खुले आसमान के नीचे 488 करोड़ का धान बारिश ने बढ़ाया नुकसान का खतरा
488 करोड़ का धान उठाव में देरी से बढ़ी चिंता
रायपुर: छत्तीसगढ़ में मानसून की बारिश के बीच संग्रहण केंद्रों में रखा करोड़ों रुपये का धान खराब होने के खतरे में है। प्रदेश के 114 संग्रहण केंद्रों में करीब 1.57 लाख टन धान का उठाव अब भी बाकी है, जिसकी कीमत लगभग 487.98 करोड़ रुपये बताई गई है। लगातार हो रही बारिश और धान उठाव की धीमी रफ्तार के कारण सरकारी अनाज के भीगने, अंकुरित होने और उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
114 संग्रहण केंद्रों में अटका धान
रिपोर्ट के मुताबिक खरीफ विपणन वर्ष 2024-25 में खरीदे गए धान का बड़ा हिस्सा अभी तक संग्रहण केंद्रों से नहीं उठाया जा सका है। सितंबर का महीना शुरू होने के बावजूद 114 केंद्रों में लाखों क्विंटल धान पड़ा हुआ है। बारिश के बीच इसे सुरक्षित रखना अब बड़ी चुनौती बन गया है। धान को लंबे समय तक खुले या अस्थायी व्यवस्था में रखने पर बारिश के पानी और नमी से नुकसान होने का खतरा रहता है। पानी लगने से धान की गुणवत्ता खराब होने के साथ उसमें अंकुरण और फफूंद जैसी समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।
487.98 करोड़ रुपये का स्टॉक
संग्रहण केंद्रों में बचे करीब 1.57 लाख टन धान की अनुमानित कीमत 487.98 करोड़ रुपये है। इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी धान का उठाव बाकी रहने से अब नुकसान की आशंका को लेकर चिंता बढ़ गई है। राज्य में मानसून सक्रिय है। राष्ट्रीय जल सूचना विज्ञान केंद्र के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में दैनिक वर्षा दर्ज की जा रही है और इसका डेटा लगातार अपडेट किया जा रहा है। ऐसे मौसम में केंद्रों पर रखे धान को सुरक्षित रखने और जल्द से जल्द उठाव सुनिश्चित करने की जरूरत और बढ़ जाती है।
उठाव में देरी बनी बड़ी समस्या
धान खरीदी के बाद इसे मिलरों और निर्धारित भंडारण व्यवस्था तक पहुंचाना जरूरी होता है। लेकिन उठाव में देरी होने पर लंबे समय तक संग्रहण केंद्रों में स्टॉक जमा रहता है। बारिश के मौसम में यही स्थिति सबसे अधिक जोखिम पैदा करती है। इससे पहले भी प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में समय पर धान का उठाव नहीं होने से खुले में पड़े स्टॉक को मौसम की मार झेलनी पड़ी है। धान में निर्धारित नमी प्रभावित होने के साथ बारिश पड़ने पर उसके अंकुरित होने का खतरा रहता है।
सूखत और खराब गुणवत्ता का भी खतरा
धान के लंबे समय तक पड़े रहने से केवल बारिश ही समस्या नहीं है। तेज धूप में नमी कम होने से वजन घटने यानी सूखत का नुकसान भी हो सकता है। वहीं बारिश में भीगने से इसके उलट नमी बढ़ जाती है और धान की गुणवत्ता खराब हो सकती है। ऐसी स्थिति में संग्रहण केंद्रों पर धान को तिरपाल से ढकने, पानी की निकासी की उचित व्यवस्था रखने और स्टॉक को जमीन की नमी से बचाने जैसे उपाय बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
नई खरीदी से पहले पुराना स्टॉक बड़ी चुनौती
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब खरीफ विपणन वर्ष 2026-27 के लिए किसान पंजीयन की प्रक्रिया भी चल रही है। राज्य में किसान पंजीयन 1 जुलाई से शुरू हो चुका है और 31 अक्टूबर तक निर्धारित है। सरकार ने नए खरीफ वर्ष में धान उठाव और कस्टम मिलिंग व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए रूट ऑप्टिमाइजेशन टूल लागू करने की भी बात कही है। ऐसे में पुराने धान का समय पर निराकरण महत्वपूर्ण है। अगर संग्रहण केंद्रों में पिछला स्टॉक लंबे समय तक पड़ा रहता है तो आगामी खरीदी सीजन की व्यवस्थाओं पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
करोड़ों के नुकसान को रोकना चुनौती
अब सबसे बड़ी चुनौती करीब 488 करोड़ रुपये के इस धान को बारिश से सुरक्षित रखते हुए जल्द उठाव कराने की है। समय रहते स्टॉक नहीं हटाया गया और बारिश से बड़ी मात्रा में धान खराब हुआ तो सरकार को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। प्रदेश में धान केवल सरकारी खरीदी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बल्कि लाखों किसानों की अर्थव्यवस्था से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण फसलों में से एक है। इसलिए खरीदी के बाद सुरक्षित भंडारण और समयबद्ध उठाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसानों से धान खरीदना। फिलहाल 114 संग्रहण केंद्रों में बाकी 1.57 लाख टन धान और उसकी करीब 487.98 करोड़ रुपये की कीमत ने चिंता बढ़ा दी है। मानसून के बीच अब निगाह इस बात पर है कि धान का उठाव कितनी तेजी से होता है और करोड़ों रुपये के सरकारी स्टॉक को बारिश से होने वाले संभावित नुकसान से कैसे बचाया जाता है।