पटना। बिहार की राजनीति में इन दिनों चुनावी मुद्दों के साथ राजनीतिक विरासत और प्रतीकों को लेकर भी नई खींचतान दिखाई दे रही है। शहरों, सड़कों और गोलंबरों का नाम बदलने या उन्हें दिवंगत नेताओं के नाम पर रखने से शुरू हुई यह सियासत अब आदमकद प्रतिमाएं स्थापित करने की मांग तक पहुंच गई है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने नेताओं की विरासत को सामने रखकर अलग-अलग सामाजिक समूहों को राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं।
राजनीतिक प्रतीकों को लेकर छिड़ी इस बहस की शुरुआत बख्तियारपुर का नाम बदलकर नीतीशपुर करने की मांग से हुई। इस प्रस्ताव के जरिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक जीवन, उनके प्रशासनिक योगदान और बिहार की राजनीति पर उनके प्रभाव को स्थायी पहचान देने की बात कही गई। इसके बाद जनता दल यूनाइटेड के नाम में नीतीश कुमार का नाम जोड़ने का सुझाव सामने आया। इन मांगों ने यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या राजनीतिक दल अब अपने वर्तमान नेतृत्व को ही अपनी स्थायी पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
नीतीश कुमार लंबे समय से बिहार की सत्ता और राजनीति के केंद्र में रहे हैं। उनके समर्थक उन्हें विकास, सुशासन और सामाजिक संतुलन की राजनीति से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में उनके नाम पर किसी शहर का नामकरण करने या पार्टी के नाम में उनका उल्लेख करने के सुझाव को समर्थक उनके योगदान के सम्मान के रूप में पेश कर रहे हैं। दूसरी ओर, विरोधी दल इन मांगों को व्यक्तिवादी राजनीति और चुनाव से पहले माहौल बनाने की कोशिश बता सकते हैं।
इस बहस के बीच केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने अपने पिता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के नाम तथा उनकी राजनीतिक विरासत को प्रमुखता से सामने रखा। रामविलास पासवान को बिहार के प्रमुख दलित नेताओं में गिना जाता है। उन्होंने दशकों तक प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चिराग पासवान लगातार खुद को अपने पिता की राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी बताते रहे हैं। ऐसे में रामविलास पासवान से जुड़े स्मारक, प्रतिमा और नामकरण के मुद्दे उनकी पार्टी की राजनीतिक रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
अब राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने इस बहस में शरद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामविलास पासवान के नाम जोड़कर इसका दायरा और बड़ा कर दिया है। तीनों नेताओं की बिहार की राजनीति में अलग-अलग पहचान रही है। शरद यादव समाजवादी राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल थे। उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देने में भूमिका निभाई। रघुवंश प्रसाद सिंह अपनी सादगी, ग्रामीण विकास से जुड़े मुद्दों और बेबाक राजनीतिक शैली के लिए पहचाने जाते थे। रामविलास पासवान का प्रभाव दलित राजनीति के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी रहा।
तेजस्वी यादव की ओर से इन नेताओं के नाम सामने रखने को केवल श्रद्धांजलि या सम्मान की मांग तक सीमित नहीं माना जा रहा है। इसके पीछे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी देखा जा रहा है। शरद यादव के नाम के माध्यम से समाजवादी मतदाताओं, रघुवंश प्रसाद सिंह के जरिए सवर्ण और ग्रामीण समर्थक वर्ग तथा रामविलास पासवान के सहारे दलित समुदाय के बीच पहुंच बनाने का प्रयास माना जा सकता है। हालांकि इन मांगों का वास्तविक राजनीतिक प्रभाव आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
बिहार की राजनीति में महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों और दिवंगत राजनीतिक नेताओं के नाम पर संस्थानों, सड़कों, भवनों तथा सार्वजनिक स्थलों का नामकरण पहले भी होता रहा है। लेकिन चुनावी माहौल में इस तरह की मांगों का राजनीतिक महत्व बढ़ जाता है। प्रतिमा या स्मारक किसी नेता की स्मृति को स्थायी बनाने का माध्यम होता है, लेकिन उसके जरिए संबंधित दल उस नेता के समर्थक सामाजिक वर्ग को भी अपने साथ जोड़ने का प्रयास करता है।
इस मामले में सत्ता पक्ष और विपक्ष की रणनीतियों में एक समानता दिखाई देती है। दोनों पक्ष अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए इतिहास और विरासत का सहारा ले रहे हैं। सत्तारूढ़ गठबंधन नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे नेताओं के योगदान को सामने रख सकता है, जबकि विपक्ष समाजवादी आंदोलन से जुड़े अलग-अलग दिग्गजों की साझा विरासत पर दावा पेश करने की कोशिश कर रहा है।
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बिहार में चुनावी समीकरण लंबे समय से जातीय और सामाजिक गठजोड़ के आसपास तैयार होते रहे हैं। ऐसे में किसी दिवंगत नेता की प्रतिमा लगाने की मांग को केवल सम्मान का विषय मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके जरिए यह संदेश देने का प्रयास भी किया जाता है कि संबंधित पार्टी उस नेता की विचारधारा, समर्थकों और सामाजिक आधार का प्रतिनिधित्व करती है।
शरद यादव, रघुवंश प्रसाद सिंह और रामविलास पासवान अलग-अलग दलों तथा राजनीतिक धाराओं से जुड़े रहे, लेकिन तीनों ने सामाजिक न्याय, ग्रामीण वर्ग और वंचित समुदायों की राजनीति में अपनी छाप छोड़ी। तेजस्वी यादव द्वारा इन सभी नेताओं का एक साथ उल्लेख करना व्यापक राजनीतिक विरासत को अपने पक्ष में जोड़ने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे राष्ट्रीय जनता दल खुद को केवल एक परिवार या सीमित सामाजिक समीकरण की पार्टी के बजाय व्यापक समाजवादी विरासत के प्रतिनिधि के रूप में पेश करने का प्रयास कर सकता है।
वहीं, नीतीश कुमार के नाम को सरकारी और राजनीतिक संस्थाओं से जोड़ने की मांग जदयू की भविष्य की राजनीति से भी जुड़ती है। पार्टी लंबे समय से नीतीश कुमार के नेतृत्व पर निर्भर रही है। उनके बाद पार्टी की राजनीतिक पहचान क्या होगी, यह सवाल समय-समय पर उठता रहा है। इसलिए उनके नाम और काम को स्थायी प्रतीकों से जोड़ने की कोशिश संगठन के लिए भावनात्मक और रणनीतिक दोनों रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि नामकरण और प्रतिमाओं से जुड़ी ये मांगें केवल राजनीतिक बयानों तक सीमित रहती हैं या सरकार तथा संबंधित निकाय इनके संबंध में कोई औपचारिक फैसला भी लेते हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति में विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों के साथ विरासत की लड़ाई भी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह प्रतीकात्मक सियासत चुनावी विमर्श और सामाजिक समीकरणों को और प्रभावित कर सकती है।