सहायता राशि का आवेदन 2 साल से लंबित, हाईकोर्ट ने तहसीलदार पर जताई नाराजगी
CG हाईकोर्ट सख्त
बिलासपुर: शिवनाथ नदी में डूबने से पति की मौत के बाद सहायता राशि के लिए दिया गया आवेदन करीब 22 महीने तक लंबित रखे जाने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बोदरी तहसीलदार की कार्यशैली पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने सवाल उठाया कि एक पीड़ित परिवार को राहत से जुड़ा आवेदन इतने लंबे समय तक बिना निर्णय के क्यों रखा गया।
मामला उस महिला से जुड़ा है, जिसके पति की शिवनाथ नदी में डूबने से मौत हो गई थी। पति की मृत्यु के बाद महिला ने शासन की सहायता योजना के तहत आर्थिक मदद के लिए आवेदन दिया था। आवेदन संबंधित कार्यालय में पहुंच गया, लेकिन लंबे समय तक उस पर कोई ठोस निर्णय नहीं हुआ। करीब 22 महीने गुजरने के बाद भी राहत राशि का मामला लंबित रहने पर महिला ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट ने पूछा, आखिर इतनी देरी क्यों
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने प्रशासनिक प्रक्रिया में हुई देरी पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा कि आपदा या आकस्मिक मृत्यु के बाद दी जाने वाली सहायता राशि का उद्देश्य ही पीड़ित परिवार को समय पर राहत देना है। यदि ऐसे मामलों में महीनों और वर्षों तक आवेदन लंबित रखे जाएं, तो योजना का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित होता है। कोर्ट ने बोदरी तहसीलदार से यह स्पष्ट करने को कहा कि आवेदन को 22 महीने तक लंबित रखने की क्या वजह थी। प्रशासनिक अधिकारियों से अपेक्षा की गई कि ऐसे मामलों का समयसीमा के भीतर निराकरण किया जाए।
पति की मौत के बाद आर्थिक संकट
याचिका में बताया गया कि महिला के पति की शिवनाथ नदी में डूबने से मौत हो गई थी। परिवार के कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद घर की आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई। इसी वजह से महिला ने शासन की निर्धारित सहायता राशि के लिए आवेदन किया था।
आवेदन देने के बाद उसे उम्मीद थी कि तय प्रक्रिया के तहत जल्द आर्थिक मदद मिल जाएगी, लेकिन कार्यालयों के चक्कर लगाने के बावजूद मामला आगे नहीं बढ़ा। लंबे समय तक कोई निर्णय न होने से महिला की परेशानी और बढ़ती गई।
सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल
हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल एक आवेदन की देरी तक बात सीमित नहीं रखी, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने संकेत दिया कि राहत से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी आम नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में आवेदन प्राप्त होने के बाद दस्तावेजों की जांच, पात्रता का परीक्षण और सहायता राशि स्वीकृत करने की प्रक्रिया तय समय में पूरी होनी चाहिए। यदि किसी आवेदन में कमी हो तो आवेदक को तत्काल इसकी जानकारी दी जानी चाहिए।
जिम्मेदारी तय करने पर जोर
कोर्ट की नाराजगी के बाद अब मामले में संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी चर्चा में है। यह देखा जाएगा कि आवेदन किस स्तर पर अटका रहा और समय पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
प्रशासनिक व्यवस्था में फाइलों के लंबे समय तक लंबित रहने से पीड़ित लोगों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। खासकर मृत्यु, दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा जैसे मामलों में मिलने वाली सहायता राशि कई परिवारों के लिए तत्काल राहत का प्रमुख साधन होती है।
राहत योजनाओं का उद्देश्य समय पर मदद
शासन की सहायता योजनाएं इसलिए बनाई जाती हैं ताकि आकस्मिक दुर्घटना या आपदा से प्रभावित परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके। ऐसे मामलों में प्रक्रिया जितनी तेज होगी, प्रभावित परिवार को उतनी ही जल्दी राहत मिल सकती है। हाईकोर्ट ने इसी बात पर जोर देते हुए अधिकारियों की कार्यशैली पर नाराजगी जताई। न्यायालय ने कहा कि ऐसे आवेदनों को सामान्य फाइल की तरह लंबे समय तक लंबित रखना उचित नहीं है।
अब आगे की कार्रवाई पर नजर
मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद अब संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। तहसील स्तर पर आवेदन के लंबित रहने के कारणों की समीक्षा की जा सकती है और पीड़ित महिला के प्रकरण का जल्द निराकरण करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। यह मामला प्रशासनिक जवाबदेही का भी महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है। अदालत की सख्ती के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि राहत और सहायता से जुड़े मामलों में अधिकारी समयसीमा का अधिक गंभीरता से पालन करेंगे।