पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, राजस्व अफसरों के अधिकार सीमित

Update: 2026-07-16 13:33 GMT

पटना: हाईकोर्ट ने जमीन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि राजस्व अधिकारी 90 साल से अधिक पुरानी जमाबंदी को सामान्य या संक्षिप्त कार्यवाही के आधार पर रद्द नहीं कर सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि राज्य सरकार को किसी भूमि पर स्वामित्व या अधिकार को लेकर आपत्ति है, तो उसे उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी और इसके लिए सक्षम सिविल कोर्ट में टाइटल सूट दायर करना होगा।

पटना हाईकोर्ट की एकलपीठ ने इस मामले में दरभंगा के अतिरिक्त समाहर्ता द्वारा जारी किए गए तीन अलग-अलग जमाबंदी रद्दीकरण आदेशों को निरस्त कर दिया। न्यायाधीश सौरेन्द्र पांडेय की अदालत ने वाणी झा एवं अन्य, विभूति कुमार दास और निर्मला देवी की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता बिनय कांत मणि त्रिपाठी ने अदालत के सामने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से एससी-25 साजिद सलीम खान ने दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को केवल राजस्व अधिकारी की संक्षिप्त जांच के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि जिस जमाबंदी को रद्द किया गया था, वह लगभग 90 वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में थी। इसके बावजूद अतिरिक्त समाहर्ता ने जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि यह कार्रवाई ऐसे लोगों के खिलाफ की गई, जिनका काफी पहले ही निधन हो चुका था।

हाईकोर्ट ने इस बिंदु को गंभीरता से लेते हुए कहा कि मृत व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही चलाना और उनके नाम पर आदेश पारित करना कानून की नजर में उचित नहीं है। अदालत ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना। न्यायालय ने कहा कि किसी भी व्यक्ति के अधिकारों को प्रभावित करने वाली कार्रवाई में संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर दिया जाना जरूरी है।

मामले में राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि संबंधित भूमि सरकारी संपत्ति है। सरकार ने दावा किया कि सर्वे रिकॉर्ड में उक्त जमीन को पोखर के रूप में दर्ज किया गया है और इसलिए उस पर निजी जमाबंदी का अधिकार नहीं बनता है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि यदि राज्य सरकार को लगता है कि भूमि वास्तव में सरकारी है और किसी व्यक्ति की जमाबंदी गलत तरीके से दर्ज है, तो इसके लिए राजस्व अधिकारी सीधे जमाबंदी रद्द नहीं कर सकते। सरकार को अपने स्वामित्व का दावा साबित करने के लिए सिविल कोर्ट में टाइटल सूट दाखिल करना होगा।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टियों को बदलने या समाप्त करने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है। केवल प्रशासनिक स्तर पर आदेश जारी कर लंबे समय से चले आ रहे अधिकारों को खत्म नहीं किया जा सकता।

इस फैसले को जमीन और राजस्व मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बिहार में बड़ी संख्या में ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां पुरानी जमाबंदी, खतियान और जमीन के रिकॉर्ड को लेकर विवाद होते हैं। हाईकोर्ट के इस निर्णय से ऐसे मामलों में राजस्व अधिकारियों की भूमिका और अधिकारों की सीमा स्पष्ट हो गई है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि जमीन विवादों में प्रशासनिक प्रक्रिया के बजाय न्यायिक प्रक्रिया को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि किसी भूमि पर स्वामित्व का विवाद है तो उसका समाधान सिविल कोर्ट में ही होना चाहिए।

पटना हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य सरकार को भूमि संबंधी विवादों में सीधे जमाबंदी रद्द करने के बजाय अदालत की प्रक्रिया का सहारा लेना होगा। यह फैसला उन लोगों के लिए राहत देने वाला माना जा रहा है, जिनकी पुरानी जमीन रिकॉर्ड प्रविष्टियां बिना पर्याप्त सुनवाई के प्रभावित हो सकती थीं।

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