Bilaspur. बिलासपुर। मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स के बिलासपुर स्टोर मैनेजर सूरज सिंह की ओर से एफआईआर रद्द कराने के लिए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दाखिल याचिका वापस ले ली गई है। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को अपनी याचिका वापस लेने और आवश्यक कानूनी सुधारों के साथ नए सिरे से उचित याचिका प्रस्तुत करने की अनुमति दी है। हालांकि, इसके लिए न्यायालय ने याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये की लागत लगाई है।
न्यायालय के निर्देश के अनुसार लागत की राशि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करनी होगी। यह रकम बाद में बिलासपुर के तिफरा स्थित शासकीय दृष्टिबाधित एवं श्रवणबाधित विशेष विद्यालय को प्रदान की जाएगी। न्यायालय ने इस शर्त के साथ वर्तमान याचिका को वापस लेने की अनुमति देते हुए उसका निपटारा कर दिया। मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत आवेदन, उसमें मांगी गई अंतरिम राहत और मामले से जुड़े रिकॉर्ड का परीक्षण किया। इस दौरान आवेदन में कुछ तकनीकी कमियां सामने आईं।
जानकारी के अनुसार मालाबार गोल्ड एंड डायमंड्स के बिलासपुर स्टोर मैनेजर सूरज सिंह के खिलाफ तारबाहर पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस ने उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5) और 318(4) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया है। इस एफआईआर और उससे संबंधित आगे की कानूनी कार्रवाई को चुनौती देते हुए सूरज सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में तारबाहर थाने में दर्ज एफआईआर को निरस्त करने की मांग की गई थी। इसके साथ ही मामले की सुनवाई पूरी होने तक संबंधित कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए अंतरिम राहत भी मांगी गई थी। याचिकाकर्ता ने न्यायालय से आग्रह किया था कि एफआईआर को समाप्त किया जाए और याचिका लंबित रहने के दौरान उनके खिलाफ किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाए।
सुनवाई के समय हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से अंतरिम राहत के लिए पहले दाखिल किए गए आवेदन में आवश्यक और स्पष्ट प्रार्थना शामिल नहीं थी। आवेदन में याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी पर रोक लगाने की मांग स्पष्ट रूप से नहीं की गई थी। इसके कारण अदालत के सामने गिरफ्तारी से संरक्षण प्रदान करने के संबंध में विधिवत और स्पष्ट मांग उपलब्ध नहीं थी। न्यायालय को बताया गया कि याचिकाकर्ता की ओर से सुनवाई वाले दिन ही एक नया आवेदन दाखिल किया गया है। नए आवेदन में गिरफ्तारी पर रोक लगाने के साथ अन्य आवश्यक अंतरिम राहत को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया था। हालांकि, सुनवाई शुरू होने तक नया आवेदन न्यायालय के रिकॉर्ड में नहीं आ पाया था। रिकॉर्ड पर आवेदन उपलब्ध नहीं होने के कारण डिवीजन बेंच उस पर तत्काल विचार नहीं कर सकी।
इस परिस्थिति को देखते हुए याचिकाकर्ता की ओर से उपस्थित वरिष्ठ अधिवक्ता ने वर्तमान याचिका को वापस लेने की अनुमति मांगी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि याचिकाकर्ता तकनीकी और कानूनी कमियों को दूर करने के बाद नए सिरे से उचित याचिका दाखिल करना चाहता है। इसके लिए वर्तमान याचिका को वापस लेने की स्वतंत्रता प्रदान करने का अनुरोध किया गया। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ता के आग्रह को स्वीकार कर लिया। न्यायालय ने उसे वर्तमान याचिका वापस लेने की अनुमति देते हुए भविष्य में उचित प्रारूप और आवश्यक प्रार्थनाओं के साथ नई याचिका प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये की लागत जमा करने की शर्त लगाई।