लिव-इन पार्टनर के नाम वसीयत: हाई कोर्ट ने वसीयत की कानूनी वैधता को सही और उचित ठहराया।
चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (High Court) ने तीन दशक से भी अधिक पुराने एक पैतृक कृषि भूमि विवाद का निपटारा करते हुए एक बेहद ऐतिहासिक और दूरगामी महत्व का फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह एक साथ रहते हैं, तो कानून उनके विवाह की धारणा को पूरी तरह स्वीकार करता है। ऐसे में, उस महिला के पक्ष में की गई किसी भी वसीयत (Will) को केवल इस तकनीकी या सामाजिक आधार पर अमान्य या अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि उनके विवाह या पारंपरिक 'करेवा विवाह' को लेकर कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, अथवा वह महिला मृतक की रक्त संबंधी उत्तराधिकारी (Blood Relative) नहीं है।
यह पूरा मामला करीब 34 साल पुराना है, जो यमुनानगर के जगाधरी क्षेत्र की पैतृक कृषि भूमि के मालिकाना हक से जुड़ा हुआ था। मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट के जस्टिस हरकेश मनुजा ने सुरमुख सिंह व अन्य पक्षकारों की ओर से दायर की गई नियमित द्वितीय अपील (Regular Second Appeal) को पूरी तरह से खारिज कर दिया। इसके साथ ही, उच्च न्यायालय ने इस मामले में जगाधरी की निचली अदालतों (Lower Courts) द्वारा पूर्व में दिए गए उन फैसलों को पूरी तरह बरकरार रखा है, जिसमें महिला के पक्ष में की गई वसीयत को सही ठहराया गया था।
अदालत ने इस मामले की गहराई में जाते हुए पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों पर भी एक बेहद मानवीय और तार्किक टिप्पणी की। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि किसी भी संतानहीन व्यक्ति को यह पूरा कानूनी अधिकार है कि वह अपनी देखरेख और सेवा करने वाले किसी भी व्यक्ति के पक्ष में अपनी अर्जित या पैतृक संपत्ति की वसीयत कर सके। कोर्ट ने साफ किया कि अगर किसी व्यक्ति की अपनी कोई संतान नहीं है और जीवन के अंतिम पड़ाव में कोई अन्य व्यक्ति (चाहे वह लिव-इन पार्टनर हो या कोई सेवादार) उसकी निस्वार्थ सेवा करता है, तो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के तहत उस व्यक्ति को अपनी संपत्ति अपनी इच्छानुसार सौंपने का पूरा हक है।
इस मामले की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो, मृतक व्यक्ति अपनी लिव-इन पार्टनर (जो लंबे समय तक उनके साथ पत्नी की तरह रहीं) के साथ जीवन व्यतीत कर रहा था। व्यक्ति की मृत्यु से पहले उसने अपनी पूरी कृषि भूमि और संपत्ति की वसीयत उस महिला के नाम कर दी थी। लेकिन व्यक्ति के निधन के बाद, उसके अन्य रक्त संबंधियों और कानूनी वारिसों ने इस वसीयत को अदालत में चुनौती दे दी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि चूंकि महिला और मृतक के बीच कोई औपचारिक विवाह सिद्ध नहीं हुआ है और न ही वह परिवार की रक्त संबंधी है, इसलिए पैतृक संपत्ति पर उसका कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता है।
हालांकि, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और पेश किए गए साक्ष्यों का बारिकी से अध्ययन करने के बाद, पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि लंबे समय तक एक छत के नीचे पति-पत्नी की तरह रहने के कारण समाज और कानून दोनों ही उस रिश्ते को विवाह के समतुल्य मानते हैं। ऐसे में वसीयतकर्ता की इच्छा और उसकी सेवा के बदले दिए गए अधिकार को कानूनी वारिसों के महज पैतृक दावों के आधार पर बदला नहीं जा सकता।
हाई कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में लिव-इन रिलेशनशिप, वसीयत के अधिकारों और संतानहीन बुजुर्गों की संपत्ति सुरक्षा से जुड़े मामलों में एक नजीर (Precedent) साबित होगा। इस फैसले ने यह साफ कर दिया है कि वसीयत करते समय वसीयतकर्ता की मंशा और उसकी सेवा करने वाले व्यक्ति के प्रति उसका आभार सबसे महत्वपूर्ण होता है, न कि केवल पारंपरिक रक्त संबंध। इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद पिछले 34 वर्षों से चला आ रहा यह जटिल कानूनी विवाद अब हमेशा के लिए शांत हो गया है और पीड़ित महिला को उसकी लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार न्याय मिल गया है।