Himachal Pradesh.हिमाचल प्रदेश: हिमाचल प्रदेश के सलूणी कॉलेज में प्राचीन तकरी लिपि को डिजिटाइज कर एक नई जीवनरेखा दी गई है। इस पहल में एक स्थानीय सांस्कृतिक संस्था ने सहयोग प्रदान किया, जिससे इस प्राचीन लिपि को संरक्षित करने और शोध के लिए उपलब्ध कराने का मार्ग खुला। तकरी लिपि, जो हिमाचल प्रदेश और पड़ोसी क्षेत्रों में इतिहास और साहित्य के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है, पिछले दशकों में धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही थी। कॉलेज प्रशासन और सांस्कृतिक संस्था ने मिलकर लिपि के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, पांडुलिपियों और रिकॉर्ड को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित किया।
सलूणी कॉलेज के वरिष्ठ प्राध्यापक ने बताया कि डिजिटलकरण से लिपि का संरक्षण सुनिश्चित हुआ है और यह शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए आसानी से सुलभ हो गई है। उन्होंने कहा, “तकरी लिपि की डिजिटाइजेशन ने इसे नए डिजिटल युग में जीवित रखा है। अब इसे ऑनलाइन माध्यम से अध्ययन और अनुसंधान के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।” सांस्कृतिक संस्था के प्रतिनिधियों ने बताया कि उन्होंने लिपि के डिजिटाइजेशन के लिए तकनीकी सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने कहा कि यह प्रयास केवल ऐतिहासिक दस्तावेजों को सुरक्षित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्थानीय संस्कृति, भाषा और साहित्य की पहचान को बनाए रखने की दिशा में भी अहम कदम है।
इस पहल से कॉलेज के छात्रों और शोधकर्ताओं को भी नई सीखने और अनुसंधान के अवसर प्राप्त हुए हैं। अब वे डिजिटल संसाधनों का उपयोग करके प्राचीन लिपि और संबंधित साहित्य पर अध्ययन कर सकते हैं। स्थानीय अभिभावकों और समाज ने इस कदम की सराहना की है, जिससे युवा पीढ़ी में संस्कृति और इतिहास के प्रति जागरूकता बढ़ेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल संरक्षण न केवल विलुप्त होती लिपियों को बचाने में मदद करता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर शोध और ज्ञान साझा करने में भी सहायक है। उन्होंने कहा कि ऐसी पहलें स्थानीय भाषाओं और लिपियों को नई पीढ़ी के लिए जीवित रखने का सर्वोत्तम तरीका हैं। अंततः, सलूणी कॉलेज में प्राचीन तकरी लिपि का डिजिटाइजेशन हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह न केवल इतिहास और भाषा के अध्ययन को सुलभ बनाता है, बल्कि स्थानीय और वैश्विक समुदाय में संस्कृति की पहचान बनाए रखने में भी मदद करेगा।