नसबंदी कांड: 12 साल बाद बड़ा फैसला, डॉ. आर के गुप्ता दोषी, पांच आरोपी दोषमुक्त
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Bilaspur. बिलासपुर। बहुचर्चित नसबंदी कांड मामले में 12 साल बाद न्यायालय ने अहम फैसला सुनाया है। प्रथम सत्र न्यायाधीश शैलेश केतारप की अदालत ने डॉ. आर. के. गुप्ता को दोषी ठहराया है, जबकि इस मामले में शामिल अन्य पांच आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया गया। डॉ. गुप्ता के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का आरोप जांच में सिद्ध हुआ है। यह घटना साल 2014 में सकरी स्थित नेमीचंद जैन अस्पताल में हुई नसबंदी शिविर से जुड़ी है। इस शिविर में कुल 85 महिलाओं और पुरुषों की नसबंदी की गई थी, जिसके बाद 18 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में 13 महिलाएं और 5 पुरुष शामिल थे। जांच के दौरान सामने आया कि ऑपरेशन के दौरान गंभीर लापरवाही बरती गई थी। इस घटना ने प्रदेश और देश भर में सनसनी मचा दी थी।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी बिलासपुर का दौरा कर मृतकों के परिजनों से मुलाकात की थी। इस मामले की पुष्टि अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता देवेंद्र राव ने की। महिलाओं की मौत के मामले को लेकर विपक्षी दलों और समाजसेवी संस्थाओं ने गंभीर सवाल उठाए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सरकार ने मामले की जांच कर उचित कार्रवाई करने के आदेश दिए थे। नसबंदी शिविर में ड्यूटी करने वाले सभी डॉक्टरों और स्टाफ का बयान दर्ज किया गया। जांच में यह पाया गया कि तत्कालीन सीएमएचओ, कुछ डॉक्टर और मेडिसिन विभाग के कर्मचारियों के अलावा अन्य स्टाफ पर भी कार्रवाई हुई थी। इसके तहत राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाने वाले संरक्षित जाति के डॉक्टर धर्मवीर सिंह ध्रुव और राजेश छत्रिय को सस्पेंड किया गया।
डॉ. धर्मवीर सिंह ध्रुव ने स्वयं राष्ट्रपति को लिखित शिकायत में बताया कि उन्हें बिना कारण फंसाया गया। जांच समिति ने यह भी पाया कि मौतों के पीछे प्रमुख कारण सिप्रोसीन नामक दवा थी। महिलाओं को यह दवा शिविर में दी गई थी। सिप्रोसीन दवा के सेवन से 13 महिलाओं की मौत हुई। इसके अलावा, झोलाछाप डॉक्टरों के माध्यम से इलाज कराने वाले आधा दर्जन मरीजों की भी इसी दवा के सेवन के बाद मौत हुई। मामले में सिप्रोसीन दवा बनाने वाली कंपनी महावर फार्मा के संचालक रमेश महावर, दवा को बेचने वाले दुकानदार, कविता लैबोरेटरी के संचालक राकेश खरे और राजेश के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी। आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर न्यायालय ने डॉ. आर. के. गुप्ता को दोषी करार दिया।
यह मामला केवल एक चिकित्सा लापरवाही का नहीं बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा और सरकारी स्वास्थ्य शिविरों में निगरानी की गंभीरता को लेकर भी चिंता पैदा करता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सरकारी स्वास्थ्य शिविरों में गुणवत्ता नियंत्रण और उचित प्रशासनिक जांच बेहद आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस तरह की त्रासदी दोबारा न हो। नसबंदी कांड ने स्वास्थ्य विभाग, चिकित्सक और प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल खड़ा किया। अदालत का फैसला राज्य और केंद्र सरकार के लिए चेतावनी है कि ऐसी गंभीर लापरवाही के मामलों में कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती।
इस फैसले के साथ ही मृतकों के परिजनों को न्याय की उम्मीद जगी है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी, ताकि स्वास्थ्य शिविरों और सरकारी परियोजनाओं में जनता का विश्वास बनाए रखा जा सके। यह मामला अब भी चर्चा में है और बिलासपुर के अलावा पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य शिविरों और चिकित्सा सुरक्षा के विषय में जागरूकता बढ़ाने का अवसर बना है। अदालत का यह फैसला 12 साल लंबी कानूनी प्रक्रिया का परिणाम है और न केवल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई को मजबूत करता है, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों में चेतावनी का भी काम करेगा।