रांची: झारखंड में किसानों और जनजातीय समुदायों की आय बढ़ाने के लिए कार्बन ट्रेडिंग की संभावनाओं पर काम आगे बढ़ाने की पहल हुई है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को संबंधित पक्षों के साथ कार्यशाला आयोजित की। इसमें जलवायु अनुकूल कृषि, कृषि वानिकी और ग्रामीण आजीविका को कार्बन बाजार से जोड़ने पर चर्चा की गई। उद्देश्य ऐसी गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है, जो पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण परिवारों के लिए अतिरिक्त आर्थिक अवसर भी पैदा कर सकें। 

कार्यशाला में प्रधान मुख्य वन संरक्षक संजीव कुमार ने कार्बन ट्रेडिंग को स्थानीय आजीविका मजबूत करने का एक माध्यम बताया। उन्होंने उद्योग, खनन और ऊर्जा सहित संबंधित विभागों के बीच समन्वय की जरूरत पर जोर दिया। चर्चा में यह बात सामने आई कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की परियोजनाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने के लिए विभिन्न विभागों और संस्थाओं की भागीदारी जरूरी होगी। हालांकि, कार्यशाला की जानकारी में किसानों के लिए किसी निश्चित भुगतान दर या आय की गारंटी की घोषणा नहीं की गई है।
कार्बन ट्रेडिंग को सरल शब्दों में समझें तो यह प्रमाणित उत्सर्जन कटौती या वातावरण से कार्बन हटाने से जुड़े क्रेडिट की खरीद-बिक्री है। सामान्य रूप से एक कार्बन क्रेडिट एक मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन कटौती या निष्कासन को दर्शाता है। किसी परियोजना को क्रेडिट मिलने के लिए मान्य मानक, मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन की प्रक्रिया जरूरी होती है। इसलिए केवल पौधे लगा देने या खेती का तरीका बदल देने से अपने आप भुगतान शुरू नहीं होता। 
किसानों के लिए अवसर उन परियोजनाओं में बन सकता है, जहां खेती या भूमि प्रबंधन में बदलाव से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन घटे अथवा मिट्टी और पेड़ों में अतिरिक्त कार्बन संचित हो। कृषि वानिकी, भूमि पुनर्स्थापन और कुछ प्रकार की जलवायु अनुकूल खेती इस दिशा में उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन किस गतिविधि से कितने क्रेडिट बनेंगे, यह परियोजना की पद्धति, शुरुआती स्थिति और सत्यापित परिणाम पर निर्भर करेगा। पहले से जारी गतिविधियों के लिए भी हर स्थिति में नए क्रेडिट मिलने की पात्रता नहीं होती। 
झारखंड की कार्यशाला में भूमि क्षरण की चुनौती भी प्रमुखता से उठी। अधिकारियों ने इसरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए राज्य की करीब 69 प्रतिशत भूमि के क्षरण से प्रभावित होने की बात कही। इसके समाधान के लिए जल संरक्षण, वृक्षारोपण, भूमि पुनर्स्थापन और बायोगैस जैसे उपायों को बढ़ावा देने पर चर्चा हुई। यह आंकड़ा कार्यशाला में प्रस्तुत संदर्भ का हिस्सा है। विशेषज्ञों ने पर्यावरण सुधार की गतिविधियों को किसानों और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जोड़ने की संभावनाएं बताईं।
रांची के होटल चाणक्य बीएनआर में आयोजित कार्यक्रम में ‘क्लाइमेट हजार्ड मैपिंग फॉर झारखंड’ रिपोर्ट का विमोचन भी किया गया। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, मिट्टी और पेड़ों में संचित कार्बन के आकलन में सहायता देने वाले डिजिटल उपकरणों का प्रदर्शन हुआ। इनमें उपग्रह चित्रों पर आधारित निगरानी की तकनीक शामिल थी। ऐसी तकनीक परियोजनाओं के लिए आंकड़े जुटाने में मदद कर सकती है, हालांकि क्रेडिट जारी करने के लिए संबंधित मानक के अनुसार पूरी सत्यापन प्रक्रिया का पालन आवश्यक होगा। 
कार्यशाला में वन्यजीव क्षेत्र के वरिष्ठ अधिकारी रवि रंजन ने सामुदायिक आजीविका को प्राथमिकता देते हुए वैज्ञानिक और प्रमाण आधारित आंकड़ों से परियोजनाएं विकसित करने की बात कही। नाबार्ड के डीजीएम राकेश सिन्हा ने योजनाओं और वित्तीय सहयोग के जरिए किसानों तथा ग्रामीण समुदायों तक कार्बन वित्त पहुंचाने की संभावनाएं रखीं। कार्यक्रम में कृषि, ग्रामीण आजीविका, उद्योग और शिक्षण संस्थानों से जुड़े प्रतिनिधियों की भागीदारी रही। 
राष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय कार्बन बाजार का ढांचा तैयार किया गया है। केंद्र सरकार के अनुसार, कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना के ऑफसेट तंत्र में पात्र गैर-बाध्य संस्थाएं स्वेच्छा से ऐसी परियोजनाएं पंजीकृत करा सकती हैं, जिनसे उत्सर्जन में कमी, उत्सर्जन से बचाव या कार्बन निष्कासन हो। ऊर्जा दक्षता ब्यूरो की प्रकाशित पद्धतियों में धान की खेती के बेहतर प्रबंधन और छोटे कृषि प्रतिष्ठानों में पशुधन तथा गोबर प्रबंधन से मीथेन की रिकवरी जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इनका लाभ संबंधित पात्रता और परियोजना नियमों के अनुसार ही मिलेगा। 
किसानों तक वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए क्रेडिट की बिक्री के साथ परियोजना की लागत और आय बंटवारे की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण होगी। किसी परियोजना से जुड़ते समय किसान को यह स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि निगरानी कौन करेगा, खर्च कौन उठाएगा, भुगतान कब होगा और बिक्री से मिलने वाली राशि में उसका हिस्सा कितना रहेगा। फिलहाल झारखंड की पहल संभावनाओं और परियोजना विकास पर केंद्रित है। इससे अतिरिक्त आय का रास्ता खुल सकता है, लेकिन किसानों की कमाई कितनी बढ़ेगी, इसका आकलन ठोस परियोजनाओं और उनके परिणाम सामने आने के बाद होगा।
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