पूसा विश्वविद्यालय देगा मुफ्त ट्रेनिंग

Update: 2026-07-03 16:09 GMT

बिहार: औषधीय मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा ने विशेष अभियान शुरू किया है। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं और किसानों को आत्मनिर्भर बनाना है। विश्वविद्यालय के एडवांस सेंटर ऑफ मशरूम रिसर्च की ओर से खेती, प्रसंस्करण और मार्केटिंग से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जा रहा है, जिसमें कई जिलों के किसान और जीविका दीदियां शामिल हो रही हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार बिहार की जलवायु हेरेशियम और शिटाके जैसी औषधीय मशरूम प्रजातियों की खेती के लिए उपयुक्त है। इन मशरूमों की बाजार में कीमत 8 से 10 हजार रुपये प्रति किलो तक पहुंचती है, जिससे यह खेती अत्यधिक लाभकारी मानी जा रही है। मशरूम विशेषज्ञों का कहना है कि यह खेती ग्रामीण महिलाओं के लिए घर बैठे रोजगार का बेहतरीन माध्यम बन सकती है। 10×10 फीट के छोटे कमरे में भी इसका उत्पादन किया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे महिलाएं हर महीने 30 से 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर सकती हैं।

विश्वविद्यालय का लक्ष्य अगले दो वर्षों में बिहार को औषधीय मशरूम उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाना है। इसके लिए किसानों को स्पॉन उत्पादन से लेकर पैकेजिंग और मार्केटिंग तक का प्रशिक्षण दिया जाएगा। विशेषज्ञों ने बताया कि औषधीय मशरूम से 60 से अधिक मूल्यवर्धित उत्पाद बनाए जा सकते हैं, जिससे किसानों को सामान्य खेती की तुलना में 4 से 5 गुना अधिक लाभ मिल सकता है।

संस्थान ने इच्छुक किसानों, युवाओं और महिला समूहों से अपील की है कि वे प्रशिक्षण के लिए पूसा विश्वविद्यालय से संपर्क करें। यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और रोजगार के नए अवसर पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

सामग्री (Ingredients)

औषधीय मशरूम स्पॉन

गेहूं भूसा / सब्सट्रेट

पानी और नमी नियंत्रक सामग्री

साफ कमरा (10×10 फीट)

प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी

प्रक्रिया (संक्षेप में)

सबसे पहले मशरूम उत्पादन के लिए उपयुक्त कमरे की तैयारी की जाती है। इसके बाद स्पॉन और सब्सट्रेट की मदद से खेती शुरू होती है। सही तापमान और नमी बनाए रखकर उत्पादन किया जाता है। तैयार मशरूम की कटाई के बाद उसे बाजार में बेचा या प्रोसेसिंग करके मूल्यवर्धित उत्पाद बनाए जाते हैं।

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