गोलाघाट: असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में गोलाघाट जिले स्थित ऐतिहासिक नेघेरिटिंग शिव डौल मंदिर का दौरा किया और भगवान शिव की पूजा-अर्चना की। उन्होंने मंदिर में श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए व्यवस्थाओं की समीक्षा भी की।

करीब 1200 साल पुराने इस शिव मंदिर को असम की प्राचीन धार्मिक और स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख स्थान बना हुआ है।
8वीं शताब्दी से जुड़ा इतिहास
नेघेरिटिंग शिव डौल का मूल निर्माण 8वीं शताब्दी में कछारी शासकों के समय हुआ माना जाता है। प्राकृतिक आपदाओं के कारण मंदिर को नुकसान पहुंचा था, जिसके बाद अहोम राजा स्वर्गदेव राजेश्वर सिंह ने वर्ष 1765 में इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर के पुनर्निर्माण की जिम्मेदारी प्रसिद्ध वास्तुकार घनश्याम खोनिकर को दी गई थी। इसकी वास्तुकला में अहोम काल की कला और धार्मिक परंपराओं की झलक दिखाई देती है।
पंचदेव मंदिर की अनोखी संरचना
नेघेरिटिंग शिव डौल की सबसे खास बात इसकी पंचायतन शैली है। मुख्य शिव मंदिर के चारों ओर भगवान विष्णु, गणेश, सूर्य और मां दुर्गा के मंदिर स्थित हैं। यह धार्मिक स्थापत्य की एक विशेष शैली को दर्शाता है।
पहाड़ी पर स्थित है मंदिर
यह प्राचीन मंदिर गोलाघाट जिले के डेरगांव क्षेत्र में एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। प्राकृतिक सुंदरता के बीच बने इस मंदिर का वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभव देता है।
नाम से जुड़ी रोचक कहानी
मान्यता है कि जिस स्थान पर मंदिर स्थित है, वहां कभी ‘नेघेरी’ नामक एक विशेष पक्षी पाए जाते थे। इसी के नाम पर इस स्थान का नाम नेघेरिटिंग पड़ा।
धार्मिक और पर्यटन महत्व
आज नेघेरिटिंग शिव डौल सिर्फ पूजा स्थल ही नहीं बल्कि असम की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। महाशिवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। सदियों पुराने इतिहास, अनोखी वास्तुकला और धार्मिक मान्यताओं के कारण यह मंदिर असम के प्रमुख आध्यात्मिक स्थलों में शामिल है।
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