गुवाहाटी: असम के कुछ इलाकों में रहने वाले राभा समुदाय के लिए एक विशाल आकार की मकड़ी सिर्फ डराने वाला जीव नहीं, बल्कि एक पारंपरिक मौसमी व्यंजन भी है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में कुछ क्षेत्रों के लोग जंगलों में मिलने वाली बड़ी मकड़ियों को भोजन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

राभा समुदाय की यह अनोखी खाद्य परंपरा असम की समृद्ध जनजातीय संस्कृति और स्थानीय खान-पान की विविधता को दर्शाती है। हालांकि, यह व्यंजन हर जगह आम नहीं है और मुख्य रूप से कुछ विशेष समुदायों और क्षेत्रों तक ही सीमित है।
जंगल से जुटाई जाती है मकड़ी
स्थानीय लोगों के अनुसार, यह विशाल मकड़ी विशेष मौसम में जंगलों और आसपास के इलाकों में मिलती है। समुदाय के कुछ लोग इसे पारंपरिक तरीके से पकड़ते हैं और फिर साफ करके पकाते हैं।
इसे तैयार करने के लिए स्थानीय मसालों और पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। कई लोग इसे भूनकर या अन्य स्थानीय व्यंजनों के साथ खाते हैं।
परंपरा से जुड़ा है भोजन
राभा समुदाय के लिए यह केवल भोजन नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। स्थानीय खान-पान में जंगलों से मिलने वाले कई जीव-जंतु और वन उत्पाद लंबे समय से शामिल रहे हैं।
समुदाय के बुजुर्गों का मानना है कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ी है।
स्थानीय लोगों का अलग नजरिया
जहां बाहरी लोगों के लिए मकड़ी खाना असामान्य और हैरान करने वाला हो सकता है, वहीं स्थानीय समुदाय इसे सामान्य मौसमी भोजन मानता है। उनके लिए यह जंगल आधारित जीवनशैली और पारंपरिक ज्ञान का हिस्सा है।
वन्यजीव संरक्षण को लेकर सावधानी जरूरी
हालांकि, ऐसे खाद्य व्यवहार में स्थानीय नियमों और वन्यजीव संरक्षण कानूनों का ध्यान रखना जरूरी है। सभी प्रजातियों का शिकार या सेवन कानूनी रूप से अनुमति प्राप्त नहीं होता।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी पारंपरिक भोजन को अपनाते समय जैव विविधता और पर्यावरण संतुलन को ध्यान में रखना आवश्यक है।
असम के राभा समुदाय की यह परंपरा देश की विविध संस्कृति और अलग-अलग क्षेत्रों के अनूठे खान-पान की झलक पेश करती है।
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