रायपुर: झीरम घाटी नक्सली हमले में जगदलपुर एनआईए कोर्ट 5 सितंबर को फैसला सुनाने वाली है। 25 मई 2013 को झीरम हमले में कांग्रेस नेता नंदकुमार पटेल, विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा समेत 29 लोगों की मौत हो गई थी। राजनीतिक घमासान और आरोप-प्रत्यारोप के बीच पूरे 13 साल इसकी जांच चली और अब जब उसका फैसला आने वाला है तो उसकी जांच को लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों से इस पर अलग-अलग राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हुए हैं। नेताओं पर हुए अब तक के सबसे बड़े नक्सल हमले के मामले में 11 नक्सलियों पर केस चला। उनमें से एक की माैत हो चुकी है।
अभियोजन पक्ष ने इस दौरान 101 गवाह और दस्तावेज पेश किए। एनआईए ने 2013 में एनआईए ने केस रजिस्टर्ड किया, जिसका नंबर RC-06/2013/NIA/DLI है। 23 दिसंबर 2023 को एनआईए ने राष्ट्रीय अखबारों में ‘झीरम घाटी हत्याकांड एनआईए केस में वांछित’ शीर्षक से विज्ञापन जारी किया था। इसमें 19 आरोपी नक्सलियों के नाम, पते समेत तमाम जानकारी जारी की थी। इसमें पहला नाम नक्सली लीडर देवजी का था।
इसके अलावा बारसे सुक्का ऊर्फ देवा का भी नाम उस सूची में था। एनआईए ने विज्ञापन में लिखा- इन माओवादी के संबंध में किसी भी प्रकार की सूचना देने या गिरफ्तार करवाने में सहयोग करने वाले को उचित इनाम दिया जाएगा।
नरसंहार में अब तक दो न्यायिक जांच आयोग बने हैं। 2013 में विशेष न्यायिक जांच आयोग जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में बना था। उसे सुरक्षा में चूक, एसओपी, रैली आयोजकों की भूमिका, पुलिस-बलों का समन्वय की जांच करना था।
2013 में ही राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए को इसकी जांच सौंप दी गई थी। 2018 में कांग्रेस सरकार आने पर एसआईटी बनी। इसमें कथित राजनीतिक षड्यंत्रों की जांच करने का दावा किया गया था। फिर 2021 में दूसरा न्यायिक जांच आयोग बना। इस आयोग की जिम्मेदारी जस्टिस सतीश अग्निहोत्री और जस्टिस गुलाम मिन्हाजुद्दीन को सौंपी गई थी।