गुमला। झारखंड के गुमला जिले में किसानों की आमदनी बढ़ाने और कृषि आधारित आजीविका को मजबूत बनाने के उद्देश्य से सरसों की खेती को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान, सेवर, भरतपुर (राजस्थान) की परियोजना के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला (विकास भारती, बिशुनपुर) द्वारा वित्त वर्ष 2026-27 में जिले के 290 हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती कराने की पहल की गई है। इसके लिए जिले के पांच प्रखंडों के विभिन्न गांवों का चयन किया गया है।

परियोजना का मुख्य उद्देश्य किसानों को पारंपरिक खेती के साथ तिलहनी फसलों की उन्नत तकनीकों से जोड़ना, कृषि उत्पादन बढ़ाना और खेती को अधिक लाभकारी बनाना है। इसके तहत घाघरा, बिशुनपुर, सिसई, रायडीह और बसिया प्रखंड के चयनित गांवों में किसानों को सरसों की वैज्ञानिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

कृषि विज्ञान केंद्र की इस पहल से जिले के छोटे और सीमांत किसानों को लाभ मिलने की उम्मीद है। गुमला जिले के कई किसान धान की खेती पर निर्भर हैं। धान की कटाई के बाद खेतों का बेहतर उपयोग करके सरसों जैसी रबी फसलों की खेती की जाए, तो किसानों को अतिरिक्त आमदनी का अवसर मिल सकता है।

परियोजना के तहत किसानों को क्लस्टर अग्रिम पंक्ति प्रदर्शन (Cluster Front Line Demonstration) और आईआईआरएमआर-एसटीसी प्रदर्शन कार्यक्रमों के माध्यम से उन्नत कृषि तकनीकों की जानकारी दी जा रही है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने के लिए प्रेरित करना और प्रदर्शन वाले खेतों के माध्यम से नई तकनीकों के संभावित लाभ समझाना है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, 7 अक्टूबर से 29 अक्टूबर 2026 के बीच चयनित क्षेत्रों के किसानों के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए गए। इन कार्यक्रमों में सरसों की खेती की तैयारी, उपयुक्त बीज के चयन, बुवाई की तकनीक, उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल और फसल की देखभाल जैसे विषयों पर जानकारी दी गई।

प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को ऐसी कृषि तकनीकों से परिचित कराना है, जिनकी सहायता से वे उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग कर सकें। सरसों की खेती में सही समय पर बुवाई और उचित दूरी बनाए रखना महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके अलावा खेत में जल निकासी की व्यवस्था, मिट्टी की स्थिति और पोषक तत्वों का संतुलन भी उत्पादन को प्रभावित करते हैं।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सरसों की अच्छी पैदावार के लिए क्षेत्र की जलवायु के अनुकूल किस्मों का चयन आवश्यक है। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे प्रमाणित बीजों का उपयोग करें और खेती शुरू करने से पहले मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करें।

विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि आवश्यकता से अधिक उर्वरक डालने से खेती की लागत बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक सलाह के अनुसार पोषण प्रबंधन अपनाना किसानों के लिए अधिक उपयोगी होता है।

गुमला में सरसों की खेती को बढ़ावा देने की यह पहल नई नहीं है। कृषि विज्ञान केंद्र पूर्व में भी जिले के विभिन्न गांवों में तिलहनी फसलों के प्रदर्शन कार्यक्रम चला चुका है। वर्ष 2024 में घाघरा प्रखंड के गुनिया गांव में किसानों के बीच सरसों के बीज वितरित कर प्रदर्शन खेती को प्रोत्साहित किया गया था। उस समय भी उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के साथ तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को प्रमुख उद्देश्य बताया गया था।

इस बार 290 हेक्टेयर में खेती का प्रस्ताव किसानों के लिए महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है। यदि चयनित खेतों में फसल का प्रदर्शन सफल रहता है, तो आसपास के दूसरे किसानों को भी सरसों की खेती अपनाने के लिए प्रेरणा मिल सकती है।

क्लस्टर आधारित प्रदर्शन पद्धति की विशेषता यह है कि इसमें एक ही क्षेत्र के किसानों को समूह के रूप में खेती की उन्नत तकनीकों से जोड़ा जाता है। इससे किसानों के बीच अनुभव साझा करना आसान होता है। साथ ही कृषि वैज्ञानिकों को भी फसल की निगरानी करने और आवश्यक सलाह देने में सुविधा मिलती है।

सरसों एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। इसके बीजों से खाद्य तेल प्राप्त किया जाता है, जबकि तेल निकालने के बाद बची खली का उपयोग पशु आहार के रूप में भी किया जा सकता है। इस तरह सरसों की खेती से कृषि और पशुपालन दोनों क्षेत्रों को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।

गुमला जैसे कृषि प्रधान जिले में खेती के विविधीकरण की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। केवल एक फसल पर निर्भर रहने से किसानों की आय मौसम और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार प्रभावित हो सकती है। ऐसे में रबी सीजन में सरसों जैसी फसलों को अपनाना आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने का एक विकल्प बन सकता है।

हालांकि, किसी भी नई फसल से किसानों को वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उत्पादन के साथ बाजार तक पहुंच और उचित मूल्य की व्यवस्था भी सुनिश्चित हो। किसानों को बीज, तकनीकी सलाह, कीट एवं रोग प्रबंधन तथा फसल की बिक्री से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।

कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, सरसों की फसल में समय-समय पर कीटों और रोगों की निगरानी जरूरी होती है। विशेष रूप से माहू जैसे कीट फसल को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए किसानों को नियमित निरीक्षण और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर प्रबंधन करने की आवश्यकता होती है।

इसके अलावा सरसों की खेती में सिंचाई प्रबंधन भी महत्वपूर्ण है। मौसम, मिट्टी और फसल की अवस्था के अनुसार सिंचाई करने से पानी का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन सीमित हैं, वहां किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल प्रबंधन की तकनीक अपनानी होगी।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अंतर्गत सरसों अनुसंधान से जुड़े संस्थान देश में तिलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों और कृषि तकनीकों पर कार्य कर रहे हैं। भरतपुर स्थित भारतीय सरसों अनुसंधान संस्थान की गतिविधियों का उद्देश्य भी वैज्ञानिक अनुसंधान को किसानों तक पहुंचाना और सरसों उत्पादन को बढ़ावा देना है।

कृषि विज्ञान केंद्र, गुमला की इस परियोजना से किसानों को वैज्ञानिक खेती का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। चयनित गांवों में फसल की वृद्धि, उत्पादन और खेती की लागत से जुड़े अनुभव भविष्य में अन्य किसानों के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।

फिलहाल जिले के पांच प्रखंडों में सरसों की खेती को विस्तार देने की तैयारी की जा रही है। परियोजना के तहत प्रशिक्षण प्राप्त किसानों से अपेक्षा है कि वे सीखी गई तकनीकों को अपने खेतों में अपनाएंगे।

कुल मिलाकर, 290 हेक्टेयर में सरसों की खेती को बढ़ावा देने की यह पहल गुमला जिले में कृषि विविधीकरण और किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। यदि किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन, उपयुक्त मौसम और बेहतर बाजार सुविधाएं मिलती हैं, तो सरसों की खेती ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अतिरिक्त योगदान दे सकती है।

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