जम्मू और कश्मीर : नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में अचानक आने वाली बाढ़ और ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरों पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। इस आपदा के बाद जम्मू-कश्मीर में भी ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियल झीलों की सुरक्षा और निगरानी को लेकर चिंता बढ़ गई है।

कश्मीर घाटी की पांच ग्लेशियल झीलों को पहले ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के बेहद ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। ऐसे में नेपाल की घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन और पूर्व तैयारी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

नेपाल की घटना को अभी GLOF नहीं माना गया

नेपाल में आई हालिया बाढ़ को फिलहाल आधिकारिक तौर पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड नहीं माना गया है। शुरुआती आकलनों के अनुसार, यह घटना संभवत: बर्फ और चट्टानों के बड़े पैमाने पर खिसकने यानी हिमस्खलन के कारण हुई हो सकती है।

विशेषज्ञों के शुरुआती अनुमान के मुताबिक, हिमस्खलन या चट्टानों के गिरने से नदी का बहाव कुछ समय के लिए बाधित हो गया होगा। इसके बाद अचानक पानी और मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर आया, जिससे भारी तबाही हुई।

हालांकि, इस पूरी घटना की विस्तृत जांच के बाद ही इसके वास्तविक कारणों की पुष्टि हो सकेगी।

कश्मीर में ग्लेशियल झीलों का खतरा

हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण कई नई झीलें बन रही हैं। इन झीलों में जमा पानी यदि प्राकृतिक बांध टूटने या किसी अन्य कारण से अचानक बाहर निकलता है तो विनाशकारी बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है।

जम्मू-कश्मीर में भी कई ऊंचाई वाले इलाकों में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से पांच झीलों को विशेषज्ञों ने GLOF के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना है।

इन झीलों की निगरानी करना इसलिए जरूरी है क्योंकि इनके फटने की स्थिति में नीचे बसे इलाकों में अचानक पानी, पत्थर और मलबे का तेज बहाव पहुंच सकता है।

आपदा प्रबंधन पर बढ़ा जोर

नेपाल की घटना के बाद विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी राज्यों को ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी और आपदा तैयारी को और मजबूत करना होगा।

ग्लेशियल झीलों में पानी के स्तर, आसपास की बर्फ और चट्टानों की स्थिति तथा संभावित खतरे का समय रहते पता लगाना जरूरी है।

आधुनिक तकनीक, सैटेलाइट निगरानी और शुरुआती चेतावनी प्रणाली के जरिए ऐसे खतरों को कम किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ रही चुनौती

वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। तापमान में बढ़ोतरी से बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है, जिससे ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा भी बढ़ जाता है। हिमालयी क्षेत्रों में बसे राज्यों के लिए यह आने वाले समय की बड़ी चुनौती मानी जा रही है।

कश्मीर में पहले से निगरानी की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर की संवेदनशील ग्लेशियल झीलों पर लगातार नजर रखना जरूरी है। किसी भी बदलाव का समय रहते पता चलने से नुकसान को कम किया जा सकता है।

इसके लिए स्थानीय प्रशासन, वैज्ञानिक संस्थानों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।

ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोगों को भी संभावित खतरे और आपात स्थिति में बचाव के तरीकों की जानकारी देना जरूरी है।

नेपाल की घटना से मिली चेतावनी

नेपाल की आपदा ने हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद जोखिमों को फिर सामने ला दिया है। हालांकि यह घटना सीधे तौर पर GLOF से जुड़ी नहीं मानी जा रही, लेकिन इससे यह स्पष्ट हुआ है कि पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक घटनाएं कितनी तेजी से बड़ा संकट पैदा कर सकती हैं।

कश्मीर सहित अन्य हिमालयी क्षेत्रों के लिए यह घटना एक चेतावनी की तरह है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयारी और निगरानी व्यवस्था को और मजबूत करना होगा।

सुरक्षा उपायों पर बढ़ेगा ध्यान

अब उम्मीद की जा रही है कि ग्लेशियल झीलों की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और आपदा प्रबंधन योजनाओं पर और अधिक ध्यान दिया जाएगा।

हिमालयी क्षेत्रों में विकास कार्यों के साथ पर्यावरणीय सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी होगी, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को कम किया जा सके।

नेपाल की बाढ़ ने एक बार फिर साबित किया है कि पहाड़ी क्षेत्रों में छोटी सी प्राकृतिक हलचल भी बड़े संकट का रूप ले सकती है। ऐसे में समय रहते तैयारी और वैज्ञानिक निगरानी ही नुकसान को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है।

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