बेंगलुरु। कर्नाटक में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR और फॉर्म-7 को लेकर सियासी विवाद लगातार तेज होता जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी के सांसद और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रही है और भाजपा कार्यकर्ताओं को पुलिस मामलों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है।
बोम्मई ने फॉर्म-7 के जरिए मतदाताओं के नाम हटाने से जुड़े आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया है और केवल आवेदन जमा किए जाने को अपने आप में उल्लंघन नहीं माना जा सकता। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद का रूप देने का आरोप लगाया। उनके मुताबिक, किसी आवेदन की वैधता की जांच करना चुनाव अधिकारियों का काम है और पूरी प्रक्रिया चुनाव नियमों के तहत ही होनी चाहिए।
फॉर्म-7 का इस्तेमाल मतदाता सूची में किसी नाम के शामिल होने पर आपत्ति दर्ज कराने या किसी नाम को हटाने का अनुरोध करने के लिए किया जाता है। कर्नाटक में हाल के दिनों में बड़ी संख्या में फॉर्म-7 आवेदन जमा किए जाने के बाद विवाद बढ़ गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि इन आवेदनों का इस्तेमाल पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटाने के लिए किया जा रहा है। भाजपा ने इन आरोपों से इनकार किया है।
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने आरोप लगाया था कि फॉर्म-7 के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के जरिए पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इस मामले को गंभीर बताते हुए जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग की थी। शिवकुमार ने राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के बाहर प्रदर्शन भी किया और कथित फर्जी या गलत आवेदनों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई।
इसके बाद कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी 224 विधानसभा क्षेत्रों के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों को निर्देश दिया कि जानबूझकर गलत जानकारी देकर फॉर्म-7 जमा करने वालों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए। चुनाव आयोग की ओर से यह भी कहा गया कि ऐसे आवेदनों की जांच और सत्यापन आवश्यक है ताकि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से सूची से न हटे।
बसवराज बोम्मई ने इसी कार्रवाई और उसके बाद दर्ज मामलों पर आपत्ति जताई है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने चुनाव प्रक्रिया पर दबाव बनाया और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप किया। बोम्मई का कहना है कि अधिकारियों को पहले आवेदनों की जांच करनी चाहिए थी और उसके बाद ही यह तय किया जाना चाहिए था कि कोई आवेदन गलत, फर्जी या कानून का उल्लंघन करने वाला है।
भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने भी पुलिस महानिदेशक से मुलाकात कर फॉर्म-7 आवेदनों से जुड़े मामलों में दर्ज FIR की समीक्षा की मांग की है। भाजपा नेताओं का कहना है कि केवल बड़ी संख्या में फॉर्म-7 जमा करने के आधार पर कार्यकर्ताओं को आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए और हर मामले में ठोस सबूत तथा चुनावी नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
दूसरी ओर कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि कुछ इलाकों में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए संगठित तरीके से आवेदन किए गए। मैसूरु, बीदर, बेलगावी और बेंगलुरु समेत अलग-अलग स्थानों पर फॉर्म-7 से जुड़े मामलों में शिकायतें सामने आई हैं। कुछ FIR में फर्जी दस्तावेज, गलत दावे और चुनाव अधिकारियों पर दबाव डालने जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। इन मामलों की जांच जारी है और आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं।
दावणगेरे में प्रशासन ने 1,106 फॉर्म-7 आवेदनों को खारिज भी किया है। अधिकारियों ने कहा कि मतदाता सूची से किसी नाम को हटाने से पहले निर्धारित प्रक्रिया, सत्यापन और पर्याप्त आधार जरूरी है। इस घटनाक्रम ने पूरे राज्य में मतदाता सूची की शुद्धता और फॉर्म-7 के इस्तेमाल को लेकर बहस और तेज कर दी है।
कर्नाटक में SIR को लेकर कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने हैं। मुख्यमंत्री शिवकुमार भाजपा और जेडीएस पर पात्र मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश का आरोप लगा रहे हैं, जबकि भाजपा का कहना है कि कांग्रेस इस मुद्दे को राजनीतिक रूप दे रही है और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने वाले कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया जा रहा है।
बोम्मई ने कहा कि फॉर्म-7 चुनाव प्रक्रिया का निर्धारित हिस्सा है और इस संबंध में किसी भी शिकायत का समाधान निर्वाचन अधिकारियों के स्तर पर तथ्यों और नियमों के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस पर अपनी राजनीतिक गलतियों से ध्यान भटकाने के लिए विवाद खड़ा करने का आरोप भी लगाया।
फिलहाल इस पूरे मामले में चुनाव अधिकारियों की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अगर किसी आवेदन में गलत जानकारी, जाली दस्तावेज या जानबूझकर पात्र मतदाता का नाम हटाने की कोशिश साबित होती है तो कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है। वहीं भाजपा लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि वैध तरीके से फॉर्म-7 जमा करने वाले लोगों के खिलाफ केवल राजनीतिक दबाव में कार्रवाई नहीं होनी चाहिए।
फॉर्म-7 विवाद अब कर्नाटक की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है। कांग्रेस जहां इसे मतदाता अधिकारों और चुनावी पारदर्शिता से जोड़ रही है, वहीं भाजपा इसे सरकार की ओर से चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप और विपक्षी कार्यकर्ताओं पर दबाव बनाने का मामला बता रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में चुनाव आयोग की जांच और विभिन्न मामलों में होने वाली कार्रवाई पर सभी की नजरें रहेंगी।