मैसूर। विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सोमवार शाम K.R. सर्कल में दशहरा महोत्सव में शामिल होने वाले हाथियों की पहली वेट ट्रेनिंग के दौरान एक ऐसी स्थानीय परंपरा देखने को मिली, जिसने लोगों का ध्यान खींचा। हाथियों की ट्रेनिंग के बीच कुछ लोग जमीन पर गिरे ताजे हाथी के गोबर को पैरों से कुचलते और कुछ उसे छूते नजर आए।
स्थानीय लोगों के अनुसार, हाथी के गोबर को छूने या उस पर पैर रखने से जुड़ी यह मान्यता काफी पुरानी है। कुछ लोगों का विश्वास है कि हाथी का गोबर स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है और इसमें औषधीय या रोगों को ठीक करने वाले गुण होते हैं। हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी मान्यताओं के समर्थन में ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
दशहरा हाथियों की शुरू हुई वेट ट्रेनिंग
मैसूर दशहरा की सबसे प्रमुख पहचान भव्य जंबू सवारी है। इसमें विशेष रूप से प्रशिक्षित हाथी हिस्सा लेते हैं। दशहरा करीब आने के साथ इन हाथियों को मुख्य आयोजन के लिए तैयार करने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
सोमवार शाम K.R. सर्कल क्षेत्र में हाथियों की पहली वजन प्रशिक्षण प्रक्रिया आयोजित की गई। दशहरा हाथियों को स्थानीय स्तर पर 'जंबूस' भी कहा जाता है। ट्रेनिंग के दौरान हाथियों को धीरे-धीरे भार के साथ चलने का अभ्यास कराया जाता है, ताकि मुख्य आयोजन के दौरान वे निर्धारित जिम्मेदारी आसानी से निभा सकें।
इस प्रशिक्षण को देखने के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी पहुंचे। इसी दौरान हाथियों के रास्ते में गिरे ताजे गोबर के पास कुछ लोगों की गतिविधि ने ध्यान आकर्षित किया।
गोबर को पैरों से कुचलते दिखे लोग
हाथियों के गुजरने के बाद कुछ लोगों को जमीन पर पड़े गोबर को अपने पैरों से कुचलते देखा गया। वहीं कुछ लोग हाथी के गोबर को हाथ से छूते नजर आए। सामान्य तौर पर यह दृश्य बाहर से आने वाले लोगों को हैरान कर सकता है, लेकिन स्थानीय मान्यता से जुड़े लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं बताई जाती।
स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से कुछ परिवारों और समुदायों में यह विश्वास चला आ रहा है कि हाथी के ताजे गोबर को छूना शुभ होता है। कुछ लोग इसे स्वास्थ्य से भी जोड़ते हैं।
औषधीय गुण होने की स्थानीय मान्यता
इस परंपरा के पीछे सबसे प्रमुख धारणा हाथी के गोबर में कथित औषधीय गुण होने की है। कुछ स्थानीय मान्यताओं में कहा जाता है कि इसे छूने या पैर से कुचलने से स्वास्थ्य संबंधी लाभ मिल सकता है।
हाथी को भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष स्थान प्राप्त है। भगवान गणेश से हाथी के जुड़ाव के कारण भी कई स्थानों पर हाथियों को शुभता और समृद्धि के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में हाथी से जुड़ी कई स्थानीय परंपराएं समय के साथ विकसित हुई हैं।
हालांकि किसी परंपरा या धार्मिक-सांस्कृतिक विश्वास का अस्तित्व अपने आप में उसके स्वास्थ्य संबंधी दावों की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता।
वैज्ञानिक प्रमाण नहीं
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसा कोई स्थापित वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि हाथी के गोबर को हाथ से छूने या पैरों से कुचलने से बीमारियां ठीक होती हैं अथवा कोई विशेष चिकित्सकीय लाभ मिलता है।
जानवरों के मल में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव मौजूद हो सकते हैं। इसलिए स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सीधे संपर्क के बाद स्वच्छता का ध्यान रखना जरूरी है। किसी बीमारी के उपचार के लिए इस तरह की मान्यताओं पर निर्भर रहने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना उचित माना जाता है।
ऐसे में इस परंपरा को स्थानीय सांस्कृतिक मान्यता के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसे प्रमाणित चिकित्सा पद्धति नहीं माना जाना चाहिए।
मैसूर दशहरा में हाथियों का खास महत्व
मैसूर दशहरा कर्नाटक के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है और इसकी पहचान देश-दुनिया में है। इस आयोजन में हाथियों की भूमिका विशेष होती है। दशहरा के दौरान होने वाली जंबू सवारी को देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक मैसूर पहुंचते हैं।
मुख्य आयोजन से पहले हाथियों को कई चरणों में प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें शहर के वातावरण, भीड़, यातायात और शोर के बीच चलने का अभ्यास भी शामिल रहता है। इसके अलावा वजन उठाकर निर्धारित मार्ग पर चलने की ट्रेनिंग भी कराई जाती है।
ट्रेनिंग देखने उमड़े लोग
K.R. सर्कल में आयोजित प्रशिक्षण के दौरान लोगों में उत्साह देखने को मिला। दशहरा हाथियों को करीब से देखने के लिए स्थानीय लोग पहुंचे। हाथियों की ट्रेनिंग के साथ-साथ पुरानी स्थानीय मान्यता से जुड़ा दृश्य भी चर्चा का विषय बन गया।
सोशल मीडिया के दौर में इस तरह की स्थानीय परंपराओं के वीडियो और तस्वीरें तेजी से लोगों तक पहुंचते हैं। इससे इनके सांस्कृतिक पहलुओं के साथ स्वास्थ्य संबंधी दावों पर भी चर्चा शुरू हो जाती है।
परंपरा और विज्ञान को अलग समझना जरूरी
हाथी के गोबर को छूने या उस पर पैर रखने की परंपरा कुछ स्थानीय लोगों की आस्था और पुराने विश्वास से जुड़ी हो सकती है। लेकिन इसके कथित औषधीय फायदों को लेकर वैज्ञानिक प्रमाण नहीं होने के कारण स्वास्थ्य संबंधी दावों को तथ्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।
फिलहाल मैसूर दशहरा की तैयारियों के बीच हाथियों की वेट ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है। आने वाले दिनों में अभ्यास के अलग-अलग चरण पूरे किए जाएंगे। इसी के साथ शहर में दशहरा का उत्साह भी बढ़ता जाएगा। सोमवार को हुई पहली ट्रेनिंग में हाथियों के साथ दिखाई दी यह स्थानीय परंपरा लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।