JAMMU जम्मू-कश्मीर/लद्दाख: उच्च न्यायालय ने कुपवाड़ा में 12 मई 2003 को हुए फिदायीन हमले के मामले में निचली अदालत के बरी फैसले को पलटते हुए तत्कालीन पुलिस स्टेशन सोगम के स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) गुलाम रसूल वानी को दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इस हमले में दो केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) जवान शहीद हुए और पांच अन्य घायल हुए थे। जस्टिस संजय परिहार और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने अपने 30 पेज के फैसले में कहा कि वानी ने जैश-ए-मोहम्मद (JeM) के सदस्य मोहम्मद इब्राहिम उर्फ खलील-उल्लाह के साथ मिलकर हमले की साजिश रची। अदालत ने पाया कि वानी ने आतंकवादी को पुलिस वाहन से हमले की जगह पर पहुँचाया, जिसके तुरंत बाद आतंकवादी ने गोलीबारी कर दो जवानों की हत्या की और पांच को घायल किया।
अदालत ने निचली अदालत के 2011 के फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि उसने कांस्टेबल अयाज अहमद, कांस्टेबल रियाज अहमद और ड्राइवर अली मोहम्मद मीर सहित गवाहों के मजबूत सबूतों को नजरअंदाज किया और केवल दो गवाहों के बयान पर निर्भर किया, जो गलत था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वानी ने अपनी आधिकारिक स्थिति का दुरुपयोग किया और आतंकवादी की गतिविधियों को जानबूझकर समर्थन दिया। खंडपीठ ने कहा, "वानी को खलील-उल्लाह की आतंकवादी पहचान और उसके इरादों की पूरी जानकारी थी। फिर भी उन्होंने आतंकवादी की गतिविधियों को चुपचाप सहमति दी और पुलिस वर्दी में रहते हुए उसका साथ दिया। उन्हें लोगों और सुरक्षाकर्मियों की सुरक्षा करनी थी, लेकिन वे खतरा बन गए।"
हालांकि, तत्कालीन पुलिस स्टेशन के मुंशी अब्दुल अहद राथर को बरी करने का फैसला बरकरार रखा गया, क्योंकि उनके खिलाफ साजिश का कोई सबूत नहीं मिला। अदालत ने बताया कि आपराधिक साजिश के लिए दो या अधिक लोगों का अवैध कार्य के लिए सहमत होना जरूरी है। केवल जानकारी या चर्चा पर्याप्त नहीं है। अदालत ने वानी को आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया और कहा कि निचली अदालत औपचारिक रूप से सजा का आदेश तैयार करेगी और उन्हें हिरासत में भेजा जाएगा। इस फैसले से जम्मू-कश्मीर पुलिस और सुरक्षा बलों के बीच विश्वास बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण संदेश गया है, और यह आतंकवाद के मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी को भी स्पष्ट करता है।