IPU IVF तकनीक से जन्मी बछिया बद्री देसी नस्ल संरक्षण को नई ताकत
IVF से जन्मी बद्री देसी पशु नस्ल संरक्षण में नया अध्याय
चंडीगढ़: हरियाणा में पशुपालन और देसी गोवंश के नस्ल सुधार की दिशा में बड़ी उपलब्धि सामने आई है। अत्याधुनिक IPU-IVF तकनीक की मदद से ‘बद्री’ नाम की बछिया का जन्म हुआ है। इस सफलता को उन्नत प्रजनन तकनीक के इस्तेमाल और देशी पशु नस्लों के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तरह की तकनीकों के जरिए बेहतर आनुवंशिक गुणों वाले पशुओं की संख्या तेजी से बढ़ाने में मदद मिल सकती है। IPU-IVF यानी इंट्रा-ओवम पिकअप और इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन से जुड़ी तकनीक में चयनित मादा पशु से अंडाणु प्राप्त किए जाते हैं। इसके बाद नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में उनका निषेचन कर भ्रूण विकसित किया जाता है और तैयार भ्रूण को दूसरी स्वस्थ मादा पशु में प्रत्यारोपित किया जाता है।
'बद्री' के जन्म को क्यों माना जा रहा खास?
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि उच्च आनुवंशिक क्षमता वाले पशुओं से अपेक्षाकृत अधिक संतति तैयार करने की संभावना बनती है। सामान्य प्राकृतिक प्रजनन में एक गाय सीमित संख्या में बछड़ों को जन्म दे सकती है, जबकि IVF जैसी तकनीक से चुने हुए पशुओं की आनुवंशिक विशेषताओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। ‘बद्री’ के जन्म को इसी दिशा में मिली सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इससे पशुपालकों के लिए भविष्य में अधिक दूध उत्पादन, बेहतर स्वास्थ्य और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल पशुधन विकसित करने के प्रयासों को गति मिल सकती है।
देसी नस्लों के संरक्षण में मिलेगी मदद
भारत में गायों की कई देशी नस्लें मौजूद हैं, जिनकी अपनी विशेषताएं हैं। कुछ नस्लें गर्म मौसम को बेहतर तरीके से सहन करती हैं तो कुछ में रोग प्रतिरोधक क्षमता और स्थानीय जलवायु के अनुसार अनुकूलन की क्षमता अधिक होती है। बदलते समय में कई पारंपरिक नस्लों की संख्या और शुद्ध आनुवंशिक विशेषताओं को बनाए रखना चुनौती बना हुआ है। ऐसे में वैज्ञानिक प्रजनन तकनीक का इस्तेमाल करके श्रेष्ठ पशुओं के जर्मप्लाज्म को संरक्षित और आगे बढ़ाया जा सकता है।
कैसे काम करती है IVF तकनीक?
इस प्रक्रिया में सबसे पहले आनुवंशिक रूप से बेहतर मानी गई गाय से अंडाणु एकत्र किए जाते हैं। प्रयोगशाला में चुने हुए सांड के वीर्य से उनका निषेचन कराया जाता है। सफल निषेचन के बाद भ्रूण को कुछ दिनों तक नियंत्रित वातावरण में विकसित किया जाता है। इसके बाद स्वस्थ भ्रूण को एक उपयुक्त सरोगेट गाय में प्रत्यारोपित किया जाता है। गर्भावस्था सामान्य तरीके से आगे बढ़ती है और निर्धारित समय पर बछड़े का जन्म होता है। पूरी प्रक्रिया विशेषज्ञ पशु चिकित्सकों और वैज्ञानिकों की निगरानी में की जाती है।
पशुपालकों की आय बढ़ाने में भी उपयोगी
उन्नत प्रजनन तकनीकों का उद्देश्य केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनकी आनुवंशिक गुणवत्ता में सुधार करना भी है। बेहतर नस्ल के दुधारू पशु तैयार होने पर दूध उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे पशुपालकों की आमदनी में भी सुधार की संभावना रहती है। हालांकि IVF जैसी तकनीक में प्रशिक्षित विशेषज्ञ, आधुनिक प्रयोगशाला, सही पशु चयन और लगातार स्वास्थ्य निगरानी जरूरी होती है। इसलिए इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए मजबूत पशु चिकित्सा ढांचे की आवश्यकता होती है। हरियाणा में ‘बद्री’ का जन्म इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक देशी पशुधन संरक्षण को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। अगर ऐसी तकनीकों का वैज्ञानिक तरीके से विस्तार होता है तो देशी नस्लों के संरक्षण और पशुधन की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है।