मोहर्रम पर गूंजा या हुसैन, रायपुर में ताजिया जुलूस निकला, मातम में डूबा मुस्लिम समुदाय

छग

Update: 2025-07-06 14:42 GMT
Raipur. रायपुर। मुस्लिम समुदाय ने रविवार को राजधानी रायपुर में मातमी त्योहार मोहर्रम गमगीन माहौल में मनाया। या हुसैन... या हुसैन की सदा और मातमी धुनों के साथ शहर के विभिन्न इलाकों से परंपरागत ताजिया जुलूस निकाले गए। इस मौके पर बुजुर्गों, युवाओं, महिलाओं और बच्चों ने भारी संख्या में हिस्सा लिया।


हजरत इमाम हुसैन की शहादत को दी श्रद्धांजलि
शहर के मोमिनपारा क्षेत्र से शुरू हुए इस ताजिया जुलूस की अगुवाई हैदरी मस्जिद ट्रस्ट द्वारा की गई। सुबह हैदरी मस्जिद में यौमे आशूरा की नमाज अदा की गई, जिसे मौलाना असगर मेंहदी ने पढ़ाया। इसके बाद दोपहर को हजरत
इमाम हुसैन
की शहादत को याद करते हुए परंपरागत ताजिया जुलूस निकला गया। जुलूस की शुरुआत में दर्द भरे मरसिये और नौहे पेश किए गए। शोक में डूबे लोगों ने काले वस्त्र पहनकर सीना-ज़नी करते हुए मातम किया।


राजकुमार कॉलेज से होते हुए करबला में समाप्त
ताजिया जुलूस मोमिनपारा से शुरू होकर हांडीपारा, आजाद चौक, राजकुमार कॉलेज होते हुए करबला मैदान में समाप्त हुआ। आजाद चौक में मौलाना असगर मेंहदी ने कर्बला की घटना और इमाम हुसैन की कुर्बानी के उद्देश्यों पर तकरीर दी। जगह-जगह शरबत, पानी, फल और सबीलों का इंतजाम किया गया था। सामाजिक संगठनों और मुस्लिम समुदाय की समितियों ने सेवा भाव से लोगों का स्वागत किया, जो इंसानियत और करुणा के मूल इस्लामी सिद्धांत को दर्शाता है।


मोहर्रम क्यों मनाया जाता है?
मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है। इस महीने की 10 तारीख को यौमे आशूरा मनाया जाता है, जिस दिन हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने कर्बला में शहादत दी थी। इराक के अत्याचारी शासक यज़ीद के खिलाफ इंसाफ की लड़ाई में उन्होंने भूखे-प्यासे रहकर भी इंसानियत का परचम ऊंचा रखा। मोहर्रम का महीना त्याग, बलिदान और इंसानियत की शिक्षा देता है, जिसमें भूखों को खाना खिलाना, पानी पिलाना और सेवा करना प्रमुख परंपरा है।
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