बेंगलुरु। कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल में विद्यार्थियों से कथित तौर पर कुएं से पानी निकलवाने और उसे स्कूल के शौचालय तक पहुंचाने के मामले में डिप्टी लोकायुक्त ने संज्ञान लिया है। डिप्टी लोकायुक्त जस्टिस के.एन. फणींद्र ने शिक्षा विभाग के तीन अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। आरोप है कि स्कूल में बुनियादी पेयजल और स्वच्छता व्यवस्था सुनिश्चित करने के बजाय बच्चों से पानी से जुड़ा काम कराया जा रहा था।
मामला उत्तर कन्नड़ जिले के होन्नावर तालुक स्थित होडिके शिरूर गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल से जुड़ा है। यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों से कथित तौर पर कुएं से पानी निकालने, पानी को शौचालय तक ले जाने और पीने के लिए भी पानी लाने को कहा जाता था। मामला सामने आने के बाद डिप्टी लोकायुक्त ने शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर कार्रवाई शुरू की।
जिन अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, उनमें उत्तर कन्नड़ जिले के पब्लिक एजुकेशन डिपार्टमेंट की डिप्टी डायरेक्टर लता नायक, होन्नावर तालुक के फील्ड एजुकेशन ऑफिसर भीमप्पा भजंत्री और होडिके शिरूर गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल की हेडमिस्ट्रेस पूर्णिमा शानुभोग शामिल हैं।
डिप्टी लोकायुक्त के सामने मुख्य सवाल यह है कि सरकारी स्कूल में विद्यार्थियों को पर्याप्त और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी किस स्तर पर पूरी नहीं हुई। इसके साथ ही स्कूल परिसर में शौचालयों के इस्तेमाल के लिए पानी की व्यवस्था क्यों नहीं थी और ऐसी परिस्थिति कैसे बनी कि विद्यार्थियों से कुएं से पानी निकालने और ढोने का काम कथित तौर पर कराया गया।
मामले में दर्ज शिकायत के अनुसार विद्यार्थियों को स्कूल में अपनी पढ़ाई के दौरान पानी की व्यवस्था से जुड़े काम करने पड़ रहे थे। बच्चों से कुएं से पानी निकालना अपने आप में सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय भी है। कुएं के आसपास थोड़ी सी लापरवाही दुर्घटना का कारण बन सकती है। ऐसे में यह भी देखा जाएगा कि बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल प्रबंधन ने क्या व्यवस्था की थी।
सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों को स्वच्छ पेयजल और उपयोग योग्य शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन और शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी है। इस मामले में आरोप है कि इन सुविधाओं की कमी का बोझ विद्यार्थियों पर डाल दिया गया। बच्चों को पीने के लिए पानी लाने के साथ शौचालय के लिए भी पानी पहुंचाना पड़ रहा था।
डिप्टी लोकायुक्त की कार्रवाई के बाद अब संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच की जाएगी। यह पता लगाने का प्रयास होगा कि स्कूल में पानी की समस्या कितने समय से थी और इसकी जानकारी शिक्षा विभाग के अधिकारियों को थी या नहीं। यदि समस्या की जानकारी पहले दी गई थी तो उसे दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए, यह भी जांच का हिस्सा हो सकता है।
स्कूल की हेडमिस्ट्रेस की भूमिका भी जांच के दायरे में है। स्कूल स्तर पर विद्यार्थियों से पानी लाने की व्यवस्था किसके निर्देश पर की गई और क्या इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध थी, इन सवालों पर जवाब मांगा जा सकता है। इसी तरह ब्लॉक और जिला स्तर के अधिकारियों से यह पूछा जा सकता है कि स्कूल की बुनियादी सुविधाओं की नियमित निगरानी किस तरह की जा रही थी।
ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में पेयजल की व्यवस्था विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। विद्यार्थियों को स्कूल में पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पेयजल मिलना चाहिए। इसके अलावा लड़कों और लड़कियों के लिए बने शौचालयों में नियमित पानी की उपलब्धता स्वच्छता और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ी हुई है।
यदि शौचालय में पानी उपलब्ध नहीं हो तो उसका उपयोग प्रभावित होता है और इससे बच्चों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। खासकर छात्राओं के लिए पर्याप्त पानी और स्वच्छ शौचालय की उपलब्धता स्कूल में नियमित उपस्थिति से भी जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है।
इस मामले में बच्चों से कथित तौर पर कुएं से पानी निकलवाने का आरोप इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि विद्यार्थियों को स्कूल में मुख्य रूप से शिक्षा और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। स्कूल की आवश्यक सुविधाओं को बनाए रखने का काम बच्चों पर नहीं छोड़ा जा सकता।
डिप्टी लोकायुक्त के स्तर पर मामला दर्ज होने के बाद अब शिक्षा विभाग के अधिकारियों से रिकॉर्ड और अन्य संबंधित जानकारी मांगी जा सकती है। स्कूल में पानी की आपूर्ति से संबंधित व्यवस्था, अधिकारियों के निरीक्षण, शिकायतों और समस्या को दूर करने के लिए किए गए प्रयासों की जानकारी भी जांच में महत्वपूर्ण हो सकती है।
यह भी पता लगाया जा सकता है कि स्कूल में पाइपलाइन, टंकी, हैंडपंप या किसी अन्य माध्यम से पानी उपलब्ध कराने की व्यवस्था थी या नहीं। यदि कोई व्यवस्था पहले से मौजूद थी तो वह काम क्यों नहीं कर रही थी और उसकी मरम्मत के लिए किस स्तर पर कार्रवाई की जानी थी, यह जांच में सामने आ सकता है।
घटना ने सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की नियमित निगरानी की आवश्यकता को भी सामने रखा है। केवल स्कूल भवन और कक्षाएं उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। पेयजल, शौचालय, बिजली, साफ-सफाई और बच्चों की सुरक्षा जैसी सुविधाओं की स्थिति का समय-समय पर निरीक्षण भी जरूरी है।
डिप्टी लोकायुक्त जस्टिस के.एन. फणींद्र की ओर से तीन अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किए जाने के बाद संबंधित विभाग में हलचल बढ़ गई है। हालांकि मामला दर्ज होने का अर्थ आरोपों का सिद्ध होना नहीं है। जांच में उपलब्ध दस्तावेजों, अधिकारियों के जवाब और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी।
मामले में यह भी महत्वपूर्ण होगा कि विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों से क्या जानकारी सामने आती है। इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि बच्चों से पानी लाने का काम कितनी बार कराया गया और यह व्यवस्था कब से चल रही थी।
फिलहाल डिप्टी लोकायुक्त की कार्रवाई के केंद्र में स्कूल में विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जा रही बुनियादी सुविधाएं और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पानी की व्यवस्था में किस स्तर पर लापरवाही हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। इस बीच मामला सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा, स्वच्छ पेयजल और शौचालय जैसी आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है।