रायपुर: छत्तीसगढ़ की पहचान अब सिर्फ खनिज संपदा और वन क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है। राज्य की प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक धरोहर, धार्मिक स्थल और जनजातीय संस्कृति आज पर्यटन के नए केंद्र बन रहे हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में पर्यटन के बढ़ते विकास के साथ प्रदेश के हजारों युवाओं, महिलाओं और स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। राज्य के सुदूर अंचलों में छिपी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक धरोहरों और आदिवासी कला-संस्कृति को जब संगठित पर्यटन का मंच मिला, तो इसने स्थानीय समुदायों के जीवन में बड़ा बदलाव ला दिया। पर्यटन ने यहाँ केवल पर्यटकों को आकर्षित नहीं किया, बल्कि रोजगार के हजारों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष अवसर पैदा कर गाँव-गाँव में आत्मनिर्भरता की नींव रख दी है।
प्राकृतिक खूबसूरती बनी रोजगार का आधार
छत्तीसगढ़ में मौजूद जलप्रपात, घने जंगल, पहाड़ियां और वन्यजीव क्षेत्र पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। बस्तर के चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, सिरपुर की ऐतिहासिक विरासत, राजिम का धार्मिक महत्व और मैनपाट की प्राकृतिक सुंदरता प्रदेश के पर्यटन नक्शे पर तेजी से उभर रहे हैं। इन पर्यटन स्थलों के विकास के साथ स्थानीय लोगों को गाइड, होटल, होम स्टे, वाहन सेवा, हस्तशिल्प बिक्री और स्थानीय उत्पादों के कारोबार से जुड़ने का मौका मिल रहा है।
एक प्रदेश में पर्यटन के इतने रंग
चित्रकोट की गर्जना, तीरथगढ़ की दूधिया धाराएं, कांगेर घाटी का रहस्यमय जंगल, सिरपुर के पुरातात्विक अवशेष, राजिम की आध्यात्मिकता और मैनपाट की शांत पहाड़ियां—ये सभी मिलकर छत्तीसगढ़ के पर्यटन की विविधता को सामने लाते हैं।
प्रदेश की खासियत यही है कि यहां यात्रा का अनुभव कुछ किलोमीटर और कुछ घंटों के बाद पूरी तरह बदल सकता है। कहीं प्रकृति अपनी विराटता दिखाती है तो कहीं पत्थर और ईंटों में इतिहास सुरक्षित मिलता है। कहीं जंगल रोमांच पैदा करते हैं तो कहीं नदी किनारे मंदिर आध्यात्मिक शांति देते हैं।
छत्तीसगढ़ आने वाले पर्यटक अगर इन स्थानों को अलग-अलग यात्राओं में भी देखें तो उन्हें प्रदेश के कई अलग चेहरे देखने को मिलेंगे। स्थानीय संस्कृति, खानपान और जनजातीय परंपराओं को समझने का अवसर इस सफर को और खास बनाता है।
चित्रकोट जहां इंद्रावती रचती है अद्भुत नजारा
बस्तर की बात हो और चित्रकोट जलप्रपात का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। इंद्रावती नदी यहां ऊंचाई से नीचे गिरते हुए विशाल जलप्रपात का रूप लेती है। बरसात के दिनों में जब नदी पूरे वेग में होती है, तब चित्रकोट की खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है। दूर तक फैली पानी की धाराएं और उनसे उठती महीन फुहार पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं।
जलप्रपात के आसपास का हराभरा इलाका इसकी सुंदरता को और बढ़ाता है। अलग-अलग मौसम में चित्रकोट का स्वरूप भी बदलता दिखाई देता है। मानसून में विशाल और गर्जना करता झरना दिखाई देता है, जबकि पानी कम होने पर इसकी अलग-अलग धाराएं चट्टानों से नीचे उतरती नजर आती हैं।
सूर्यास्त के समय चित्रकोट का दृश्य विशेष रूप से आकर्षक होता है। पानी पर पड़ती सूरज की आखिरी किरणें पूरे क्षेत्र को अलग रंग देती हैं। यही वजह है कि बस्तर पहुंचने वाले पर्यटकों की सूची में चित्रकोट सबसे ऊपर रहता है।
तीरथगढ़ में सीढ़ियों की तरह उतरता पानी
चित्रकोट की विशालता से अलग तीरथगढ़ जलप्रपात अपनी बनावट के कारण खास पहचान रखता है। कांगेर घाटी क्षेत्र में मौजूद यह झरना चट्टानों की प्राकृतिक संरचना पर कई स्तरों से नीचे उतरता है। सफेद पानी जब हरी-भरी पहाड़ियों और चट्टानों के बीच बहता है तो पूरा नजारा किसी प्राकृतिक चित्र जैसा दिखाई देता है।
बारिश के बाद यहां हरियाली अपने चरम पर होती है। झरने की आवाज, आसपास का घना जंगल और ठंडी हवा पर्यटकों को प्रकृति के बेहद करीब होने का अनुभव कराती है। फोटोग्राफी और प्राकृतिक पर्यटन पसंद करने वालों के लिए तीरथगढ़ खास आकर्षण है।
हालांकि मानसून के दौरान जलप्रवाह तेज होने पर पर्यटकों को सुरक्षा संबंधी निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी है। प्राकृतिक स्थलों की खूबसूरती का आनंद सुरक्षित दूरी से लेना ही बेहतर है।
कांगेर घाटी जहां जंगल के भीतर छिपी है दूसरी दुनिया
बस्तर की प्राकृतिक संपदा का एक और महत्वपूर्ण केंद्र कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान है। घने जंगलों, पहाड़ियों, गुफाओं, जलधाराओं और जैव विविधता से भरपूर यह इलाका प्रकृति प्रेमियों के लिए खास अनुभव देता है।
कांगेर घाटी की यात्रा केवल जंगल देखने तक सीमित नहीं रहती। क्षेत्र की प्राकृतिक गुफाएं पर्यटकों में विशेष आकर्षण पैदा करती हैं। धरती के भीतर बनी चट्टानी संरचनाएं हजारों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया की कहानी सुनाती प्रतीत होती हैं।
जंगल के भीतर पक्षियों की आवाज और पेड़ों के बीच से आती रोशनी शहरों के शोर से बिल्कुल अलग दुनिया का अहसास कराती है। पर्यावरण और वन्यजीव पर्यटन में रुचि रखने वालों के लिए कांगेर घाटी छत्तीसगढ़ के प्रमुख स्थलों में शामिल है।
सिरपुर की मिट्टी में आज भी मौजूद इतिहास
प्राकृतिक पर्यटन से आगे बढ़ें तो छत्तीसगढ़ का सिरपुर इतिहास के पन्नों में ले जाता है। महानदी के किनारे स्थित सिरपुर प्राचीनकाल में महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र रहा है। यहां मौजूद मंदिरों, पुरातात्विक अवशेषों और बौद्ध विरासत के प्रमाण इस क्षेत्र के गौरवशाली अतीत की कहानी बताते हैं।
सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। ईंटों से निर्मित इसकी संरचना और बारीक नक्काशी आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों का ध्यान खींचती है। सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषताओं में विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़ी विरासत का एक ही क्षेत्र में मिलना है। पुरातात्विक खोजों ने इसे भारतीय इतिहास और संस्कृति के अध्ययन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बनाया है।
यहां घूमते समय ऐसा महसूस होता है जैसे जमीन पर दिखाई देने वाला हर अवशेष सदियों पुरानी किसी कहानी का हिस्सा हो।
राजिम जहां आस्था से मिलता है महानदी का किनारा
छत्तीसगढ़ के धार्मिक पर्यटन की चर्चा राजिम के बिना अधूरी है। महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के संगम क्षेत्र के कारण राजिम का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां स्थित प्राचीन मंदिर और धार्मिक परंपराएं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं।
राजीव लोचन मंदिर यहां के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। मंदिर परिसर की वास्तुकला और आसपास मौजूद प्राचीन धार्मिक संरचनाएं राजिम की ऐतिहासिकता को भी सामने लाती हैं। विशेष धार्मिक आयोजनों के दौरान राजिम में श्रद्धालुओं की बड़ी मौजूदगी देखने को मिलती है। नदी का तट, मंदिरों की घंटियां और धार्मिक वातावरण इसे सामान्य पर्यटन स्थल से अलग आध्यात्मिक अनुभव प्रदान करते हैं।
मैनपाट छत्तीसगढ़ के पहाड़ों में बसी खूबसूरत दुनिया
बस्तर के झरनों और सिरपुर-राजिम की विरासत से अलग सरगुजा का मैनपाट छत्तीसगढ़ के हिल पर्यटन का खूबसूरत चेहरा है। पहाड़, हरियाली, घुमावदार रास्ते और ठंडी आबोहवा मैनपाट को प्रदेश के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में स्थान देते हैं।
बरसात के बाद यहां की पहाड़ियां हरियाली की चादर ओढ़ लेती हैं। वहीं सर्दियों में मैनपाट का मौसम पर्यटकों को खासा आकर्षित करता है। सुबह का कोहरा और शांत वातावरण यहां की यात्रा को यादगार बना सकता है।
मैनपाट में तिब्बती समुदाय की मौजूदगी ने स्थानीय संस्कृति को भी विशिष्ट पहचान दी है। प्रकृति और अलग सांस्कृतिक अनुभव की तलाश करने वाले यात्रियों के लिए यह क्षेत्र आकर्षक विकल्प है।
घटारानी जंगल के बीच छिपा है खूबसूरत पर्यटन स्थल
गरियाबंद जिले का बड़ा हिस्सा वन क्षेत्र से घिरा हुआ है। इसी प्राकृतिक परिवेश के बीच स्थित Ghatarani Waterfall पर्यटकों को शहर के शोर से दूर एक अलग अनुभव देता है। यहां पहुंचते ही घना जंगल और चट्टानों के बीच बहता पानी पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींचता है।
गरियाबंद जिला प्रशासन भी घटारानी को जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल करता है। जिला प्रशासन की पर्यटन संबंधी जानकारी में जतमई, घटारानी, भूतेश्वरनाथ, राजीव लोचन मंदिर और कुलेश्वरनाथ जैसे स्थानों को जिले के प्रमुख आकर्षणों में गिना गया है।
मानसून के बाद निखर जाती है खूबसूरती
घटारानी की असली खूबसूरती पानी और हरियाली में छिपी है। बारिश के बाद आसपास के जंगल हरे-भरे हो जाते हैं और झरने में पानी का प्रवाह बढ़ जाता है। जिला प्रशासन के अनुसार मानसून के बाद यहां घूमने का समय बेहतर माना जाता है। झरने का पानी नीचे प्राकृतिक कुंड की ओर जाता है, जिससे पूरा इलाका बेहद आकर्षक दिखाई देता है।
पानी की आवाज और जंगल की शांति मिलकर ऐसा माहौल बनाती है कि पर्यटक यहां घंटों समय बिताना पसंद करते हैं। परिवार के साथ पिकनिक मनाने वाले लोगों से लेकर फोटोग्राफी और प्रकृति प्रेमियों तक के लिए घटारानी खास आकर्षण रखता है।
सिर्फ वॉटरफॉल नहीं आस्था का भी केंद्र
घटारानी की पहचान केवल प्राकृतिक जलप्रपात तक सीमित नहीं है। यहां स्थित माता का मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है। खासकर नवरात्रि के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की मौजूदगी और धार्मिक माहौल बढ़ जाता है। मंदिर की विशेष सजावट भी आकर्षण का केंद्र रहती है। इस तरह यहां आने वाले पर्यटकों को एक ही स्थान पर प्रकृति और धार्मिक आस्था दोनों का अनुभव मिलता है।
जतमई से करीब 25 किलोमीटर दूर
घटारानी को अक्सर जतमई के साथ जोड़कर देखा जाता है। दोनों स्थान गरियाबंद के प्रमुख प्राकृतिक और धार्मिक पर्यटन केंद्र हैं। जिला प्रशासन के अनुसार घटारानी का बड़ा जलप्रपात जतमई मंदिर से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित है। यही कारण है कि कई पर्यटक अपनी यात्रा में जतमई और घटारानी दोनों स्थानों को शामिल करते हैं।
रायपुर से भी आसानी से बना सकते हैं प्लान
राजधानी रायपुर से भी घटारानी की यात्रा की जा सकती है। गरियाबंद जिला प्रशासन के पर्यटन पेज के मुताबिक स्वामी विवेकानंद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से इसकी दूरी लगभग 77.6 किलोमीटर और रायपुर रेलवे स्टेशन से करीब 90.4 किलोमीटर बताई गई है। सड़क मार्ग से भी यहां पहुंचा जा सकता है।
इस वजह से रायपुर और आसपास रहने वाले लोगों के लिए घटारानी एक दिन की यात्रा या वीकेंड ट्रिप का अच्छा विकल्प बन जाता है।
रोमांच पसंद करने वालों के लिए भी खास
झरने और मंदिर के अलावा आसपास का जंगल भी घटारानी की खूबसूरती बढ़ाता है। जिला प्रशासन की जानकारी में जंगल में हाइकिंग का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि बारिश के दौरान चट्टानों पर फिसलन और पानी का तेज बहाव जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में पर्यटकों को सुरक्षित स्थानों पर रहकर ही प्राकृतिक नजारों का आनंद लेना चाहिए।
खासकर बच्चों और बुजुर्गों के साथ आने वाले परिवारों को पानी की तेज धारा और फिसलन वाली चट्टानों से दूरी बनाए रखना जरूरी है। मौसम खराब होने या भारी बारिश की स्थिति में स्थानीय प्रशासन के निर्देशों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
छत्तीसगढ़ पर्यटन का खूबसूरत चेहरा
घटारानी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां किसी कृत्रिम पर्यटन आकर्षण की जरूरत महसूस नहीं होती। जंगल, चट्टान, बहता पानी और धार्मिक आस्था मिलकर स्वयं इस जगह की पहचान बनाते हैं। गरियाबंद जिले में पर्यटन की व्यापक संभावनाओं के बीच घटारानी उन स्थानों में शामिल है, जो छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक पर्यटन को अलग पहचान देते हैं।
बारिश के बाद जब झरना अपने प्रवाह में होता है और आसपास की पहाड़ियां व जंगल हरियाली से भर जाते हैं, तब घटारानी का नजारा किसी प्राकृतिक चित्र जैसा दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रकृति के करीब कुछ वक्त बिताने, माता के दर्शन करने और परिवार के साथ यादगार सफर की तलाश करने वालों के लिए घटारानी खास ठिकाना बन चुका है।
गांवों में पहुंचा रोजगार का अवसर
पहले कई ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को रोजगार के लिए बड़े शहरों की ओर पलायन करना पड़ता था। लेकिन पर्यटन गतिविधियों के विस्तार ने अब गांवों में ही कमाई के साधन उपलब्ध कराने शुरू कर दिए हैं।
स्थानीय युवा पर्यटकों को क्षेत्र की जानकारी देने के लिए गाइड का काम कर रहे हैं। वहीं महिलाएं स्व-सहायता समूहों के माध्यम से स्थानीय व्यंजन, बांस कला, हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों की बिक्री कर आय अर्जित कर रही हैं।
होम स्टे योजना से बदल रही तस्वीर
पर्यटन के क्षेत्र में होम स्टे की अवधारणा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है। पर्यटक अब स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली को करीब से समझने के लिए गांवों में ठहरना पसंद कर रहे हैं।
इससे ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय मिल रही है। घर के खाली कमरों का उपयोग कर लोग पर्यटन से सीधे जुड़ रहे हैं। इससे युवाओं और महिलाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिल रहा है।
संस्कृति और परंपरा बनी आर्थिक ताकत
छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, लोक कला, नृत्य और पारंपरिक खानपान पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं। बस्तर दशहरा, मड़ई मेले और स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों में बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।
इन आयोजनों से जुड़े कलाकारों, कारीगरों और छोटे व्यापारियों को आर्थिक लाभ मिलता है। प्रदेश की संस्कृति अब सिर्फ पहचान नहीं बल्कि रोजगार का माध्यम भी बन रही है।
युवाओं के लिए खुल रहे नए अवसर
पर्यटन क्षेत्र में होटल मैनेजमेंट, ट्रैवल सर्विस, फोटोग्राफी, डिजिटल प्रमोशन, एडवेंचर टूरिज्म और परिवहन जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए अवसर बढ़ रहे हैं।
सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी से पर्यटन आधारित कौशल विकास पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे युवा बेहतर रोजगार के लिए तैयार हो सकें।
महिलाओं की भागीदारी से बढ़ी आत्मनिर्भरता
पर्यटन क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। महिला समूह स्थानीय उत्पादों की बिक्री, कैफे संचालन, खानपान सेवाओं और हस्तशिल्प कारोबार से जुड़कर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं।
इससे परिवार की आय बढ़ने के साथ महिलाओं का आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
पर्यटन बना अर्थव्यवस्था का नया इंजन
छत्तीसगढ़ में पर्यटन सिर्फ घूमने-फिरने का माध्यम नहीं बल्कि रोजगार और आर्थिक विकास का बड़ा जरिया बनता जा रहा है। स्थानीय संसाधनों और संस्कृति को बढ़ावा देकर प्रदेश के लोग आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ रहे हैं।
आज पर्यटन से जुड़े छोटे-छोटे प्रयास हजारों परिवारों की जिंदगी बदल रहे हैं। आने वाले समय में छत्तीसगढ़ का पर्यटन क्षेत्र युवाओं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए रोजगार का मजबूत आधार बन सकता है।
प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत को मिलेगी वैश्विक पहचान
छत्तीसगढ़ को प्रकृति ने चित्रकोट और तीरथगढ़ जैसे जलप्रपात, बस्तर और सरगुजा की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, सिरपुर जैसी ऐतिहासिक विरासत और मां दंतेश्वरी और मां महामाया जैसे प्रमुख आस्था केंद्रों की समृद्ध विरासत प्रदान की है। सरकार का लक्ष्य इन प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संपदाओं को देश और दुनिया के सामने नई पहचान दिलाना है।
पर्यटन क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा
पिछले लगभग ढाई वर्षों में पर्यटन क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। फिल्म सिटी निर्माण के लिए 203 करोड़ 53 लाख रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं। फिल्म पर्यटन और बड़े आयोजनों को बढ़ावा देने के लिए फिल्म सिटी एवं कन्वेंशन सेंटर के विकास की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 350 करोड़ रुपये है।
चित्रकोट को बनाया जाएगा विश्वस्तरीय पर्यटन गंतव्य
छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन आकर्षणों में शामिल चित्रकोट को केवल जलप्रपात के रूप में नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय पर्यटन गंतव्य के रूप में विकसित करने की तैयारी है। वहीं सिरपुर के विस्तृत पर्यटन विकास के लिए एकीकृत मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। मैनपाट और जशपुर जैसे महत्वपूर्ण पर्यटन क्षेत्रों में भी पर्यटक सुविधाओं और पर्यटन अनुभव को बेहतर बनाने के प्रयास जारी हैं।
भोरमदेव कॉरिडोर के लिए 145.99 करोड़ रुपये स्वीकृत
धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों को राष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख स्थान दिलाने पर जोर दिया जा रहा है। भारत सरकार ने भोरमदेव कॉरिडोर के विकास के लिए 145 करोड़ 99 लाख रुपये स्वीकृत किए हैं। रतनपुर महामाया मंदिर क्षेत्र सहित अन्य क्षेत्रों के विकास के प्रस्ताव भी भारत सरकार को भेजे गए हैं।
डिजिटल पर्यटन को मिल रहा विस्तार
आज का पर्यटक अपनी यात्रा की शुरुआत मोबाइल फोन से करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए पर्यटन विभाग की नई वेबसाइट और मोबाइल ऐप के माध्यम से ऑनलाइन बुकिंग, डिजिटल सूचना और पर्यटन सुविधाओं को एकीकृत किया जा रहा है। पिछले दो वर्षों में ऑनलाइन बुकिंग से लगभग 6 करोड़ 48 लाख रुपये तथा पर्यटन इकाइयों से लगभग 31 करोड़ 75 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ है।
2028 तक छत्तीसगढ़ पर्यटन की नई पहचान का लक्ष्य
राज्य सरकार ने वर्ष 2028 तक छत्तीसगढ़ पर्यटन की नई पहचान देश और दुनिया के सामने स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री पर्यटन विकास मिशन के अंतर्गत अगले पांच वर्षों में प्रतिवर्ष 100 करोड़ रुपये के वित्तीय प्रावधान की दिशा में कार्य किया जा रहा है। प्रस्तावित पर्यटन नीति-2026 में सतत विकास, निजी निवेश, समुदाय आधारित पर्यटन और स्थानीय भागीदारी को प्राथमिकता दी जाएगी।
18 पर्यटन संपत्तियों के विकास में निजी भागीदारी
छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड की 18 पर्यटन संपत्तियों को लीज-सह-विकास मॉडल के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी से विकसित करने की योजना है। इससे लगभग 500 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित होने और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से 500 से 1,000 रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मंचों पर होगी छत्तीसगढ़ की ब्रांडिंग
छत्तीसगढ़ की पर्यटन पहचान को राष्ट्रीय सीमाओं से आगे ले जाने की तैयारी है। इको-एथनिक, प्राकृतिक और सांस्कृतिक पर्यटन के लिए राज्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के उद्देश्य से अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मंचों पर भागीदारी, फिल्म एवं ओटीटी आधारित प्रचार, अंतरराष्ट्रीय मीडिया आउटरीच और अंतरराष्ट्रीय इन्फ्लुएंसर फैम टूर जैसे प्रयास प्रस्तावित हैं।
सिरपुर को विश्व धरोहर की दिशा में आगे बढ़ाने की पहल
पुरातत्व विभाग की उपलब्धियों में सिरपुर को विश्व धरोहर के रूप में स्थापित करने की पहल प्रमुख है। सिरपुर में बौद्ध, जैन और हिंदू स्थापत्य परंपराओं का अद्भुत सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। सिरपुर विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा यूनेस्को के मानकों के अनुरूप नॉमिनेशन डोजियर तैयार कर भारत सरकार को प्रस्तुत किया गया है।
पर्यटन, संस्कृति और रोजगार को एक साथ आगे बढ़ाने का लक्ष्य
छत्तीसगढ़ में पर्यटन और संस्कृति का विकास केवल नए पर्यटन स्थलों और आयोजनों तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य स्थानीय रोजगार, आर्थिक गतिविधियों, कलाकारों के कल्याण, सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और प्रदेश की पहचान को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करना है। /छत्तीसगढ़ को प्राकृतिक, सांस्कृतिक, इको-एथनिक और आध्यात्मिक पर्यटन के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में सरकार दीर्घकालिक योजना के साथ आगे बढ़ रही है।
छत्तीसगढ़ की पर्यटन नीति में अब विकास के साथ विरासत संरक्षण, स्थानीय भागीदारी और रोजगार को भी केंद्र में रखा जा रहा है। चित्रकोट और सिरपुर से लेकर भोरमदेव और रतनपुर तक, बस्तर की जनजातीय संस्कृति से लेकर लोककलाओं और डिजिटल अभिलेखागार तक सरकार की कोशिश छत्तीसगढ़ की पहचान को राज्य की सीमाओं से निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की है। वर्ष 2028 का लक्ष्य इसी व्यापक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
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