गुवाहाटी। असम की राजधानी गुवाहाटी में गुरुवार को करवाचौथ का त्योहार श्रद्धा, उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया गया। पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ दिनभर निर्जला व्रत रखने वाली महिलाओं का इंतजार रात में चंद्रमा दिखाई देने के बाद समाप्त हुआ। चांद के दर्शन होते ही महिलाओं ने पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की और चंद्रमा को जल अर्पित कर अपना व्रत खोला। इस दौरान कई महिलाओं ने अपने पतियों के साथ पूजा की रस्में निभाईं। करवाचौथ के अवसर पर गुवाहाटी में धार्मिक आस्था, पारिवारिक प्रेम और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का सुंदर संगम देखने को मिला।
गुरुवार सुबह से ही गुवाहाटी में करवाचौथ को लेकर महिलाओं के बीच उत्साह बना हुआ था। विवाहित महिलाओं ने सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण कर व्रत की शुरुआत की। इसके बाद दिनभर बिना अन्न और जल ग्रहण किए चंद्रमा के दर्शन का इंतजार किया। शाम होते ही महिलाओं ने पूजा की तैयारियां शुरू कर दीं। पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की तथा अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
इस वर्ष करवाचौथ गुरुवार, 29 अक्टूबर को मनाया गया। गुवाहाटी के लिए पंचांग के अनुसार, पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 4 बजकर 43 मिनट से 6 बजे तक निर्धारित था। वहीं, चंद्रोदय का अनुमानित समय रात 7 बजकर 23 मिनट बताया गया था। हालांकि, स्थानीय परिस्थितियों, बादलों और आसपास की इमारतों के कारण वास्तविक चंद्रदर्शन के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।
शाम के समय पूजा संपन्न होने के बाद महिलाओं की नजरें आसमान की ओर टिकी रहीं। चंद्रमा दिखाई देने के बाद उन्होंने पूजा की थाली में रखे दीपक और जल से भरे करवे के साथ चंद्रदेव की आराधना की। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, कई महिलाओं ने छलनी से पहले चंद्रमा और फिर अपने पति का चेहरा देखा। इसके बाद पतियों ने अपनी पत्नियों को पानी पिलाकर व्रत खुलवाया।
करवाचौथ के अवसर पर महिलाओं ने लाल, गुलाबी, पीले और मैरून रंग की साड़ियां तथा पारंपरिक सूट पहने। हाथों में मेहंदी, चूड़ियां, माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर लगाकर महिलाओं ने अपना श्रृंगार पूरा किया। पूजा की सजी हुई थालियां और पारंपरिक वस्त्र त्योहार की रौनक बढ़ाते दिखाई दिए।
करवाचौथ का त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में मनाया जाता है, लेकिन अब देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले परिवार भी इसे उत्साहपूर्वक मनाते हैं। असम की राजधानी गुवाहाटी में भी विभिन्न समुदायों के लोग अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार यह पर्व मनाते हैं। विशेष रूप से उत्तर भारतीय परिवारों में करवाचौथ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है।
इस पर्व पर विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए व्रत रखती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवाचौथ का व्रत परिवार में सुख-शांति और वैवाहिक जीवन में प्रेम बनाए रखने की भावना से जुड़ा हुआ है।
गुवाहाटी में करवाचौथ के अवसर पर कई परिवारों में सामूहिक पूजा की परंपरा भी निभाई गई। महिलाएं एक स्थान पर एकत्र होकर करवाचौथ की कथा सुनती हैं और पूजा की थालियों के साथ धार्मिक अनुष्ठान करती हैं। इसके बाद सभी चंद्रमा के दर्शन का इंतजार करती हैं।
करवाचौथ की पूजा में मिट्टी या धातु से बने करवे का विशेष महत्व होता है। पूजा की थाली में दीपक, चावल, रोली, मिठाई और अन्य सामग्री रखी जाती है। महिलाएं भगवान गणेश, माता पार्वती और भगवान शिव की आराधना करती हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, शाम को करवाचौथ की कथा सुनने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलने की विधि अपनाई जाती है।
इस त्योहार से जुड़ी सरगी की परंपरा भी काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। कई परिवारों में सास अपनी बहू को सरगी देती हैं। इसमें फल, सूखे मेवे, मिठाइयां और अन्य खाद्य पदार्थ शामिल होते हैं। महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करती हैं और इसके बाद व्रत की शुरुआत करती हैं।
करवाचौथ का त्योहार पति-पत्नी के बीच प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती हैं। हालांकि, बदलते समय के साथ कई परिवारों में पति भी अपनी पत्नियों के साथ व्रत रखने लगे हैं। इससे यह पर्व पारस्परिक सम्मान और सहयोग की भावना से भी जुड़ता जा रहा है।
नई विवाहित महिलाओं के लिए पहला करवाचौथ विशेष महत्व रखता है। कई परिवारों में इस अवसर पर विशेष पूजा और पारंपरिक आयोजन किए जाते हैं। महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं और परिवार के बड़े सदस्यों का आशीर्वाद लेती हैं। इस दौरान रिश्तेदार और परिवार के सदस्य भी त्योहार की खुशियों में शामिल होते हैं।
करवाचौथ से पहले बाजारों में भी पूजा सामग्री और श्रृंगार के सामान की मांग रहती है। महिलाएं चूड़ियां, मेहंदी, करवा, छलनी, मिठाई और पारंपरिक वस्त्रों की खरीदारी करती हैं। इसके साथ ही कई परिवारों में त्योहार के अवसर पर विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं।
करवाचौथ की परंपरा से जुड़ी वीरावती की कथा भी काफी प्रचलित है। इस कथा में व्रत, पारिवारिक प्रेम और चंद्रदर्शन से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का वर्णन मिलता है। पूजा के दौरान महिलाएं इस कथा को सुनती हैं और पारंपरिक विधि से व्रत का पालन करती हैं।
हालांकि, करवाचौथ के रीति-रिवाज सभी परिवारों में एक जैसे नहीं होते। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की सामग्री, व्रत रखने के नियम और चंद्रमा को अर्घ्य देने की विधि में कुछ अंतर देखने को मिलता है। कई परिवार अपनी पुरानी परंपराओं का पालन करते हैं, जबकि कुछ लोग आधुनिक जीवनशैली के अनुसार त्योहार मनाते हैं।
आज के दौर में सोशल मीडिया ने भी करवाचौथ के उत्सव को नया स्वरूप दिया है। लोग इस अवसर पर अपनी तस्वीरें और वीडियो साझा करते हैं। कई दंपती त्योहार के दौरान एक-दूसरे को उपहार देकर अपनी खुशियां व्यक्त करते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ इस पर्व का पारिवारिक महत्व भी है। करवाचौथ के अवसर पर परिवार के सदस्य एक साथ आते हैं और पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाते हैं। ऐसे त्योहार विभिन्न समुदायों को अपनी संस्कृति और पारिवारिक विरासत से जुड़े रहने का अवसर प्रदान करते हैं।
गुरुवार रात गुवाहाटी में चंद्रमा के दर्शन के साथ महिलाओं के दिनभर के इंतजार का समापन हुआ। सुहागिनों ने चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और परिवार की खुशहाली की कामना की। इसके बाद पारंपरिक विधि से व्रत खोलकर परिवार के साथ त्योहार की खुशियां साझा कीं। इस तरह असम की राजधानी गुवाहाटी में करवाचौथ का पर्व श्रद्धा, प्रेम और उल्लास के साथ मनाया गया।
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