Jammu.जम्मू: शिक्षा विशेषज्ञ सुधीर सधोत्रा ने हाल ही में कहा कि CUET (केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा) को समाप्त करना समावेशी और समान अवसर वाली शिक्षा प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने बताया कि यह कदम उन छात्रों के लिए राहत प्रदान करेगा, जो विभिन्न पृष्ठभूमियों और शैक्षिक संसाधनों की असमानता के कारण कठिनाइयों का सामना कर रहे थे।
सधोत्रा ने कहा कि CUET ने भले ही केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया को मानकीकृत किया, लेकिन यह सभी छात्रों के लिए समान अवसर नहीं सुनिश्चित कर सका। विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों को तैयारी के लिए संसाधन और मार्गदर्शन की कमी के कारण मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। उन्होंने कहा, “CUET समाप्त करना शिक्षा प्रणाली में समावेशिता और न्याय की दिशा में एक सकारात्मक बदलाव है।”
उन्होंने यह भी बताया कि CUET की समाप्ति के बाद विश्वविद्यालय स्थानीय बोर्ड परीक्षाओं और आंतरिक मूल्यांकन पर अधिक भरोसा करेंगे। इसका उद्देश्य छात्रों की संपूर्ण शैक्षणिक क्षमता और उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को महत्व देना है। सधोत्रा ने कहा कि यह कदम शिक्षा प्रणाली को छात्र-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सधोत्रा ने सुझाव दिया कि अब विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्याय बनी रहे। उन्होंने कहा कि यह कदम केवल परीक्षा समाप्त करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि संपूर्ण शिक्षा नीति में सुधार और संसाधनों की उपलब्धता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि CUET के अंत से आर्थिक रूप से कमजोर और ग्रामीण छात्रों को लाभ होगा। उन्हें अब अपनी स्थानीय शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के आधार पर अवसर मिलेंगे, जिससे वे प्रतियोगिता के दबाव से मुक्त होकर अपने शैक्षिक प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
सधोत्रा ने यह स्पष्ट किया कि CUET को हटाने का मकसद केवल प्रक्रिया को सरल बनाना नहीं है, बल्कि यह समावेशी शिक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कदम है। उन्होंने विश्वविद्यालयों से आग्रह किया कि वे नवीन और लचीले प्रवेश मानदंड अपनाएं ताकि सभी वर्ग के छात्रों को समान रूप से प्रवेश मिल सके।
समग्र रूप से, CUET को समाप्त करने का यह निर्णय शिक्षा प्रणाली में समावेशिता, न्याय और अवसर समानता को बढ़ावा देने के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। सधोत्रा ने उम्मीद जताई कि इस कदम से छात्रों की शैक्षणिक क्षमता का सही आकलन होगा और शिक्षा प्रणाली अधिक समान अवसर आधारित और समावेशी बनेगी।