शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) में शुक्रवार को ‘हिमाचल प्रदेश स्टेट यूनिवर्सिटीज (संशोधन) बिल, 2026’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया। विश्वविद्यालय के शिक्षकों, गैर-शिक्षण कर्मचारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने काले रिबन पहनकर शांतिपूर्ण मार्च निकाला और राज्य सरकार से संशोधन विधेयक वापस लेने की मांग की। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि विश्वविद्यालयों की संस्थागत और अकादमिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखा जाना चाहिए।विरोध मार्च का आयोजन हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी टीचर्स वेलफेयर एसोसिएशन (HPUTWA) के आह्वान पर किया गया। संगठन ने विश्वविद्यालय समुदाय से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध दर्ज कराने के लिए काले रिबन पहनकर मार्च में शामिल होने की अपील की थी। एक दिन पहले HPUTWA ने इस मुद्दे पर कार्यक्रम आयोजित कर विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, अकादमिक स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा से जुड़े सवाल उठाए थे।
शुक्रवार को आयोजित मार्च में विश्वविद्यालय समुदाय के अलग-अलग वर्गों के लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शन के दौरान काले रिबन को विरोध के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया। आयोजकों ने इसे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रदर्शन बताते हुए कहा कि उनका उद्देश्य प्रस्तावित बदलावों को लेकर विश्वविद्यालय समुदाय की चिंताओं को सरकार के सामने रखना है।मार्च के बाद लोगों को संबोधित करते हुए HPUTWA के अध्यक्ष प्रोफेसर नितिन व्यास ने दावा किया कि बड़ी संख्या में विश्वविद्यालय समुदाय की भागीदारी प्रस्तावित बदलावों को लेकर मौजूद चिंता को दिखाती है।प्रोफेसर व्यास ने कहा कि HPU समुदाय अपनी स्वायत्तता से समझौता नहीं करना चाहता। उन्होंने आरोप लगाया कि संशोधन विधेयक विश्वविद्यालय की अकादमिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करेगा। उन्होंने कहा कि HPUTWA इस विधेयक का विरोध जारी रखेगा और सरकार से इसे वापस लेने की मांग करता है। यह शिक्षक संगठन का पक्ष है और राज्य सरकार इस विधेयक के उद्देश्य को अलग तरीके से प्रस्तुत करती रही है।
हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने सितंबर की शुरुआत में ‘हिमाचल प्रदेश स्टेट यूनिवर्सिटीज (संशोधन) बिल, 2026’ को पारित किया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक विधेयक विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों और वित्तीय प्रशासन से संबंधित व्यवस्थाओं में बदलाव करता है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों में भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी और योग्यता आधारित बनाना तथा वित्तीय जवाबदेही मजबूत करना है।दूसरी तरफ विश्वविद्यालय शिक्षक संगठनों और विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस विधेयक पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक, प्रशासनिक और संस्थागत स्वतंत्रता बनाए रखना जरूरी है और सरकारी नियंत्रण बढ़ने से स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है। इसी मुद्दे को लेकर पिछले कुछ सप्ताह से शिक्षक संगठन विरोध कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।
विधेयक के प्रावधानों को लेकर सबसे अधिक चर्चा विश्वविद्यालयों में भर्ती और वित्तीय व्यवस्था पर हो रही है। उपलब्ध विवरण के मुताबिक संशोधित व्यवस्था में गैर-शिक्षण पदों की भर्ती में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की भूमिका का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था से संबंधित समिति में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। सरकार इन्हें पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन से जोड़ रही है, जबकि विरोध करने वाले पक्ष इसे विश्वविद्यालयों की निर्णय लेने की स्वतंत्रता से जोड़कर देख रहे हैं।सरकार का पक्ष है कि संशोधन का मकसद विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता समाप्त करना नहीं, बल्कि भर्ती व्यवस्था में पारदर्शिता, योग्यता आधारित चयन और वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करना है। वहीं विरोध करने वाले शिक्षक संगठन का कहना है कि जवाबदेही और पारदर्शिता जरूरी हैं, लेकिन इन्हें लागू करते समय अकादमिक एवं संस्थागत स्वायत्तता भी सुरक्षित रहनी चाहिए।
HPUTWA ने 24 सितंबर को भी विश्वविद्यालय में इस विषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इसमें विश्वविद्यालय की स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता पर चर्चा हुई। संगठन ने कहा था कि विश्वविद्यालय ज्ञान, शोध, नवाचार और स्वतंत्र चिंतन के केंद्र हैं, इसलिए उनसे संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों में विश्वविद्यालय समुदाय की चिंताओं और विचारों को उचित महत्व मिलना चाहिए।इसी कार्यक्रम के दौरान 25 सितंबर को पूरे विश्वविद्यालय समुदाय से काले रिबन पहनकर शांतिपूर्ण मार्च में शामिल होने की अपील की गई थी। शिक्षक संगठन ने शिक्षकों के साथ गैर-शिक्षण कर्मचारियों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से भी विरोध में भागीदारी की अपील की थी। शुक्रवार का प्रदर्शन इसी अभियान की अगली कड़ी रहा।
विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक को लेकर राज्य में राजनीतिक स्तर पर भी बहस हुई है। विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी भाजपा के विधायकों ने इसके कुछ प्रावधानों का विरोध किया था। दूसरी ओर सरकार ने इसे विश्वविद्यालयों की व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में उठाया गया कदम बताया।विरोध करने वाले शिक्षक इस मुद्दे को केवल नियुक्तियों तक सीमित नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों की अकादमिक स्वतंत्रता और आंतरिक निर्णय प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। HPUTWA का तर्क है कि किसी भी प्रशासनिक सुधार को लागू करते समय विश्वविद्यालयों की संस्थागत संरचना और स्वायत्तता को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
शुक्रवार के प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में विरोध शांतिपूर्ण रहा। काले रिबन पहनकर निकाले गए मार्च के जरिए प्रदर्शनकारियों ने सरकार तक अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश की। किसी हिंसा या टकराव की सूचना सामने नहीं आई।HPUTWA ने स्पष्ट किया है कि संशोधन विधेयक के खिलाफ उसका विरोध आगे भी जारी रहेगा। संगठन सरकार से विधेयक वापस लेने की मांग कर रहा है और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को अपने आंदोलन का मुख्य मुद्दा बता रहा है।इस पूरे विवाद में फिलहाल दो अलग-अलग पक्ष सामने हैं। राज्य सरकार संशोधन को भर्ती में पारदर्शिता, योग्यता आधारित चयन और वित्तीय अनुशासन से जोड़ रही है, जबकि HPUTWA और अन्य विरोध करने वाले समूह इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के लिए चिंता का विषय बता रहे हैं। शुक्रवार को HPU परिसर में निकला ‘ब्लैक रिबन’ मार्च इसी बहस का नया चरण है।
Tags: