सर्पदंश मुआवजा घोटाला: फर्जी दस्तावेज, बैंक खातों और विभागीय मिलीभगत का खुलासा

अब तक 17 गिरफ्तार

Update: 2026-07-30 16:52 GMT
Bilaspur. बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सामने आए फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे मामले में नए खुलासे हो रहे हैं। पुलिस जांच में अब संगठित गिरोह, फर्जी दस्तावेज तैयार करने, बैंक खातों के जरिए सरकारी राशि के लेन-देन और कई विभागों के लोगों की कथित मिलीभगत के संकेत मिले हैं। इस मामले में अब तक सिम्स में पदस्थ रहीं डॉ. प्रियंका सोनी समेत एसडीएम और तहसीलदार कार्यालय के कर्मचारियों सहित कुल 17 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
पुलिस के अनुसार, इस पूरे मामले में एक संगठित नेटवर्क काम कर रहा था, जो सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर सरकारी मुआवजा हासिल करता था। गिरोह द्वारा कथित तौर पर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे। इन दस्तावेजों के आधार पर शासन से मिलने वाली 4 लाख रुपये की मुआवजा राशि निकाली जाती थी और बाद में उसे आपस में बांट लिया जाता था।
मामले में सरकंडा पुलिस ने कथित मास्टरमाइंड हीराप्रसाद खांडेकर समेत तीन आरोपियों को कोर्ट की अनुमति से एक दिन की पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की। पूछताछ के दौरान पुलिस ने आरोपियों के हैंडराइटिंग नमूने और कई दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए। रिमांड पूरी होने के बाद तीनों आरोपियों को दोबारा जेल भेज दिया गया है।
जांच के दौरान पुलिस ने एक अन्य मामले में हितग्राही महिला शिवकुमारी साहू और फर्जी दस्तावेज तैयार करने के आरोप में फोटो कॉपी दुकान संचालक आकाश साहू को भी गिरफ्तार किया है। पुलिस जांच में सामने आया है कि अशोकनगर स्थित एक फोटो कॉपी दुकान से कथित रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार किए जाते थे। वहीं तहसील से जुड़े कामों में कुछ कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है।
पुलिस ने इस मामले में वर्तमान और पूर्व तहसीलदारों से भी पूछताछ की तैयारी शुरू कर दी है। सरकंडा पुलिस ने सर्पदंश मुआवजा प्रकरण से जुड़े सात वर्तमान और पूर्व तहसीलदारों को नोटिस जारी किया है। पुलिस ने उन्हें जांच में सहयोग करने और बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया है। हालांकि नोटिस जारी होने के बाद भी अब तक किसी तहसीलदार के बयान दर्ज कराने पहुंचने की जानकारी सामने नहीं आई है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरे घोटाले में अब तक करीब 431 मामलों में लगभग 17.24 करोड़ रुपये के फर्जी भुगतान की बात सामने आई है। पुलिस का दावा है कि सामान्य मौतों को सर्पदंश बताकर सरकारी राशि का गलत तरीके से लाभ उठाया गया। गिरोह ने कथित तौर पर 10 से अधिक बैंकों में फर्जी खाते खुलवाए थे। इनमें सबसे अधिक खाते आईडीबीआई बैंक की दयालबंद शाखा में होने की बात सामने आई है। पुलिस अब इन खातों की केवाईसी, बैंक स्टेटमेंट और संदिग्ध लेन-देन की जांच कर रही है।
जांच में यह भी सामने आया है कि अस्पताल में किसी व्यक्ति की मौत की सूचना मिलते ही गिरोह सक्रिय हो जाता था। आरोप है कि मृतक के परिजनों को सरकारी मुआवजे का लालच देकर सामान्य मौत को सर्पदंश बताने के लिए तैयार किया जाता था। इसके बाद फर्जी दस्तावेजों के जरिए मुआवजा राशि हासिल की जाती थी। इस मामले में अब बड़े अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। लिपिक संघ ने आरोप लगाया है कि कार्रवाई में केवल छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाया जा रहा है, जबकि अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। लिपिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष रोहित तिवारी ने डीजीपी से कर्मचारियों की गिरफ्तारी को लेकर अपनी बात रखते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
बताया जा रहा है कि इस घोटाले में स्वास्थ्य विभाग, राजस्व विभाग, बैंकिंग व्यवस्था, अधिवक्ताओं और अन्य लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच अभी जारी है और जो भी व्यक्ति इस नेटवर्क में शामिल पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। यह मामला विधानसभा में भी उठ चुका है। बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए इस मुद्दे को सदन में उठाया था। उन्होंने बिलासपुर में सर्पदंश से होने वाली मौतों और दिए गए मुआवजे के आंकड़ों पर सवाल उठाए थे। इसके बाद राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा ने मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया था।
साल 2025 में बिल्हा थाना क्षेत्र में जहर खाने से हुई एक मौत को सर्पदंश बताकर फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार करने का मामला सामने आने के बाद इस पूरे नेटवर्क का खुलासा शुरू हुआ था। इसके बाद डॉ. प्रियंका सोनी, मृतक के परिजन और एक वकील सहित कई लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। जांच आगे बढ़ने पर एसडीएम और तहसीलदार कार्यालय के कर्मचारियों की भूमिका भी सामने आई। फिलहाल पुलिस इस पूरे मामले में दस्तावेजों, बैंक खातों और आरोपियों से पूछताछ के आधार पर जांच आगे बढ़ा रही है। अधिकारियों का कहना है कि घोटाले की जड़ तक पहुंचने और इसमें शामिल सभी लोगों की पहचान करने के लिए लगातार कार्रवाई जारी है।
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