बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 2011 के अवैध गर्भपात मामले में दो डॉक्टरों को दोषी सिद्ध माना है। न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास ने कटघोरा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा दोनों डॉक्टरों को बरी किए जाने के फैसले को आंशिक रूप से पलटते हुए मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमपीटी) एक्ट, 1971 की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के तहत आरोप सिद्ध माना। हालांकि, पीसी-पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के तहत लगाए गए आरोपों में बरी किए जाने का फैसला हाई कोर्ट ने बरकरार रखा।
अभियोजन के अनुसार, 5 अगस्त 2011 को कटघोरा के ब्लॉक मेडिकल ऑफिसर ने पुलिस को पत्र लिखकर अस्पताल में अवैध गर्भपात से संबंधित गतिविधियों की जांच का अनुरोध किया था। इसके दो दिन बाद 7 अगस्त 2011 को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने दीपका स्थित लाइफकेयर अस्पताल का निरीक्षण किया।
निरीक्षण के दौरान ऑपरेशन थिएटर में आपत्तिजनक उपकरण और अलग-अलग गर्भावस्था अवधि के भ्रूण मिलने की बात सामने आई। रिकॉर्ड के अनुसार इन भ्रूणों की गर्भावस्था अवधि 16 से 32 सप्ताह के बीच थी। निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर दीपका पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की।
हाई कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करते हुए कहा कि भ्रूणों की मौजूदगी और उनकी गर्भावस्था अवधि से संबंधित तथ्य रिकॉर्ड पर मौजूद हैं। वहीं, आरोपी डॉक्टर यह साबित नहीं कर सके कि संबंधित गर्भपात मां की जान बचाने के लिए सद्भावना में और कानून के अनुरूप किए गए थे।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए हाई कोर्ट ने एमपीटी एक्ट की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के तहत दोनों डॉक्टरों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया और इन धाराओं के आरोपों को अभियोजन द्वारा सिद्ध माना।
हालांकि, हाई कोर्ट ने पीसी-पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के तहत आरोपों को सिद्ध करने के लिए अभियोजन के साक्ष्यों को पर्याप्त नहीं माना। इस हिस्से में कटघोरा सत्र न्यायालय द्वारा दोनों डॉक्टरों को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया।
कोर्ट ने कहा कि पीसी-पीएनडीटी कानून का उद्देश्य प्रसवपूर्व निदान तकनीकों के दुरुपयोग और भ्रूण के लिंग चयन को रोकना है। लेकिन संबंधित धारा के तहत आरोप सिद्ध करने के लिए आवश्यक साक्ष्य इस मामले में पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं हुए।
राज्य की ओर से हाई कोर्ट में दलील दी गई कि अस्पताल में अवैध गर्भपात तथा दवाओं और उपकरणों के इस्तेमाल से संबंधित तथ्य डॉक्टरों के बयानों से स्थापित होते हैं। अभियोजन ने डॉ. दिनेश चौहान, डॉ. पी.आर. कुंभकार, डॉ. भुवनेश्वर सिंह कंवर, डॉ. एच.डी. दहिया और डॉ. अशोक माखीजा के बयानों का हवाला दिया।
जांच पूरी होने के बाद आरोप पत्र जेएमएफसी कटघोरा के समक्ष पेश किया गया था। बाद में मामला सत्र न्यायालय को भेजा गया। 31 अगस्त 2016 को कटघोरा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दोनों डॉक्टरों को सभी संबंधित आरोपों से बरी कर दिया था।
अब हाई कोर्ट ने उस फैसले को आंशिक रूप से बदलते हुए एमटीपी की धारा 5 और आईपीसी की धारा 315 के आरोपों में दोनों डॉक्टरों के खिलाफ अभियोजन का मामला सिद्ध माना है, जबकि पीसी-पीएनडीटी एक्ट की धारा 22(3) के आरोप में उनको बरी किया है।
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