रायपुर। नवा रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव 2026 के दूसरे दिन कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप पर साहित्य : उपनिषद से एआई तक विषय पर केंद्रित परिचर्चा आयोजित हुई। इस परिचर्चा में वक्ता के रूप में ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के डायरेक्टर डॉ. ओमप्रकाश व्यास, वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल केतकर, वरिष्ठ लेखक डॉ. गोपाल कमल शामिल हुए। परिचर्चा के सूत्रधार साहित्यकार संजीव तिवारी रहे, परिचर्चा का यह सत्र कवि जगन्नाथ प्रसाद भानु को समर्पित रहा। इस अवसर पर डॉ. गोपाल कमल द्वारा लिखित पुस्तक, गुणाढ्य की गुणसूत्र कथा का विमोचन किया गया।


ट्रिपल आईटी के डायरेक्टर डॉ. ओमप्रकाश व्यास ने कहा कि एआई का जो रूप आज हम देख रहे हैं, इसके पीछे विगत 30–40 वर्षों की मेहनत है। एआई निरंतर निखरता जा रहा है। तकनीक खुद को परिमार्जित करती जाती है, यह प्रक्रिया सतत है। एआई नेट पर उपलब्ध जानकारी, आंकड़ों और सूचनाओं का विश्लेषण कर हमें डिस्क्रिप्टिव टेक्नोलॉजी के रूप में समझाता है। धीरे-धीरे एआई निखरा और प्रिडिक्टिव टेक्नोलॉजी के रूप में काम करने लगा। आज एआई भविष्य की चीजों को भी बताता है। उन्होंने कहा कि नवंबर 2022 में पहली बार चैट जीपीटी आया। सिर्फ तीन साल में एआई का रूप कितना भव्य हुआ है, आप देखिए। हम एआई के भविष्य की अब कल्पना भी नहीं कर सकते। भाषा के मानकीकरण में एआई की क्या भूमिका होगी, यह हम सभी के बीच एक बड़ी चुनौती है।



वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल केतकर ने परिचर्चा को संबोधित करते हुए कहा कि गीता के 18 अध्यायों में सभी तरह के ज्ञान का समावेश है। एआई को लेकर लोग चिंतित हैं कि एआई का फ्यूचर क्या होगा। एआई के आधार पर जापान ने जब रोबोट बनाया तो वह स्वयं को नेगेटिव प्रॉम्प्ट देने लगा। एआई कमांड और प्रॉम्प्ट पर काम करता है। एआई वही बताता है जो नेट पर उपलब्ध है। श्री केतकर ने कहा कि हमारे ऋषि सूचना की नहीं, ज्ञान की बात करते थे। वे एआई से बहुत ज्यादा आगे थे। यदि हम मैकाले की शिक्षा पद्धति की बात करें तो उसने हमें अच्छा उत्तर लिखने वाला बना दिया। प्रश्न जितना गहरा होगा, उत्तर भी उतना ही गहरा होगा। मानव के ज्ञान का उद्देश्य प्रकृति पर विजय पाना नहीं, उसके नियमों को समझकर अपने आपको प्रकृति के अनुरूप ढालना था।



वरिष्ठ लेखक डॉ. गोपाल कमल ने सत्र में अपने संबोधन में कहा कि हमारे साथ में सोचने की परंपरा ऋग्वेद से आती है। हम सभी एआई में डीप लर्निंग की बात करते हैं। भाषा कहां से आती है, वह आकार कैसे लेती है, मनुष्य भाषा तक कैसे पहुंचा, इस पर होने वाले कार्य और अध्ययन को साइकोलिंग्विस्टिक के नाम से जाना जाता है। जेनेटिक कोड के जरिए ही हम नई चीजों को सीख पाते हैं। डॉ. गोपाल ने कहा कि सोमदेव ने कथासरितसागर के नाम से संस्कृत में पुस्तक लिखी, इसे हम गुणाढ्य के रूप में देख सकते हैं। संस्कृत के लगभग 3900 सूत्र हैं। महेश्वर सूत्रों से हम सभी शब्दरूप और धातुरूप बना सकते हैं। एआई में हम जीरो से एक का सहारा लेते हैं। गुणसूत्र की भाषा से एआई के संचार नेटवर्क को गढ़ा गया है।


परिचर्चा के सूत्रधार, साहित्यकार संजीव तिवारी ने कहा कि मेरे समझ में उपनिषद और एआई एक जैसे हैं। वेद ज्ञान का खजाना है, जिसका भाष्य उपनिषद है। एआई भी प्रश्नोत्तर शैली में उत्तर देता है। हमारा उपनिषद एआई का मूल है। उन्होंने कहा कि ट्रिपल आईटी हैदराबाद जैसे संस्थान एआई को लेकर काम कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए दूसरे संस्थान भी काफी अच्छा काम कर रहे हैं, ताकि एआई में बेहतर से बेहतर रूप में छत्तीसगढ़ी भाषा निखरकर आ सके। इस अवसर पर गणमान्य साहित्यकार एवं श्रोता उपस्थित रहे।

जब हम मिट्टी में मिल रहे हो तो ये मिट्टी भी रोये इस धरती की : रुबिका लियाकत

अभिनव नीरव मंडल के प्रथम सत्र में विचारोत्तेजक संवाद और सारगर्भित विमर्श हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में आईं वरिष्ठ पत्रकार रुबिका लियाकत एवं छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष श्री शशांक शर्मा के मध्य रोचक परिचर्चा सम्पन्न हुई। अपने संबोधन में लियाकत ने राष्ट्रवाद पर संबोधित कहा कि जब हम मिट्टी में मिल रहे हों, तो यह मिट्टी भी रोए इस धरती की। उन्होंने पत्रकारिता के 18 वर्षों के अनुभव साझा करते हुए युवाओं को आगाह किया कि सोशल मीडिया पर आए 30 सेकंड के वीडियो पर आँख मूँदकर भरोसा न करें, बल्कि तथ्यों की स्वयं पड़ताल करें। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे किसी व्यक्ति या विचारधारा के लिए नहीं, बल्कि सत्य और अच्छाई के लिए कार्य करती हैं और उनकी प्रतिबद्धता भारत के प्रति है।

इतिहास और सामाजिक समरसता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के दंगों के समय किए गए मानवीय कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा स्वभावतः सेक्युलर है और भारतीयता उसी समझ से विकसित होती है। निजी प्रसंग साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी दादी सनातन परंपराओं का पालन भी करती थीं, पाँच वक्त नमाज़ भी पढ़ती थीं और सबका आदर करती थीं, यह भारत की साझा संस्कृति का उदाहरण है। विराट हिंदू सम्मेलन से जुड़े अनुभवों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें धर्म पर मन से विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि वे स्वयं कलमा पढ़ती हैं, उनके तीनों बच्चे कुरान पढ़ते हैं पर वे अपने बच्चों को इस प्रकार तैयार कर रही हैं कि वे वंदे मातरम् और भारत माता की जय कहने में संकोच न करें क्योंकि उनकी पहचान भारतीय होने से है।

व प्रश्नोत्तर सत्र में पत्रकार बनने की आकांक्षा रखने वाली पत्रकारिता की छात्रा के प्रश्न पर उन्होंने परिश्रम, सत्यनिष्ठा और निर्भीकता को सफलता की कुंजी बताया। धर्म और राष्ट्रवाद से जुड़े प्रश्नों पर उन्होंने कहा कि किसी भी ग्रंथ या विचार को गुरु से समझना चाहिए, संदर्भ जानना चाहिए, और किसी की बातों में बहकर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए क्योंकि एक ही बात के कई अर्थ हो सकते हैं। राष्ट्रवाद के प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि मैं हमेशा भारत और राष्ट्रवाद को चुनूँगी। कार्यक्रम के अंत में उन्होंने दो पुस्तकों का विमोचन किया, जिसमें जनसम्पर्क विभाग द्वारा प्रकाशित छत्तीसगढ़ के साहित्य पुरोधा एवं पूजा अग्रवाल की काव्य संग्रह 'अम्मा की चाय' शामिल थे। सत्र में बड़ी संख्या में युवा, साहित्यप्रेमी और पत्रकारिता से जुड़े लोग शामिल हुए।


रायपुर साहित्य उत्सव में ‘नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया’ पर परिचर्चा, सिनेमा और साहित्य के संबंधों पर हुआ विमर्श

श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में “नई पीढ़ी की फिल्मी दुनिया” विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। कार्यक्रम में अभिनेता सत्यजीत दुबे, अभिनेत्री टी. जे. भानु, विधायक एवं प्रसिद्ध कलाकार अनुज शर्मा तथा सुविज्ञा दुबे विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। परिचर्चा के दौरान अनुज शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा अत्यंत सरल और सहज है, जिसे संवाद के माध्यम से और अधिक सुलभ बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय महिलाओं की सशक्त भूमिका का है, जहां सिनेमा और समाज दोनों क्षेत्रों में उनका योगदान निरंतर बढ़ रहा है। उन्होंने फिल्म निर्माण प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सिनेमा में निर्देशक की भूमिका प्रमुख होती है, रंगमंच में अभिनेता की प्रधानता होती है, जबकि धारावाहिकों में लेखक की भूमिका निर्णायक होती है। उन्होंने साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी रचनाकार की पहचान उसके पहनावे से नहीं, बल्कि उसकी रचनाओं से होती है। अभिनेता सत्यजीत दुबे ने कहा कि किसी भी फिल्म में भावनात्मक तत्व होना आवश्यक है, तभी वह दशकों तक दर्शकों के मन में जीवित रहती है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ का साहित्य अत्यंत समृद्ध है और यहां अच्छी कहानियों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि आवश्यकता केवल पाठक वर्ग को प्रोत्साहित करने की है कि वे पढ़े। उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ की लोकजीवन और संस्कृति में असंख्य कथाएं समाहित हैं, जिन्हें सिनेमा के माध्यम से प्रस्तुत किया जा सकता है।

अभिनेत्री टी. जे. भानु ने कहा कि डिजिटल माध्यमों, विशेषकर यूट्यूब, ने नए कलाकारों के लिए अवसरों के द्वार खोले हैं। छोटी कहानियां अब विभिन्न मंचों के माध्यम से व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंच रही हैं। उन्होंने कहा कि यात्रा का सुख केवल गंतव्य तक पहुंचने में नहीं, बल्कि पूरी यात्रा प्रक्रिया में निहित होता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब महिलाएं निर्माता की भूमिका निभाती हैं, तो वे सेट पर कार्यरत प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकताओं और भावनाओं का ध्यान रखती हैं। उन्होंने सिनेमा में दृश्यात्मक प्रस्तुति को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया। सुविज्ञा दुबे ने कहा कि बच्चों में आत्मविश्वास का विकास घर से ही प्रारंभ होना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे बच्चों को अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करें, जिससे उनमें सृजनात्मकता और आत्मबल विकसित हो सके। परिचर्चा में वक्ताओं ने नई पीढ़ी के सिनेमा, साहित्य और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव पर विचार साझा करते हुए कहा कि सशक्त कहानी, भावनात्मक जुड़ाव और सामाजिक जिम्मेदारी ही भविष्य के सिनेमा की दिशा तय करेंगे।

रायपुर साहित्य उत्सव में ‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ सत्र बना वैचारिक मंथन का केंद्र

रायपुर साहित्य उत्सव ने अपनी भव्यता और वैचारिक गंभीरता से प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश के साहित्यिक और बौद्धिक जगत में एक सशक्त पहचान बनाई है। उत्सव के विभिन्न सत्रों के बीच ‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ विषय पर आयोजित विशेष सत्र ने सबसे अधिक ध्यान आकर्षित किया, जिसने बुद्धिजीवियों, युवाओं और श्रोताओं को गहन विचार के लिए प्रेरित किया। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रख्यात विचारक एवं लेखक राम माधव रहे। उन्होंने अपने संतुलित और तार्किक वक्तव्य के माध्यम से भारतीय चेतना को आधुनिक संदर्भों में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। राम माधव ने कहा कि किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए उसका बौद्धिक विमर्श उसकी प्राणवायु होता है। उन्होंने प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और वैश्विक राजनीति से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया कि भारत का चिंतन न केवल मौलिक है, बल्कि तार्किक कसौटी पर भी पूरी तरह खरा उतरता है। राम माधव ने इस भ्रांति को भी सशक्त तर्कों के साथ खंडित किया कि बौद्धिकता केवल पश्चिमी दृष्टिकोण तक सीमित है। उन्होंने कहा कि भारत का स्वतंत्र चिंतन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ-साथ आधुनिक यथार्थ को समझने की क्षमता भी रखता है। संवाद के दौरान उनके तर्कों की श्रृंखला ने विद्वानों के साथ-साथ युवाओं और सामान्य श्रोताओं को भी विशेष रूप से प्रभावित किया। सत्र के दौरान उपस्थित श्रोताओं ने भी अपने विचार साझा किए, जिससे पूरा वातावरण परंपरा और भविष्य की प्रगति के संतुलन से भरे वैचारिक संवाद में बदल गया। सत्र के समापन पर यह संदेश उभरकर सामने आया कि असहमति भी तभी सार्थक है, जब वह तर्क और मर्यादा के दायरे में हो। रायपुर साहित्य उत्सव का यह सत्र केवल एक चर्चा नहीं, बल्कि सकारात्मक, रचनात्मक और आत्मबोध से जुड़े बौद्धिक विमर्श की नई संस्कृति का प्रतीक बनकर सामने आया। इस आयोजन ने यह भी सिद्ध कर दिया कि छत्तीसगढ़ की माटी में लोक संस्कृति के साथ-साथ उच्चस्तरीय वैचारिक मंथन के लिए भी एक सशक्त और उर्वर भूमि मौजूद है।

लोक साहित्य जन–जीवन की गहरी अनुभूतियों से उपजा समृद्ध साहित्य

लाला जगदलपुरी मंडप में छत्तीसगढ़ के लोकगीतों पर परिचर्चा आयोजित हुई। इसमें डॉ. पीसी लाल यादव, श्रीमती शकुंतला तरार, श्री बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक विशेष अतिथि के रूप में शामिल हुए तथा अपने विचार रखें। डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ के लोकगीत मानवता के पक्षधर हैं, जो हमें रास्ता दिखाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकगीतों को गर्व से संजोकर रखने का दायित्व अब युवा पीढ़ी का है। परिचर्चा में दूसरी वक्ता शकुंतला तरार ने बस्तर के लोकगीतों और उनके महत्व को अनूठे अंदाज में प्रस्तुत किया। बस्तर के लोकगीत सुनाकर उन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने घोटुल के इतिहास, लिंगोपेन देवता की पूजा पद्धति में गाए जाने वाले ककसार गीत (जो महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं) आखेट पर जाते पुरुषों के लिए महिलाओं द्वारा गाए मंगल गीत, छेरछेरा परंपरा, जगार धार्मिक पर्व में धनकुल गीत तथा 650 वर्षों से चली आ रही बस्तर दशहरा पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बस्तर पंडुम द्वारा सरकार के कार्यों की भी सराहना की।

 बिहारी लाल साहू ने युवाओं को मार्गदर्शन देते हुए वर्तमान लोकगीतों, कहानियों एवं पहेलियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने पुराने समय में छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकगीतों के महत्व को उदाहरणों सहित समझाया तथा बताया कि छत्तीसगढ़ी एक समृद्ध और पूर्ण भाषा है। अंत में डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि लोक साहित्य जन–जीवन की गहरी अनुभूतियों से उपजा समृद्ध साहित्य है। उन्होंने लोकगीतों को लेकर प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए इसकी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और रचनात्मक महत्ता को रेखांकित किया। सत्र के अंत में डॉ. पीसी लाल यादव का छत्तीसगढ़ी गजल संग्रह ‘हमर का बने का गिनहा‘ तथा कविता संग्रह ‘दिन म घलो अंधियार हावय‘ का विमोचन किया। साथ ही श्रीमती वर्णिका शर्मा द्वारा निर्मित वीडियो ‘महतारी की आरती‘ का विमोचन किया गया।

डॉ. अम्बेडकर केवल दलितों के नहीं, सम्पूर्ण समाज के महान चिंतक और नेता” : डॉ. राजकुमार फलवारिया

लाला जगदलपुरी मंडप में “डॉ. अम्बेडकर विचारपुंज की आभा” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात चिंतक डॉ. राजकुमार फलवारिया उपस्थित रहे। अपने वक्तव्य में डॉ. राजकुमार फलवारिया ने कहा कि भारत के सामाजिक, राजनीतिक, शैक्षिक क्षेत्र, मीडिया जगत तथा अनेक दलित संगठनों द्वारा डॉ. भीमराव अम्बेडकर को केवल दलितों का नेता मानने की धारणा अधूरी और सीमित है। उन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं, तथ्यों तथा बाबासाहेब के विचारों के माध्यम से स्पष्ट किया कि डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण समाज के नेता, चिंतक और मार्गदर्शक थे।

डॉ. फलवारिया ने कहा कि बाबासाहेब केवल सामाजिक न्याय के प्रतीक ही नहीं थे, बल्कि वे महान अर्थशास्त्री, लेखक, बैरिस्टर, शिक्षक, पत्रकार, संपादक, स्तंभकार, श्रम मंत्री एवं कानून मंत्री के रूप में एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, श्रमिकों के हितों, आर्थिक नीतियों, कृषि एवं औद्योगिक विकास, नदी जल प्रबंधन तथा भारतीय संविधान के निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जाति व्यवस्था से ऊपर उठकर सम्पूर्ण समाज को केंद्र में रखकर कार्य किया। परिचर्चा के दौरान विचार व्यक्त किए कि डॉ. अम्बेडकर का चिंतन आज भी सामाजिक समरसता, लोकतंत्र और समानता के लिए पथप्रदर्शक है। कार्यक्रम में साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, विद्यार्थियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की उल्लेखनीय सहभागिता रही। कार्यक्रम का उद्देश्य डॉ. अम्बेडकर के समग्र विचारों को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना तथा उन्हें केवल एक वर्ग तक सीमित करने की मानसिकता पर पुनर्विचार करना रहा।

रायपुर साहित्य उत्सव में ‘जशप्योर’ का जलवा: महुआ और मिलेट्स से बने जशप्योर उत्पादों को मिली शानदार प्रतिक्रिया

छत्तीसगढ़ की समृद्ध कला और संस्कृति के साथ-साथ जशपुर जिले का गृह ब्रांड ‘जशप्योर’ (Jashpure) आगंतुकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मुख्यमंत्री के आदिवासी एवं महिला उत्थान के विजन से प्रेरित यह ब्रांड पारंपरिक स्वादों को आधुनिक बाजार से जोड़ते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती प्रदान कर रहा है। उत्सव परिसर में लगाए गए जशप्योर के स्टॉल पर दिनभर लोगों की भारी भीड़ देखने को मिली। विशेष रूप से महुआ से बने लड्डू, कुकीज़ और कैंडी आगंतुकों के बीच चर्चा का विषय बने रहे। स्टॉल पर आने वाले लोग न केवल उत्पादों के स्वाद और गुणवत्ता की सराहना कर रहे हैं, बल्कि लगाए गए QR कोड के माध्यम से इनके पोषण मूल्य और निर्माण प्रक्रिया की जानकारी भी प्राप्त कर रहे हैं। रायपुर की स्थानीय निवासी निधि साहू ने स्टॉल का भ्रमण करने के बाद कहा,“यह जानकर आश्चर्य हुआ कि महुआ से इतने स्वादिष्ट और स्वास्थ्यवर्धक उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं। पारंपरिक ज्ञान का यह आधुनिक उपयोग वास्तव में सराहनीय है।” जशप्योर से जुड़े युवा वैज्ञानिक समर्थ जैन ने बताया कि महुआ को लेकर लंबे समय से समाज में यह धारणा रही है कि इसका उपयोग केवल शराब निर्माण तक सीमित है, लेकिन जशप्योर इस सोच को बदलने का कार्य कर रहा है।उन्होंने कहा,“जशपुर की महिलाएं अब फूड-ग्रेड महुए का उपयोग कर इसे एक पारंपरिक सुपरफूड के रूप में स्थापित कर रही हैं। यह पहल आदिवासी महिलाओं के पारंपरिक ज्ञान को आर्थिक सशक्तिकरण से जोड़ने का सशक्त माध्यम बन रही है।”

विविधता और आधुनिकता का संगम

जशप्योर ब्रांड के अंतर्गत वर्तमान में 90 से अधिक उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। महुआ के साथ-साथ ग्लूटेन-फ्री मिलेट्स से बने बिस्किट और लड्डू भी लोगों को खासे पसंद आ रहे हैं। इनमें रागी, कुटकी, कोदो और बकव्हीट जैसे पोषक मिलेट्स से तैयार विविध उत्पाद शामिल हैं।

महिला सशक्तिकरण की नई पहचान

जशप्योर केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि महिला आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की एक अभिनव पहल है। स्थानीय संसाधनों के कुशल उपयोग से जशपुर की ग्रामीण महिलाएं आज न केवल स्थायी रोजगार प्राप्त कर रही हैं, बल्कि उद्यमिता के क्षेत्र में भी सशक्त रूप से आगे बढ़ रही हैं। रायपुर साहित्य उत्सव में जशप्योर की यह प्रभावशाली उपस्थिति छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, स्वदेशी उत्पादों और महिला सशक्तिकरण की बढ़ती पहचान का सशक्त प्रमाण है।

लोकगीतों में बसती है छत्तीसगढ़ की आत्मा

लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित परिचर्चा “छत्तीसगढ़ के लोक गीत” प्रदेश की लोक-संस्कृति, भाषा और जनजीवन के गहन संवाद का सशक्त मंच बनी। परिचर्चा में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि लोकगीत छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक स्मृति और जीवन-दृष्टि की आत्मा हैं।

लोकगीत सामूहिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज : डॉ. पी.सी. लाल यादव

लोक साहित्य के प्रख्यात लेखक डॉ. पी.सी. लाल यादव ने कहा कि छत्तीसगढ़ी लोकगीत समाज के इतिहास, संघर्ष और अनुभवों को पीढ़ी दर पीढ़ी संजोकर रखने वाले जीवंत दस्तावेज हैं। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती लोकगीतों का अमृत कुंड है- खेल, पर्व, नृत्य, वन-जीवन और दैनिक क्रियाओं में लोकगीत सहज रूप से रचे-बसे हैं। हर स्थान और हर अवसर से लोकगीत स्वतः जन्म लेते हैं।

लोक संवेदना से समृद्ध होता है आधुनिक लेखन : शकुंतला तरार

वरिष्ठ कवयित्री एवं स्वतंत्र पत्रकार श्रीमती शकुंतला तरार ने कहा कि लोकगीतों की भावनात्मक गहराई आधुनिक साहित्यिक विधाओं को निरंतर समृद्ध करती है। उन्होंने हाइकू रचना में लोक चेतना के प्रयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि लोक संवेदना पीढ़ी दर पीढ़ी विकसित होती रहती है। बस्तर पंडुम जैसे उत्सव आदिवासी समाज की विविधता, सौंदर्य और अभिव्यक्ति के सशक्त माध्यम हैं, जिनसे लोकजीवन की सच्ची तस्वीर सामने आती है।

भाषा-विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध हैं लोकगीत : डॉ. विनय कुमार पाठक

हिंदी एवं भाषा विज्ञान में पीएचडी और डी.लिट. की दोहरी उपाधि प्राप्त डॉ. विनय कुमार पाठक ने कहा कि छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में ध्वनि, लय और अर्थ का अद्भुत संतुलन है, जो इन्हें भाषायी दृष्टि से विशिष्ट बनाता है। उन्होंने कहा कि लोकगीत प्रकृति के अत्यंत निकट होते हैं और इसी निकटता के माध्यम से लोकजीवन अपनी बात सहज रूप में अभिव्यक्त करता है।

लोककथा और लोकगीत एक-दूसरे के पूरक : डॉ. बिहारी लाल साहू

कहानीकार डॉ. बिहारी लाल साहू ने कहा कि लोकगीत और लोककथाएँ समाज की आत्मा को अभिव्यक्त करने के दो सशक्त माध्यम हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और लोक साहित्य की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। उन्होंने कहा कि पाहुना का मान करना छत्तीसगढ़ की संस्कृति है और लोकगीत हमारी ऐसी अमूल्य संपत्ति हैं, जो हर रूप में हमारे साथ बहती रहती हैं-इन्हें कोई मिटा नहीं सकता।

संवेदनशील संचालन ने संवाद को दिया प्रवाह

परिचर्चा का कुशल एवं प्रभावी संचालन सूत्रधार आशीष सिंघानिया, युवा लेखक एवं संस्कृतिकर्मी ने किया। उन्होंने अपने संचालन में वर्तमान समय में बढ़ते पाश्चात्य प्रभाव के बीच लोकसंस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता पर भी ध्यान आकृष्ट किया। उनके संचालन ने संवाद को सहज, रोचक और प्रवाहपूर्ण बनाए रखा।

छत्तीसगढ़ी लोकगीतों में जीवन और उत्सव

वक्ताओं ने कहा कि सुआ गीत, करमा गीत, ददरिया, पंथी गीत, बिहाव गीत और जवारा गीत छत्तीसगढ़ की संस्कृति, प्रकृति, श्रम-संस्कृति और उत्सवधर्मिता की जीवंत अभिव्यक्ति हैं। इन गीतों में जनजीवन की खुशियाँ, संघर्ष और आस्था समाहित है।

छत्तीसगढ़ी साहित्य की पुस्तकों का विमोचन

इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण छत्तीसगढ़ी साहित्यिक कृतियों का विमोचन किया गया

“हमर का बने का गिनहा” - छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल संग्रह

“दिल म घलो अंधियार हवय” - छत्तीसगढ़ी गीत एवं कविता संग्रह

*लोक विरासत के संरक्षण का आह्वान*

कार्यक्रम के अंत में वक्ताओं ने लोकगीतों के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण की आवश्यकता पर बल दिया। परिचर्चा ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकगीत केवल अतीत की धरोहर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की पहचान और भविष्य की सांस्कृतिक दिशा हैं।

डिजिटल युग में लेखक और पाठक के रिश्ते पर रायपुर साहित्य उत्सव में सार्थक संवाद

लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित परिचर्चा ‘डिजिटल युग के लेखक और पाठक’ में बदलते समय के साथ साहित्य, लेखन और पाठकीय संस्कृति में आ रहे बदलावों पर गंभीर और सकारात्मक विमर्श हुआ। सूत्रधार पत्रकार अनिल द्विवेदी के संचालन में हुई इस परिचर्चा ने यह स्पष्ट किया कि डिजिटल माध्यम ने साहित्य के स्वरूप को बदला जरूर है, लेकिन उसकी आत्मा और रचनात्मकता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। लेखक, कवि और शिक्षक सर्वेश तिवारी ने परिचर्चा में कहा कि किताबों का छपना आज भी जरूरी है, क्योंकि पूरी तरह ऑनलाइन माध्यम वह अनुभव नहीं दे सकता जो मुद्रित किताब देती है। उन्होंने माना कि युवा और बच्चे ऑनलाइन काफी पढ़ रहे हैं। लेखक की सफलता का पैमाना पुरस्कार नहीं, बल्कि पाठकों की संख्या होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जितने अधिक पाठक, उतनी ही रचना की सार्थकता और पहुंच मानी जानी चाहिए।

लेखक नवीन चौधरी ने डिजिटल मीडिया की ताकत को रेखांकित करते हुए कहा कि इंटरनेट ने साहित्य के लिए नए रास्ते खोले हैं। युवा पीढ़ी ने डिजिटल माध्यमों के जरिए श्री विनोद कुमार शुक्ल जैसे वरिष्ठ रचनाकारों को पढ़ा, जिससे उनकी पुस्तकों की रॉयल्टी लाखों तक पहुंची। उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण पुराने लेखक फिर से सरकुलेशन में आ रहे हैं और पाठकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। पढ़ने और पढ़ाने में रुचि जगाने में इंटरनेट की भूमिका बेहद अहम हो गई है।

प्रसार भारती की सलाहकार स्मिता मिश्रा ने कहा कि डिजिटल माध्यम, किंडल और ऑडियो बुक्स जैसे विकल्पों ने किताबों को पढ़ना आसान, सस्ता और सुविधाजनक बना दिया है। अब किताबें सिर्फ पढ़ी ही नहीं जा रहीं, बल्कि सुनी भी जा रही हैं। उन्होंने कहा कि लेखन कभी बंद नहीं हुआ है, समय के साथ सिर्फ उसका फॉर्मेट बदलता रहा है। लेखक चाहे किसी भी टूल का उपयोग करे, लेकिन उसकी रचनात्मकता की भूख कम नहीं होनी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार संजीव कुमार सिन्हा ने कहा कि इंटरनेट के आने के बाद साहित्य का सही मायनों में लोकतांत्रीकरण हुआ है। अब रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने के लिए अनेक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स उपलब्ध हैं। डिजिटलीकरण से साहित्य का पूरा परिदृश्य बदला है और बड़ी संख्या में युवा डिजिटल माध्यमों पर लिख और पढ़ रहे हैं, जो भविष्य के लिए सकारात्मक संकेत है। परिचर्चा का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए सूत्रधार अनिल द्विवेदी ने कहा कि डिजिटल युग देखने–दिखाने, सुनने–सुनाने, पढ़ने और पढ़ाने का नया दौर लेकर आया है। यह युग सभी को मंच प्रदान कर रहा है और साहित्य को नए पाठक व नए लेखक दे रहा है।

राष्ट्रीय मीडिया की बहसों पर रायपुर साहित्य उत्सव में मंथन

लाला जगदलपुरी मंडप में आयोजित परिचर्चा ‘राष्ट्रीय मीडिया में बहस के मुद्दे’ ने मीडिया की मौजूदा दिशा, चुनौतियों और संभावनाओं पर गंभीर विमर्श को मंच दिया। सूत्रधार वरुण सखा के सवालों के जवाबों के रूप में वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका, उसकी प्राथमिकताओं और भविष्य की जरूरतों पर खुलकर बात रखी। यह सत्र छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार स्वर्गीय रमेश नैयर को समर्पित था।

परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अनिल पाण्डेय ने कहा कि राजनीति का मीडिया के केंद्र में आना एक सकारात्मक संकेत है। पिछले एक दशक में खबरों के ट्रेंड में बड़ा बदलाव आया है, जहां कभी बॉलीवुड और सिनेमा की खबरें हावी रहती थीं, वहीं अब राजनीति प्रमुख विषय बन रही है। उन्होंने सरकार से प्रेस आयोग या मीडिया आयोग के गठन की मांग करते हुए कहा कि समय के अनुरूप नीतियां और नियमन बनेंगे तो पत्रकारों के हितों की रक्षा संभव होगी। ट्रेड यूनियनों, पत्रकार संगठनों, मीडिया मालिकों और संपादकों के साथ संवाद से मीडिया का माहौल बेहतर हो सकता है। उन्होंने कहा कि आज टीवी चैनलों के प्राइम टाइम डिबेट के विषय सोशल मीडिया तय कर रहा है। उन्होंने पत्रकारों के संवेदनशील और अध्ययनशील होने के साथ ही मुद्दों को समझने के लिए उनके समुचित प्रशिक्षण पर भी जोर दिया।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने छत्तीसगढ़ के संदर्भ में राष्ट्रीय मीडिया की भूमिका पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि नक्सलवाद से जुड़ी घटनाओं को तो राष्ट्रीय मीडिया में प्रमुखता मिलती है, लेकिन नक्सल मोर्चे पर हो रहे सकारात्मक बदलावों और विकास कार्यों को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाता। उन्होंने भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश बताते हुए कहा कि लोकतंत्र में कमियां हो सकती हैं, लेकिन हर पांच साल में सरकार बदलने की प्रक्रिया इसे मजबूत बनाती है। एक पत्रकार के रूप में लोकतंत्र को पंचायत से लेकर संसद तक मजबूत करना मीडिया की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया को केवल टीवी तक सीमित नहीं मानना चाहिए, अखबार और पत्र-पत्रिकाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी ने मीडिया की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि सूचना का सबसे बड़ा प्रदाता सरकार ही है और लगातार छुट्टियां पड़ने पर अखबार निकालना तक मुश्किल हो जाता है। उन्होंने कहा कि मीडिया संस्थानों में जमीनी रिपोर्टिंग कम हो रही है, क्योंकि यह खर्चीली है, जबकि प्रायोजित खबरें और डिबेट कम खर्च में आसान विकल्प बन गए हैं। उन्होंने चिंता जताई कि मीडिया संस्थान असल पत्रकारिता, अभिव्यक्ति और भाषा कौशल से भटक रहे हैं, जिससे अनावश्यक शब्दावली और आरोप-प्रत्यारोप बढ़ रहे हैं। परिचर्चा में यह भी कहा गया कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पत्रकारिता की पढ़ाई तो हो रही है, लेकिन व्यावहारिक प्रशिक्षण की कमी है। पत्रकारिता अब खबर और समाज से जुड़ी जिम्मेदारी के बजाय कंटेंट जेनरेशन तक सिमटती जा रही है, जो भविष्य के लिए चिंता का विषय है।

*रायपुर साहित्य महोत्सव में “आज की हिंदी कहानियाँ” विषय पर पैनल चर्चा आयोजित*

लाला जगदलपुरी मंडप में “आज की हिंदी कहानियाँ” विषय पर एक पैनल चर्चा का आयोजन किया गया। यह सत्र महोत्सव के दूसरे दिन मंडप में आयोजित दूसरा सत्र था। इस पैनल चर्चा में प्रख्यात साहित्यकार श्री परदेशी राम वर्मा, वरिष्ठ लेखिका जयश्री राय, प्रसिद्ध लेखक सतीश जायसवाल तथा साहित्य विदुषी डॉ. अंशु जोशी ने सहभागिता की। चर्चा के दौरान वक्ताओं ने समकालीन हिंदी कहानी के स्वरूप, विषयगत परिवर्तन, शिल्पगत प्रयोगों तथा समाज के बदलते यथार्थ को अभिव्यक्त करने में साहित्य की भूमिका पर अपने विचार साझा किए। पैनलिस्टों ने आज की हिंदी कहानी में उभरती सामाजिक चेतना, संवेदनशीलता और नए कथ्य पर विस्तार से प्रकाश डाला। इस अवसर पर उपस्थित साहित्यप्रेमियों, विद्यार्थियों एवं पाठकों के साथ संवाद भी हुआ, जिससे कार्यक्रम और अधिक सार्थक एवं विचारोत्तेजक बन सका। रायपुर साहित्य महोत्सव साहित्य, संस्कृति और विचार-विमर्श को बढ़ावा देने का एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है, जहाँ विभिन्न विधाओं और भाषाओं के रचनाकारों का समागम हो रहा है।

*रायपुर साहित्य उत्सव में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृति में हुआ काव्य पाठ*

विनोद कुमार शुक्ल मंडप में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया। इस अवसर पर देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी जी की स्मृति में काव्य पाठ का आयोजन हुआ, जिसमें विभिन्न शहरों से आए कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। देहरादून के ख्यातिलब्ध गीत कवि बुद्धिनाथ मिश्रा ने अटल जी से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बार दिल्ली के कवि सम्मेलन में अटल जी मुझे सुनने के लिए अंतिम समय तक बैठे रहे। मेरी कविता समाप्त होने पर उन्होंने मंच पर आकर मेरी पीठ थपथपाई और कहा कि तुमने हिंदी की लाज रख ली। मिश्रा ने तुम क्या गए, नखत गीतों के असमय अस्त हुए/ सप्तक ऋषियों में अब तुम भी, अब नए अगस्त हुए और मुक्तकों के माध्यम से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। मुंबई के अजय साहेब ने अपनी ग़ज़लों से समां बांधा। इंदौर के अमन अक्षर ने उन्हीं आंखों को चश्मे की बहुत ज्यादा जरूरत है/ जिन्हें माँ-बाप का टूटा हुआ चश्मा नहीं दिखता जैसे भावपूर्ण गीत पढ़े। रायपुर के त्रिलोक चंद्र महावर ने कैसे संगीन गुनाहों से घिर गया हूं/ कि आज उनकी निगाहों से गिर गया हूं मैं, सूरज बालकनी से लौट जाता है, अंतरिक्ष थे मेरे पिता जैसी कविताएं पढ़ीं। घरघोड़ा के ग़ज़लकार हर्षराज हर्ष ने माँ भी मुझको कान्हा-कान्हा कहती है, भरोसा सबसे उठता जा रहा है/ समय हाथों से निकला जा रहा है/ कमा कर ला रहा, जो रोज घर में/ वो खुद ही खर्च होता जा रहा है जैसे मिसरों और शेरों से माहौल बनाया।

कवयित्री श्वाति खुशबू ने सरस्वती वंदना के साथ काव्य पाठ का शुभारंभ किया। उनकी मन अयोध्या सा पावन बना लीजिए, सकारात्मक राजनीति से देश धन्य हो जाता है, या मुझको मधुमास दिला दो/ या दे दो वनवास जैसी कविताओं ने खूब तालियां बटोरीं। डॉ. अंशु जोगी ने पलकों के झूले में पलती हैं स्त्रियां जैसी स्त्री विमर्श की रचनाएं पढ़ीं। कोलकाता के श्री राहुल अवस्थी ने घोर तमस जब छाएगा/ जब राह नजर न आएगी/ विजयी पुरखों का निर्णय ही/ तब श्रेष्ठ राह बतलाएगा, प्रेम हमारा मूल धर्म है/ दुनियाभर को बांटेंगे जैसी राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत कविताएं प्रस्तुत कीं।


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