुए नुकसान के प्रभाव को कम करने की है।