बेंगलुरु। कर्नाटक में ठेकेदारों के हजारों करोड़ रुपये के लंबित भुगतान को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बुधवार को कहा कि पिछली भाजपा सरकारों के दौरान बजट से अधिक कार्य स्वीकृत किए गए और अब उनकी सरकार को पुराने कामों के बिलों का भुगतान करना पड़ रहा है। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की सरकार का उल्लेख करते हुए कहा कि वित्त विभाग की मौजूदा चिंताओं के पीछे पिछली सरकारों के ऐसे फैसले भी एक कारण हैं। यह मुख्यमंत्री का राजनीतिक आरोप है, जिसे भाजपा ने स्वीकार नहीं किया है।
मुख्यमंत्री चामराजनगर जिले के हनूर में KHB हेलीपैड के पास मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उनसे कर्नाटक स्टेट कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन की ओर से लंबित भुगतान को लेकर लिखे गए पत्र के बारे में सवाल पूछा गया। एसोसिएशन का दावा है कि विभिन्न सरकारी विभागों से जुड़े विकास कार्यों के करीब ₹38,000 करोड़ के बिल अभी तक लंबित हैं और करीब 1.5 लाख ठेकेदार इससे प्रभावित हैं।
इस पर डीके शिवकुमार ने कहा कि पूर्व भाजपा सरकारों के समय मंजूर किए गए कई काम अब पूरे हो रहे हैं और उन कामों के भुगतान की जिम्मेदारी मौजूदा सरकार पर आ रही है। उन्होंने कहा कि ठेकेदारों को भी अपना व्यवसाय और कामकाज चलाना है, इसलिए सरकार इस समस्या पर विचार करेगी और समाधान निकालने की कोशिश करेगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि येदियुरप्पा सरकार के दौरान बजट से अधिक काम शुरू किए गए थे। उन्होंने दावा किया कि पिछली भाजपा सरकारों की वित्तीय योजना में हुई गलतियों का असर अब राज्य के वित्त पर दिखाई दे रहा है। शिवकुमार के मुताबिक इसी तरह की परिस्थितियों के कारण वित्त विभाग ने सरकार को खर्च के मामले में सावधानी बरतने की सलाह दी है।
हाल में कर्नाटक के वित्त विभाग ने राज्य सरकार को खर्च में सावधानी बरतने की सलाह दी थी। विभाग ने राज्य की वित्तीय स्थिति और उधारी क्षमता को देखते हुए योजनाओं तथा अन्य खर्चों की प्राथमिकता तय करने पर जोर दिया। मुख्यमंत्री शिवकुमार ने इससे पहले भी कहा था कि वित्त विभाग द्वारा ऐसी सलाह देना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर कर्नाटक स्टेट कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ने सरकार से लंबित बिलों का भुगतान जल्द जारी करने की मांग की है। एसोसिएशन ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में दावा किया कि 2021-22 से विभिन्न विभागों के करीब ₹38,000 करोड़ के बिलों का भुगतान बाकी है। ठेकेदारों का कहना है कि लंबे समय से भुगतान न मिलने के कारण उन्हें बैंक कर्ज, मजदूरी, निर्माण सामग्री की लागत और दूसरे खर्चों को संभालने में मुश्किल हो रही है।
एसोसिएशन ने यह भी कहा है कि राज्यभर में करीब 1.5 लाख ठेकेदार इससे प्रभावित हैं। संगठन का आरोप है कि पहले कई बार सरकार के सामने यह मुद्दा रखा गया, लेकिन अपेक्षित समाधान नहीं मिला। ठेकेदारों ने चेतावनी दी है कि यदि बकाया भुगतान को लेकर जल्द ठोस कदम नहीं उठाया गया तो वे फिर से आंदोलन कर सकते हैं।
ठेकेदार संगठन ने अपने पत्र में पिछली बैठकों और आश्वासनों का भी उल्लेख किया है। संगठन के अनुसार मार्च में बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में प्रदर्शन के दौरान लंबित बिलों के भुगतान का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। एसोसिएशन का कहना है कि तब भुगतान को लेकर आश्वासन दिया गया था, लेकिन कई महीने गुजरने के बाद भी बड़ी राशि लंबित है।
संगठन ने यह भी दावा किया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद डीके शिवकुमार ने दो महीने के भीतर भुगतान के मुद्दे पर कदम उठाने का भरोसा दिया था। अब ठेकेदार उस आश्वासन का हवाला देते हुए सरकार से तेजी से कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने बुधवार को कहा कि वह ठेकेदारों की समस्या से परिचित हैं और इस पर जल्द विचार करेंगे। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि ठेकेदारों को अपना काम जारी रखने के लिए भुगतान की जरूरत होती है। हालांकि सरकार ने फिलहाल यह स्पष्ट नहीं किया है कि लंबित राशि का कितना हिस्सा कब जारी किया जाएगा।
कर्नाटक की वित्तीय स्थिति को लेकर पिछले कुछ दिनों से राजनीतिक बयानबाजी भी तेज है। भाजपा राज्य सरकार पर वित्तीय प्रबंधन को लेकर सवाल उठा रही है, जबकि कांग्रेस सरकार का कहना है कि उसे पिछली सरकारों से बड़ी संख्या में स्वीकृत परियोजनाएं और लंबित वित्तीय दायित्व मिले हैं। दोनों दल इस मुद्दे के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
राज्य सरकार के सामने इस समय कई बड़े वित्तीय दायित्व हैं। विकास परियोजनाओं, सामाजिक योजनाओं, बुनियादी ढांचे और सूखा राहत जैसे क्षेत्रों के लिए भी बड़े पैमाने पर धन की जरूरत है। इसी बीच ठेकेदारों के ₹38,000 करोड़ के लंबित भुगतान के दावे ने सरकार पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है।
ठेकेदारों का कहना है कि समय पर भुगतान नहीं मिलने से नई परियोजनाओं पर काम करने की उनकी क्षमता प्रभावित हो सकती है। कई ठेकेदारों को निर्माण सामग्री आपूर्तिकर्ताओं, मजदूरों और बैंकों का भुगतान करना होता है। ऐसे में लंबे समय तक बिल अटकने से पूरे निर्माण और विकास कार्यों की श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
मुख्यमंत्री शिवकुमार के बुधवार के बयान से संकेत मिला है कि सरकार लंबित बिलों के मुद्दे पर कोई रास्ता तलाशने की तैयारी में है, लेकिन इसके लिए उपलब्ध वित्तीय संसाधनों और प्राथमिकताओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि ठेकेदारों के दावे के मुताबिक लंबित ₹38,000 करोड़ में से सरकार कितनी राशि तत्काल जारी कर सकती है। मुख्यमंत्री ने समाधान पर जल्द विचार करने की बात कही है, जबकि ठेकेदार संगठन समयबद्ध भुगतान की मांग पर कायम है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से भुगतान कार्यक्रम या वित्तीय योजना सामने आती है या नहीं, इस पर ठेकेदारों और राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।
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