Srinagar श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर रियासत के पूर्व महाराजा डॉ. करण सिंह ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय संकट को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सिकुड़ती झीलें, तेजी से गायब हो रही वेटलैंड्स और पीछे हटते ग्लेशियर भारत के पर्यावरणीय भविष्य के लिए एक स्पष्ट चेतावनी हैं, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
गुरुवार को “जम्मू-कश्मीर में प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण” विषय पर आयोजित सेमिनार के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास गतिविधियों के कारण जम्मू-कश्मीर का प्राकृतिक संतुलन तेजी से प्रभावित हो रहा है। उन्होंने विशेष रूप से डल झील का उदाहरण देते हुए कहा कि यह झील अब अपने मूल आकार के लगभग एक-तिहाई हिस्से तक ही सीमित रह गई है।
डॉ. करण सिंह ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब वे बच्चे थे, तब डल झील पूरी तरह भरी रहती थी, लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। उन्होंने बताया कि होकरसर, अंचार और अन्य दलदली क्षेत्र, जिन्हें उन्होंने कश्मीर की “किडनी” यानी प्राकृतिक फिल्टर सिस्टम बताया, अब लगभग समाप्त हो चुके हैं। इसी तरह वुलर झील भी लगातार सिकुड़ती जा रही है।
उन्होंने चेतावनी दी कि हिमालय जैसे संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र में मैदानी इलाकों की तरह विकास मॉडल अपनाना खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि सड़क निर्माण और बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए अलग और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।
पूर्व महाराजा ने कहा, “हर सड़क को चार-लेन हाईवे में बदलने की आवश्यकता नहीं है। हिमालय में सड़क निर्माण के मानक मैदानी क्षेत्रों से बिल्कुल अलग होने चाहिए।” उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने इस मुद्दे पर केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी से भी चर्चा की थी और अपनी चिंता साझा की थी।
यह सेमिनार श्रीनगर में ‘ग्रुप ऑफ कंसर्न्ड सिटिजन्स’ (GCC) द्वारा आयोजित किया गया था, जिसमें पूर्व नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों और सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों के पिघलने, वेटलैंड्स के संरक्षण, जंगलों की स्थिति, नदी प्रणालियों, अवैध खनन और जैव विविधता संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि हिमालयी क्षेत्र का पर्यावरण केवल स्थानीय नहीं बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां के पारिस्थितिकी बदलावों का असर व्यापक स्तर पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते संरक्षण उपाय नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
डॉ. करण सिंह ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि नीति निर्धारण में वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
सेमिनार में मौजूद प्रतिभागियों ने भी इस बात पर सहमति जताई कि हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती मानवीय गतिविधियां प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही हैं और इसे नियंत्रित करने के लिए ठोस नीति और सख्त क्रियान्वयन की जरूरत है।
इस पूरे आयोजन ने एक बार फिर हिमालयी पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।