आयुर्वेदिक अस्पताल में गरीब मरीज़ों के लिए दवा और तेल उपलब्ध नहीं
एक साल से क्लासिकल दवाओं की खरीदी नहीं, अस्पतालों का स्टॉक प्रभावित।
छह महीने से पेटेंट आयुर्वेदिक दवाओं की खरीदी ठप होने का दावा
CGMSC में आयुर्वेदिक दवाओं का स्टॉक लगभग शून्य
गरीब मरीज बाजार से महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर, मुफ्त इलाज का दावा सवालों में
रायपुर-बिलासपुर समेत प्रदेश के आयुर्वेदिक अस्पतालों में दवा संकट से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित
स्वास्थ्य विभाग के दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर, गरीब मरीजों पर पड़ रहा सीधा असर
रायपुर। प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं के लचर व्यवस्था होने के कारण प्रदेश में नागरिक आयुर्वेदिक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री को प्रदेश में जनता के लिए किसी भी जिले में आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझ में आती। पिछले एक वर्ष से ज़्यादा हो गया है जहां क्लासिकल दवाइयों की खरीदी नहीं की गई। पेटेंट दवाई तो छह महीने से नहीं खरीदी की गई। CGMSC के वेयरहाउस में आयुर्वेदिक दवाइयां बिल्कुल नील है लगभग ज़ीरो। यूँ कहें कि पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवा का बुरा हाल है। आयुर्वेदिक हॉस्पिटल में ग़रीब मरीज़ों को भी दवाईयां नहीं मिल रही है, ग़रीब मरीज़ मज़बुरी में पैसा लगाकर सभी दवाएं महंगे दामों में बाज़ार से ख़रीद रहे हैं।
अस्पताल प्रबंधन से पूछने पर स्पष्ट बताए की क्लासिकल आयुर्वेदिक दवा की खरीदी नहीं होने के कारण अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। ग़रीब मरीजों के लिए पेटेंट आयुर्वेदिक दवा भी अस्पताल में देने योग्य नहीं है। यही लचर व्यवस्थाओं के कारण CGMSC पूर्णतः ज़िम्मेदार है और इन्ही कारणों से स्वास्थ्य विभाग पूरे प्रदेश में बदनामी का कारण सरकार के लिए बनता जा रहा हैं। पेटेंट और क्लासिकल दवाओं के आलावा ग़रीब मरीज़ के लिए दर्द के तेल भी उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए सरकार के उच्च पद सूत्र के अनुसार कई बार CGMSC को दवाओं की खरीदी के आदेश भी दिया जा चुका है। इसी खबर को लेकर बिलासपुर आयुर्वेदिक अस्पताल के प्रमुख डीन डॉ. जीआर चतुर्वेदी और रायपुर के आयुर्वेदिक अस्पताल के प्रमुख डीन डॉ. प्रवीण जोशी से फ़ोन लगाकर जनता से रिश्ता अख़बार के दफ़्तर से बात करने की और सम्पूर्ण जानकारी लेने की कोशिश की गई। लेकिन दोनों ही अधिकारियों ने फ़ोन नहीं उठाया। इसका मतलब साफ़ है कि ग़रीब मरीजों के लिए आयुर्वेदिक दवा और बिलासपुर सहित प्रदेश में सरकारी अस्पताल में उपलब्ध नहीं है।
प्रदेश के अधिकतर बड़े सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज सालों पुरानी और जर्जर हो चुकी मशीनों के भरोसे चल रहा है।नई मशीने अगर खरीद भी लिए हैं तो उसे ऑपरेट करने कोई मिलता नहीं क्योकि योग्य ऑपरेटरों की कमी है। देखने में आ रहा है की संविदा कर्मचारियों व नर्सों के भरोसे बड़े बड़े सरकारी अस्पताल चल रहे हैं उसमे भी उनके वेतन में घोटाले और शोषण के मामले सामने आते रहते हैं, जिससे व्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है। प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में साफ-सुथरे शौचालय, स्वच्छ पेयजल और दवाओं की भारी कमी आम बात हो गई है। टॉयलेट में गंदगी पसरी हुई होती है। यही हाल आपातकालीन वार्डों की भी है जहाँ मरीजों की भारी भीड़ और डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को स्ट्रेचर या फर्श पर इलाज कराना पड़ता है।
प्रदेश शासन जब छत्तीसगढ़ की जनता के लिए स्वास्थ्य संबंधित सभी सुविधाएं मेकाहारा में उपलब्ध करा रही है उसके बावजूद डाक्टरों की लापरवाही से यहां के लोगों को फायदा नहीं मिल पा रहा है। ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों के इलाज में घोर लापरवाही बेहतर इलाज के आस में गांव से लोग राजधानी आते हैं लेकिन उन्हें क्या मालूम कि सरकारी खुद बीमार है। शहर के मरीज तो जैसे तैसे जान पहचान निकाल कर इलाज करा लेते हैं लेकिन ग्रामीणों का पुरसाने हाल नहीं है। दूर-दराज के ग्रामीण बेहतर इलाज के लिए रायपुर स्थित बड़े सरकारी अस्पताल में आते हैं लेकिन उन्हें क्या पता कि यहां सुविधा के नाम पर असुविधाओं का सामना करना पड़ेगा।
डॉक्टर जेनेरिक दवाई नहीं लिखते
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा में शासन द्वारा अति आवश्यक दवाइयों का टोटा है। धन्वंतरि मेडिकल स्टोर्स में भी अधिकतर दवाइयां नहीं मिलने की शिकायत मिलती है। अस्पतालों में लगभग कई दवाइयाँ सूची में है लेकिन मिलती मात्र कुछ ही दवाइयां है। डॉक्टर भी जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखते ऐसी दवाई लिखते जो दवाइयां बाजार में ऊंचे दामों में खरीदने के लिए मरीज और उनके परिजन मजबूर होते हैं।
स्वास्थ्य विभाग की दुर्गति की वजह?
स्वास्थ्य अमले का फेल होने का प्रमुख कारण राजनेता और रसूखदार अधिकारियों के पार्टनरशिप में निजी अस्पताल चलाना है । इनके धौंस या रसूख की वजह से स्वास्थ्य विभाग का चुप रहना मज़बूरी हो सकती है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री भी इनके धौंस के आगे घुटने टेकने मजबूर हैं? यह असंभव है लेकिन हालत यही बयान कर रहे हैं। पूरे छत्तीसगढ़ में इन अधिकारियो के स्वामित्व वाले या पार्टनरशिप में अस्पताल चल रहे हैं। क्या यही वजह है जिसके कारण निजी अस्पताल वाले खुली लूट मचा रखे हैं। एक बार अस्पताल में घुसे यानी जिंदगी भर की कमाई इन अस्पताल मालिकों के जेब में। यह भी देखा गया है की निजी अस्पताल वाले डाक्टर वही दवाई लिखते हैं जो उनके स्वामित्व वाले मेडिकल स्टोर में उपलब्ध रहते हैं। बाजार में जो इंजेक्शन 1500 की आती है। वही इंजेक्शन 2500 रूपये में इनके द्वारा संचालित मेडिकल स्टोर में मिलते हैं। मरीज की जान को खतरा बता कर बेतहाशा कमाई करने से ये पीछे नहीं रहते। सरकार का नाम खऱाब कर रहा स्वास्थ्य अमला प्रदेश सरकार का नाम खराब करने में स्वास्थ्य अमला कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखना चाहता मुख्यमंत्री की योजनाओं पर स्वास्थ्य अमला ने पतीला लगाया। सरकारी अस्पताल में मरीजों को जबरदस्ती इलाज के गफलत में रखकर निजी अस्पतालों के सुझाव दिए जाते हैं क्योकि शहर के कई निजी अस्पताल छुटभैय्या नेताओं और आईपीएस अधिकारियों के रिश्तेदारों के हैं। यही वजह है कि बड़े छुटभय्ये नेताओं की और बड़े अधिकारियों के अपने निजी अस्पतालों के होने से सरकारी अस्पतालों में मरीजों का इलाज सही ढंग से नहीं किया जाता। अस्पताल खुद बीमार सरकारी अस्पताल में मरीजों को किसी भी तरह का बहाना बताकर जैसे-तैसे उनको निजी अस्पतालों में भेजा जाता है।
टूटे हुए स्ट्रेचर, व्हील चेयर
ऐसा प्रदेश के सभी सरकारी अस्पतालों का हाल हो गया है। राजधानी के सबसे बड़े अस्पताल मेकाहारा को अव्यवस्थाओं का मर्ज लग गया है। यही मर्ज मरीज और उनके परिजनों को दर्द दे रहा है। हद तो तब हो जाती है जब इमरजेंसी में आए मरीजों को स्ट्रेचर तक नहीं मिल पाते। जो स्ट्रेचर हैं भी वो टूटे-फूटे हैं। यहां न केवल शहर बल्कि दूरस्थ इलाकों से और छत्तीसगढ़ के नक्सली इलाकों तक के मरीज इलाज के लिए यहां आते हैं। लेकिन, जब से अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में तब्दील किया गया है, व्यवस्थाएं चौपट होती दिख रही है। इनमें स्टे्चर व व्हील चेयर की कमी भी शामिल है। मर्चुरी में भी एयर कंडीशनर नहीं चलने की शिकायत हमेशा आते रहती है। राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल की दुर्गति किसी से छुपी नहीं है। जहां स्ट्रेचर टूटे हुए है और मरीज़ों को दर बदर की ठोकरें खानी पड़ रही है। मरीज़ों के परिजनों का कहना है कि अस्पताल में समय पर सही उपचार नहीं मिलने से बीमारी गंभीर हो रही है और मरीज अपनी जान भी गँवा रहे है ऐसे में मरीजों को निजी अस्पतालों में ले जाना पड़ता है जहाँ सिर्फ लूट के अलावा कुछ नहीं है। यदि वहां केस बिगड़ा तो फिर से सरकारी अस्पताल में रिफर कर देते हैं तब तक देर हो चुकी होती है मरीज पैसे से और अपने सेहत दोनों से लुट चुका होता है।