गुवाहाटी: टी रिसर्च एसोसिएशन (TRA) ने 'TocklAI' नाम का एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) मॉडल लॉन्च किया है। इसे खास तौर पर चाय उद्योग के लिए बनाया गया है। यह असम के टोकलाई टी रिसर्च इंस्टीट्यूट की सौ साल से ज़्यादा की रिसर्च को चाय बागान मालिकों और उत्पादकों के लिए एक डिजिटल टूल में बदलता है।
इसे गुरुवार को कोलकाता के टॉलीगंज क्लब में TRA की 62वीं सालाना आम बैठक में लॉन्च किया गया। इस मौके पर केंद्रीय विदेश और कपड़ा राज्य मंत्री पवित्र मार्गेरिटा, टी बोर्ड ऑफ इंडिया के डिप्टी चेयरमैन और CEO सी. मुरुगन और IFFCO के मैनेजिंग डायरेक्टर के. जे. पटेल मौजूद थे।
TRA ने कहा कि TocklAI दुनिया भर के चाय उद्योग के लिए खास तौर पर विकसित किया गया पहला AI मॉडल है। आम कामों के लिए बने AI सिस्टम के उलट, इसे 'रिट्रीवल-ऑगमेंटेड जेनरेशन सिस्टम' के ज़रिए TRA के वेरिफाइड रिसर्च डेटाबेस से जवाब खोजने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
इसका मकसद टोकलाई में दशकों से की गई रिसर्च को चाय बागानों में काम करने वाले लोगों के लिए ज़्यादा आसानी से उपलब्ध कराना है।
बागान मालिक, एस्टेट मैनेजर और छोटे चाय उत्पादक इस सिस्टम का इस्तेमाल कीड़ों और बीमारियों से बचाव, मिट्टी की सेहत, पौधों के पोषण, चाय के क्लोन, दोबारा पौधे लगाने, जलवायु के हिसाब से ढलने, प्रोसेसिंग और खाद्य सुरक्षा नियमों के पालन से जुड़े सवालों के जवाब पाने के लिए कर सकेंगे।
TRA के सेक्रेटरी जॉयदीप फुकन, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट का आइडिया सोचा और जो इसे लीड कर रहे हैं, ने कहा कि 2,000 से ज़्यादा साइंटिफिक पब्लिकेशन को पहले ही डिजिटाइज़ किया जा चुका है और उम्मीद है कि यह काम 18 महीनों में पूरा हो जाएगा।
फुकन ने कहा, "छोटे चाय उत्पादक अब भारत की आधी से ज़्यादा चाय का उत्पादन करते हैं, फिर भी उन्हें रिसर्च की जानकारी सबसे कम मिलती है।" उन्होंने कहा कि TocklAI का मकसद इसी अंतर को कम करना है।
इस प्रोजेक्ट में टोकलाई, टी बोर्ड ऑफ इंडिया के साइंटिस्ट और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के विशाल मिश्रा एक साथ काम कर रहे हैं। TRA की मैनेजमेंट काउंसिल ने इस साल जुलाई में इस प्रोजेक्ट को मंज़ूरी दी थी।
TRA के चेयरमैन सुनील सिंह सिकंद ने कहा कि इस पहल से टोकलाई की सौ साल पुरानी जानकारी सीधे चाय उत्पादकों तक पहुँचेगी।
सिकंद ने कहा, "टोकलाई के पास सौ साल का डेटा है जो दुनिया में किसी और के पास नहीं है।" भारतीय चाय को वैल्यू चेन में ऊपर ले जाने की कोशिश
मार्गेरिटा ने इस लॉन्च को उस संस्थान के लिए एक अहम कदम बताया जिसने चाय पर रिसर्च के 115 साल पूरे कर लिए हैं।
उन्होंने टी बोर्ड के 'चायंकन' (CHAAYANKAN) प्रोजेक्ट का भी ज़िक्र किया, जिसे ISRO के नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर और NIT राउरकेला के साथ मिलकर चलाया जा रहा है। यह प्रोजेक्ट प्लांटेशन की निगरानी, कीड़ों और बीमारियों का अनुमान लगाने और पैदावार का अंदाज़ा लगाने के लिए AI और जियोस्पेशियल टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है।
मंत्री ने चाय इंडस्ट्री से कहा कि वे युवा ग्राहकों के लिए प्रोडक्ट बनाएं और ज़्यादा वैल्यू वाले बाज़ारों की ओर बढ़ें, साथ ही ट्रेसेबिलिटी और नियमों का पालन भी बेहतर करें।
उन्होंने कहा कि असम सरकार ने इस सेक्टर को मदद दी है, जिसमें टोकलाई के लिए 10 करोड़ रुपये और छोटे चाय उत्पादकों के सेल के लिए 17 करोड़ रुपये शामिल हैं।
TRA ने एक्सपोर्ट और नियमों के पालन से जुड़ी चुनौतियों की ओर इशारा किया
हालांकि AGM में टेक्नोलॉजी पर ज़्यादा चर्चा हुई, लेकिन TRA ने अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भारतीय चाय के सामने बढ़ती चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया।
सिकंद ने कहा कि 2025-26 में चाय का एक्सपोर्ट बढ़कर लगभग 270 मिलियन किलोग्राम हो गया, जिसकी कीमत 8,300 करोड़ रुपये से ज़्यादा थी, लेकिन वेस्ट एशिया में संघर्ष और शिपिंग में रुकावटों के कारण जनवरी-जुलाई 2026 के दौरान एक्सपोर्ट में लगभग 16% की गिरावट आई।
उन्होंने भारतीय चाय एक्सपोर्टर्स के सामने नियमों के पालन को सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया।
TRA ने कहा कि चाय में इस्तेमाल के लिए मंज़ूर किए गए कीटनाशकों - एसिटामिप्रिड (Acetamiprid) और इमिडाक्लोप्रिड (Imidacloprid) - के लिए अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) का मामला अभी भी FSSAI के पास लंबित है। नियोनिकोटिनोइड्स (neonicotinoids) पर यूरोप के नए प्रतिबंधों का असर भी यूरोप भेजे जाने वाले शिपमेंट पर पड़ने लगा है।
TRA और UK टी एंड इन्फ्यूजन एसोसिएशन ने नियमों से जुड़ी जानकारी साझा करने के लिए अप्रैल में एक संयुक्त वर्किंग ग्रुप बनाया था, जिसमें बाद में यूरोप, अमेरिका और कनाडा के चाय एसोसिएशन भी शामिल हो गए।
सिकंद ने यह भी चेतावनी दी कि अगर चाय का उत्पादन घरेलू खपत के साथ तालमेल नहीं बिठा पाता है, तो 2037 के बाद भारत को चाय की सप्लाई की कमी का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने पुरानी चाय की झाड़ियों को उखाड़ने और उन्हें फिर से लगाने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम की मांग की, जिसमें मिट्टी के बेहतर प्रबंधन (रीजेनरेटिव सॉइल मैनेजमेंट) का भी ध्यान रखा जाए।
जलवायु के अनुकूल नया चाय क्लोन जारी किया गया
TRA ने TV 36 नाम का एक नया चाय क्लोन भी जारी किया, जिसे जलवायु के अनुकूल होने को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। एसोसिएशन के अनुसार, इस क्लोन पर ब्रीडिंग के दौरान मौसम में बदलाव का सबसे कम असर पड़ा और साथ ही इसकी पैदावार की क्षमता भी अच्छी बनी रही।
इस बीच, IFFCO ने TRA के साथ चार साल के जॉइंट ट्रायल के बाद चाय की खेती के लिए 'नैनो यूरिया प्लस' और 'नैनो DAP' लॉन्च किए। खबरों के मुताबिक, इन ट्रायल्स में पैदावार में 8-14% की बढ़ोतरी देखी गई और अब इन प्रोडक्ट्स को TRA के 'पैकेज ऑफ़ प्रैक्टिसेज' में शामिल किया जाएगा।
टी बोर्ड के 'नेशनल टी रिसर्च फाउंडेशन' से फंडेड TRA की एक स्टडी में 397 ऐसे फ्लेवर कंपाउंड्स की पहचान की गई जो दार्जिलिंग चाय को नेपाल समेत सात अन्य जगहों पर पैदा होने वाली चाय से अलग बनाते हैं। TRA ने कहा कि ये नतीजे दार्जिलिंग चाय की भौगोलिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान कर सकते हैं।
'फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइज़ेशन' ने भी TRA को जलवायु परिवर्तन और चाय पर एक ग्लोबल फ्रेमवर्क तैयार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी है, जिसका मकसद इस सेक्टर को 'नेट-ज़ीरो एमिशन' की ओर बढ़ने में मदद करना है।
TRA ने छोटे चाय उत्पादकों को वैज्ञानिक मदद देने के लिए असम और पश्चिम बंगाल में 'चाय विज्ञान केंद्र' स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है।