प्रधानमंत्री कार्यालय के जांच आदेश को भी भूपेश सरकार ने रद्दी बनाया था
रिंगनी की भूमि का डायवर्सन कभी हुआ ही नहीं, किंतु पर्यावरणीय और औद्योगिक स्वीकृति लागू कैसे?
बड़े औद्योगिक घराने का खेल, रेलवे की जमीन का निकाल दिया तेल
कृषि भूमि पर सीमेंट उद्योग जांच कार्य लंबित है, जिला-प्रशासन के प्रति ग्रामीणों में रोष व्याप्त
भूमि की स्वीकृति, उपयोग और प्रवर्ग परिवर्तन तीनों असंगत और विरोधाभाषी
आरएचआईएल रेलवे साइडिंग भूमि का डायर्वसन ही नहीं कराया
नेवधा- रिंगनी क्षेत्र में डायवर्सन पेनाल्टी और ग्राम- आपत्ति की अनदेखी
मुख्य आधार भूमि अधिग्रहण का विरोधाभाष डायवर्सन आवेदन और रेलवे साइडिंग अलग-अलग
रायपुर (जसेरि)। सरकार उद्योगों को जमीन इसलिए देती है कि उससे जुड़े गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए ताकि वहां ये युवाओ को रोजगार मिले तथा किसानों को उनके जमीन का भरपूर मुआवजा मिल सके। लेकिन नेवधा -रिंगनी क्षेत्र में स्थापित रेलेव साइडिंग कंपनी ने सारे नियम कायदे को ताक में रखकर मनमानी में उतर गया है। सबसे बड़ी और मजेदार बात ये है कि पंचायत ने भू-उपयोग की पुन: निर्णय न किया जाए क्योंकि परियोजना बिना अनुमति चल रही है। एसा स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इसके क्या मायने माना जाए। रायपुर हैंडलिंग ड इंफ्रास्ट्रक्चर प्रा. लि. (आरएचआईएल) द्वारा नेबधा-रिंगनी क्षेत्र में स्थापित सा परियोजना की भूमि प्रक्रिया एक गहरी प्रशासनिक पहेली बन चुकी है। डायवर्जन आदेश (24 दिसंबर 2020), पंचायत अभिमत (3 दिसंबर 2020)। एसडीएम प्रतिवेदन (24 सितंबर 2020) और नवीनतम बी-1 अभिलेख (31 मार्च 2025) इन सबका तुलनात्मक अध्ययन है कि भूमि स्वीकृति, उपयोग और प्रवर्ग परिवर्तन तीनों असंगत हैं। मामले की जांच प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और राज्य शासन स्तर पर की गई है, तथा जांच कार्य वर्तमान में लंबित है, जिससे शासन-प्रशासन के प्रति व्यापक रोष व्याप्त है।
10 डायवर्सन आवेदन व क्षेत्र - विरोधाभास
आवेदन ग्राम नेवधा रिंगनी की 33 खसरा संख्या (12.676 है.) पर दाखिल हुआ, पर वास्तविक साइडिंग क्षेत्र ग्राम रिंगनी की भूमि (ख. 791 और 7923.19 है.) तक विस्तारित है। रिंगनी की इन भूमि खसरा का डायवर्जन कभी हुआ ही नहीं, किंतु पर्यावरणीय और औद्योगिक स्वीकृति इन्हीं पर व्यावहारिक रूप से लागू है।
यह तथ्य राजस्व निरीक्षक प्रतिवेदन (2 नवंबर 2020) और स्ष्ठरू प्रतिवेदन (28 फरवरी 2022 ) से पुष्ट है। 20 शासकीय भूमि का अंश हटाना और आवेदन सीमित करना डायवर्जन आवेश में केवल 29 खसरा (10.359 है.) स्वीकृत हुए। 170/1170/3,170/4 और 180/2 को शासकीय भूमि कहकर अलग कर दिया गया, जबकि ये सभी सेल डीड में आरएचआईएल द्वारा खरीदे गए दर्शाए गए हैं। 170/2 (0.809 हे.) भी आवेदन से बाहर रखी गई। अर्थात, आरएचआईएल ने जिन भू-खंडों का स्वामित्व लिया, उनका डायवर्जऩ नहीं कराया और जिनका डायवर्जऩ कराया, उनका स्वामित्व अधूरा या असत्यापित है।
30 ग्राम पंचायत की आपत्ति की अनदेखा
ग्राम पंचायत नेवधा ने 3 दिसंबर 2020 को लिखित आपत्ति दी कि भूमि पहले से 1994-95 से रेलवे साइडिंग उपयोग में है और ग्राम हित की भूमि का औद्योगिक रूपांतरण जनहित विरोधी होगा। पंचायत ने भू-उपयोग का पुन:निर्णय न किया जाए क्योंकि परियोजना बिना अनुमति चल रही है ऐसा स्पष्ट उल्लेख किया। इसके बावजूद डायवर्जऩ आदेश में पंचायत की आपत्ति को अनुपयुक्त / सहमति प्राप्त मानी गई कहकर दरकिनार किया गया। यह छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता धारा 59 (2) (5) के विपरीत है, जो पंचायत की अनिवार्य सहमति को पूर्व शर्त मानती है।
1994 से चालू साइडिंग पर पोस्ट- (फैक्टो मान्यता) और पेनाल्टी गणना
आदेश में स्वीकृत स्वयं लिखा है कि उक्त भूमि 1994-95 से रेलवे साइडिंग उपयोग में है। अर्थात 26 वर्ष तक बिना डायवर्जऩ औद्योगिक उपयोग चलता रहा। इन अवैध उपयोग के लिए राजस्व विभाग ने प्रीमियम व जुर्माना गणना की जिसकी विधि विवादास्पद है - भूमि मूल्यांकन 16.20 लाख प्रति हे. के दर से किया गया, 10.359 है। भूमि पर कुल 5,17,950 रु. प्रीमिय निकाला गया, साथ ही विकास उपकर 1,00,690 रु., ग्राम उपकर 50,345 रु., विद्युत व पर्यावरण उपकर प्रत्येक 11,328 रु. जोड़े गए। परंतु 26 वर्ष के अवैध औद्योगिक उपयोग के मुकाबले यह पेनाल्टी नाममात्र है; न तो पिछले उपयोग से आय गणना हुई, न नुकसान आकलन।
बी-1 अभिलेख और वर्तमान स्थिति
ग्राम नेवधा बी-1 (डिजिटल साइन 31.03.2025) में क्र॥ढ्ढरु के नाम 35 खसरा (14.0660 हे.) दर्ज हैं, पर प्रवर्ग अब भी कृषि भूमि का बना हुआ है। ग्राम रिंगनी बी-1 में खसरा 791 (0.860 हे.) व 792 (2.330 हे.) स्वामी एसस छापरिया नामक व्यक्ति के नाम पर दर्ज हैं, पर कैफियत कॉलम में रेलवे साइडिंग अंकित है। दोनों ग्रामों में भूमि अब तक कृषि प्रवर्ग में है। औद्योगिक उपयोग कानूनी रूप से अवैध एवं राजस्व रिकॉर्ड से असंगत है।
नियामक निष्क्रियता और जन- रोष
1994 से बिना अनुमति औद्योगिक उपयोग चलने के बावजूद अब तक कोई जांच या वसूली कार्रवाई पूर्ण नहीं हुई है। पीएमओ और राज्य शासन से की गई जांच रिपोर्ट अब तक लंबित है। इस देरी और ढिलाई से ग्रामवासी और जनप्रतिनिधियों में व्यापक रोष व्याप्त है। लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जब पंचायत ने आपत्ति दर्ज की थी और राजस्व रिकॉर्ड अब भी कृषि भूमि दर्शा रहे हैं, तो परियोजना को किस आधार पर वैध माना गया और पर्यावरण स्वीकृति कैसे दी गई। उपरोक्त नेवधा रिंगनी साइडिंग प्रकरण यह दिखाता है कि कैसे एक औद्योगिक संस्थान (सीमेंट उद्योग) ने 26 वर्ष तक राजस्व और पर्यावरणीय नियमों को दरकिनार करके भूमि का दुरुपयोग किया, और बाद में नाममात्र प्रीमियम देकर वैधता ले ली। यह मामला सिर्फ एक कंपनी सीमित नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के उद्योग-पर्यावरण नियमन तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। यह आवश्यक है कि इस प्रकरण पर राज्य स्तरीय संयुक्त जांच समिति (राजस्व + पर्यावरण + उद्योग) का गठन हो और भूमि डायवर्सन प्रक्रिया की पूर्ण ऑडिट हो।