श्रीनगर :  जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान खुद को कश्मीरियों का हितैषी बताता है, लेकिन जब जम्मू-कश्मीर के लोगों के जल अधिकारों की बात आती है तो उसकी सहानुभूति गायब हो जाती है। मुख्यमंत्री ने सिंधु जल संधि को निलंबित रखने का समर्थन करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर को अपनी नदियों के पानी का उचित इस्तेमाल करने का अधिकार मिलना चाहिए।
उमर अब्दुल्ला ने शुक्रवार को कहा कि जम्मू-कश्मीर की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदियों के पानी से स्थानीय लोगों को लंबे समय तक वंचित रखा गया। उन्होंने कहा कि ये नदियां जम्मू-कश्मीर से बहती हैं और इनके पानी पर पहला अधिकार यहां के लोगों का होना चाहिए था। सिंधु जल संधि के कारण प्रदेश को अपनी जल संपदा का पूरी क्षमता से उपयोग करने की अनुमति नहीं मिली और जम्मू-कश्मीर को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा।
मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान को घेरते हुए कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खुद को कश्मीरियों का बड़ा हितैषी बताता है, लेकिन जब कश्मीरियों को उनकी अपनी नदियों के पानी का उपयोग करने का अधिकार नहीं मिला तो उसने कभी उनकी समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सवाल किया कि उस समय पाकिस्तान की कथित सहानुभूति कहां थी, जब जम्मू-कश्मीर के लोग अपनी जल संपदा का लाभ नहीं उठा पा रहे थे।
उमर अब्दुल्ला ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी निलंबित है और इसे निलंबित ही रहना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि इससे जम्मू-कश्मीर को अपनी जल जरूरतों, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए नदियों के पानी का बेहतर इस्तेमाल करने का अवसर मिल सकता है। उनके अनुसार, प्रदेश के विकास और लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए जल संसाधनों पर स्थानीय अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
भारत ने 23 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था। भारत सरकार ने उस समय कहा था कि यह निर्णय तब तक लागू रहेगा, जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को विश्वसनीय और स्थायी रूप से समर्थन देना बंद नहीं करता। भारत ने संधि को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय फिलहाल निलंबित रखने की घोषणा की थी।
सिंधु जल संधि वर्ष 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी तंत्र की छह नदियों के पानी का बंटवारा किया गया। संधि में रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों का पानी मुख्य रूप से भारत को मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियों के पानी के इस्तेमाल पर पाकिस्तान को व्यापक अधिकार दिए गए। भारत को पश्चिमी नदियों पर कुछ सीमित उपयोगों की अनुमति थी।
भारत का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में जल सहयोग को पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। दूसरी तरफ पाकिस्तान भारत के फैसले को एकतरफा और गैरकानूनी बताता रहा है। इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव बना हुआ है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस दौरान घाटी में कार्यरत कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को मिल रही आतंकी धमकियों का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को इन धमकियों को किसी भी स्थिति में हल्के में नहीं लेना चाहिए। बार-बार यह दावा किया जाता है कि जम्मू-कश्मीर से आतंकवाद समाप्त हो गया है, लेकिन ऐसी धमकियों का सामने आना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने सवाल किया कि अगर घाटी में कोई आतंकवादी नहीं बचा है तो कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को धमकियां कौन दे रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सुरक्षा एजेंसियों को धमकी देने वालों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए। घाटी में सेवाएं दे रहे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों और उनके परिवारों के लिए सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने चाहिए।
अब्दुल्ला ने याद दिलाया कि कुछ वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर हत्याएं की गई थीं। इन घटनाओं के बाद कई कर्मचारी घाटी छोड़ने की तैयारी करने लगे थे। उस दौरान उन्हें कथित रूप से शिविरों में रोककर रखा गया और बाहर जाने वाले रास्तों पर पाबंदियां लगाई गईं। उन्होंने कहा कि पुरानी घटनाओं को देखते हुए ताजा धमकियों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
मुख्यमंत्री ने केंद्र शासित प्रदेश की सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाले अधिकारियों से कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने कहा कि धमकियों के पीछे शामिल लोगों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि कश्मीरी पंडित कर्मचारी बिना डर के घाटी में अपना काम कर सकें।
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