बेंगलुरु : कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण जिले में इतिहास से जुड़ी एक दुर्लभ खोज सामने आई है। नेलमंगला के पास भैरसंद्रा गांव में करीब 850 ईस्वी काल का एक ‘बाघ-शिकार पत्थर’ मिला है। इतिहासकारों के अनुसार, यह वीरगाथा से जुड़ा पत्थर गंगा और राष्ट्रकूट काल का माना जा रहा है। इस खोज को क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और तत्कालीन सामाजिक जीवन को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, यह दुर्लभ वीरतापूर्ण पत्थर किसान रंगास्वामी को अपनी जमीन पर सफाई कार्य के दौरान मिला। रंगास्वामी अपनी जमीन पर जेसीबी मशीन की मदद से यूकेलिप्टस के पेड़ों को हटाने का काम कर रहे थे। इसी दौरान जमीन के अंदर दबा हुआ यह विशाल पत्थर दिखाई दिया।
पत्थर का आकार भी इसे खास बनाता है। लगभग 8 फीट लंबे और करीब 2.5 फीट चौड़े इस शिलाखंड पर प्राचीन काल की वीरता से जुड़ी आकृतियां और संकेत मौजूद हैं। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, यह पत्थर किसी योद्धा की बहादुरी को दर्शाने वाला स्मारक हो सकता है, जिसमें बाघ के शिकार से जुड़ी घटना को उकेरा गया है।
रंगास्वामी ने जब इस पत्थर को देखा तो उन्हें इसकी ऐतिहासिक अहमियत का अंदाजा हुआ। उन्होंने इसे केवल एक सामान्य पत्थर न मानते हुए स्थानीय पत्रकार और इतिहास के जानकार विजयकुमार होसपाल्या को इसकी जानकारी दी। विजयकुमार ने भी इसकी प्राचीनता और महत्व को देखते हुए आगे विशेषज्ञों तक इसकी जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया।
रंगास्वामी के बेटे अशोक की मदद से विजयकुमार ने इतिहासकार बालासुब्रमण्य जी. राव से संपर्क किया और उन्हें इस खोज के बारे में बताया। इसके बाद विशेषज्ञों ने पत्थर के ऐतिहासिक महत्व का अध्ययन शुरू किया।
इतिहासकारों के अनुसार, गंगा और राष्ट्रकूट काल में वीरता को दर्शाने वाले पत्थरों का विशेष महत्व था। उस समय युद्ध, शिकार और समाज की रक्षा में योगदान देने वाले लोगों की स्मृति में वीरगलों या वीर पत्थरों की स्थापना की जाती थी। ये पत्थर उस दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन की जानकारी देने वाले महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।
‘बाघ-शिकार पत्थर’ भी इसी परंपरा का हिस्सा माना जा रहा है। प्राचीन कर्नाटक में बाघ का शिकार केवल साहस का प्रतीक नहीं था, बल्कि कई क्षेत्रों में इसे वीरता और प्रतिष्ठा से जोड़ा जाता था। ऐसे पत्थरों पर योद्धाओं या शिकारियों की बहादुरी को चित्रों और प्रतीकों के माध्यम से दर्ज किया जाता था।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की खोजों से क्षेत्र के इतिहास को समझने में मदद मिलती है। शिलालेखों और वीर पत्थरों के माध्यम से उस समय की भाषा, कला, युद्ध शैली, सामाजिक व्यवस्था और लोगों के जीवन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
भैरसंद्रा गांव में मिली यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह गंगा और राष्ट्रकूट शासनकाल के दौरान इस क्षेत्र की ऐतिहासिक गतिविधियों पर प्रकाश डाल सकती है। बेंगलुरु ग्रामीण क्षेत्र में पहले भी कई प्राचीन अवशेष और शिलालेख मिल चुके हैं, जो यहां की समृद्ध ऐतिहासिक विरासत को दर्शाते हैं।
स्थानीय लोगों में भी इस खोज को लेकर उत्सुकता है। ग्रामीणों का कहना है कि उनके क्षेत्र में इतने पुराने ऐतिहासिक अवशेष का मिलना गर्व की बात है। अब लोगों को उम्मीद है कि इस पत्थर को संरक्षित किया जाएगा और इसके बारे में अधिक जानकारी सामने आएगी।
इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों की जांच के बाद ही इस पत्थर से जुड़ी पूरी जानकारी सामने आ सकेगी। विशेषज्ञ यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह पत्थर किस घटना, व्यक्ति या समुदाय से जुड़ा था और इसके निर्माण का वास्तविक उद्देश्य क्या था।
ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण आज के समय में बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे प्राचीन अवशेष केवल पत्थर नहीं होते, बल्कि वे किसी क्षेत्र की संस्कृति और अतीत की कहानी को संजोए रखते हैं। यदि इनका सही तरीके से संरक्षण किया जाए तो आने वाली पीढ़ियां भी अपने इतिहास को बेहतर तरीके से समझ सकती हैं।
भैरसंद्रा गांव में मिली यह दुर्लभ खोज एक बार फिर साबित करती है कि कर्नाटक की धरती पर इतिहास के कई अनमोल प्रमाण छिपे हुए हैं। अब विशेषज्ञों की जांच के बाद इस ‘बाघ-शिकार पत्थर’ से जुड़े और भी ऐतिहासिक तथ्य सामने आने की उम्मीद है।