खेतों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा बना चिंता का कारण, मिट्टी की उर्वरा शक्ति पर पड़ रहा असर
Jharkhand झारखंड : प्रखंड क्षेत्र के खेतों और कृषि भूमि में लगातार बढ़ते पॉलिथीन और प्लास्टिक कचरे ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेतों में जमा हो रहा प्लास्टिक अब कृषि उत्पादन और मिट्टी की गुणवत्ता पर गंभीर असर डाल रहा है। किसानों और कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में फसल उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव और अधिक बढ़ सकता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में घरों और बाजारों से निकलने वाला प्लास्टिक कचरा हवा और वर्षा के पानी के साथ बहकर सीधे खेतों तक पहुंच रहा है। यह कचरा धीरे-धीरे कृषि भूमि में जमा होता जा रहा है, जिससे मिट्टी की प्राकृतिक संरचना प्रभावित हो रही है। किसानों का कहना है कि पहले जहां खेतों की मिट्टी अधिक उपजाऊ होती थी, वहीं अब उसमें प्लास्टिक के टुकड़े मिलने लगे हैं, जिससे खेती के काम में भी बाधा आ रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पॉलिथीन और प्लास्टिक लंबे समय तक मिट्टी में नहीं गलते, जिससे यह भूमि के भीतर वर्षों तक बने रहते हैं। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता कम हो जाती है और जमीन की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति कमजोर पड़ने लगती है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि प्लास्टिक कचरा मिट्टी में पोषक तत्वों के संतुलन को भी बिगाड़ देता है, जिसका सीधा असर फसलों की वृद्धि पर पड़ता है।
किसानों का कहना है कि खेतों में पहुंचने वाला प्लास्टिक कचरा जुताई और बुआई दोनों प्रक्रियाओं में परेशानी पैदा करता है। जब ट्रैक्टर या हल खेतों में चलता है तो प्लास्टिक के टुकड़े मिट्टी में फंस जाते हैं, जिससे जुताई ठीक से नहीं हो पाती। इसके अलावा बुआई के समय बीजों के अंकुरण पर भी इसका असर पड़ता है।
ग्रामीणों का कहना है कि कई बार खेतों में इतना प्लास्टिक जमा हो जाता है कि उसे हाथ से हटाना भी मुश्किल हो जाता है। यह समस्या खासकर उन खेतों में अधिक देखने को मिलती है जो गांव के नजदीक या बाजार क्षेत्र के पास स्थित हैं। हवा के साथ उड़कर आने वाला हल्का प्लास्टिक कचरा खेतों में फैल जाता है और बारिश के पानी के साथ मिट्टी में गहराई तक पहुंच जाता है।
कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर इस समस्या पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया तो आने वाले वर्षों में मिट्टी की उत्पादकता में बड़ी गिरावट आ सकती है। उन्होंने बताया कि प्लास्टिक मिट्टी के अंदर हवा और पानी के प्रवाह को बाधित कर देता है, जिससे पौधों की जड़ों का सही विकास नहीं हो पाता। इसके परिणामस्वरूप फसलों की गुणवत्ता और पैदावार दोनों प्रभावित होती हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि प्लास्टिक के छोटे-छोटे टुकड़े धीरे-धीरे मिट्टी की संरचना को बदल देते हैं, जिससे खेतों की प्राकृतिक क्षमता कमजोर हो जाती है। यह स्थिति कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है, क्योंकि खेती की लागत बढ़ती है और उत्पादन घटता है।
किसानों ने प्रशासन से मांग की है कि गांवों और बाजारों में प्लास्टिक कचरे के उचित निस्तारण की व्यवस्था की जाए। उनका कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो खेतों की स्थिति और खराब हो जाएगी और कृषि पर निर्भर लोगों की आजीविका प्रभावित होगी।
स्थानीय स्तर पर कुछ किसानों ने अपने स्तर पर खेतों से प्लास्टिक हटाने की कोशिश शुरू की है, लेकिन यह काम काफी समय लेने वाला और कठिन है। कई किसानों का कहना है कि यह समस्या अब सामूहिक प्रयासों से ही हल हो सकती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी लोगों से अपील की है कि प्लास्टिक का उपयोग कम करें और कचरे का सही तरीके से निपटान करें। उन्होंने कहा कि यदि प्लास्टिक को खुले में फेंका जाता रहेगा तो यह धीरे-धीरे खेतों और जल स्रोतों दोनों को प्रभावित करेगा।
कुल मिलाकर, प्रखंड क्षेत्र की कृषि भूमि में बढ़ता प्लास्टिक कचरा अब एक गंभीर पर्यावरण और कृषि समस्या बन चुका है। यह न केवल मिट्टी की उर्वरा शक्ति को कमजोर कर रहा है, बल्कि फसल उत्पादन और किसानों की आजीविका पर भी सीधा असर डाल रहा है। समय रहते समाधान नहीं होने पर आने वाले वर्षों में इसके और गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं।