गुवाहाटी। असम की नौगांव लोकसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा दांव खेला है। पार्टी ने पूर्व नौकरशाह **देबाशीष शर्मा** को अपना उम्मीदवार बनाया है। खास बात यह है कि शर्मा ने कुछ दिन पहले ही सरकारी सेवा छोड़कर सक्रिय राजनीति का रुख किया और **8 सितंबर को भाजपा की सदस्यता ली थी।** इसके कुछ ही दिनों के भीतर पार्टी ने उन्हें लोकसभा उपचुनाव के लिए चुनावी मैदान में उतार दिया।
देबाशीष शर्मा की उम्मीदवारी इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह नौगांव के जिला आयुक्त यानी DC रह चुके हैं। जिस इलाके में उन्होंने प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम किया, अब उसी संसदीय क्षेत्र में वह भाजपा के टिकट पर वोट मांगते दिखाई देंगे।
नौगांव लोकसभा उपचुनाव के लिए मतदान 6 अक्टूबर को होना है। ऐसे में टिकट की घोषणा के साथ ही भाजपा ने चुनावी तैयारियां तेज कर दी हैं।
कौन हैं देबाशीष शर्मा?
देबाशीष शर्मा पूर्व IAS अधिकारी हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक वह असम-मेघालय कैडर के 2011 बैच के IAS अधिकारी रहे हैं। हालांकि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत असम सिविल सेवा यानी ACS से की थी और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए।
लंबे प्रशासनिक करियर के दौरान शर्मा ने अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालीं। नौगांव के साथ वह मोरीगांव के भी डिप्टी कमिश्नर रह चुके हैं। नौगांव में उनकी प्रशासनिक भूमिका की वजह से क्षेत्र के लोगों के बीच उनकी पहले से पहचान रही है। भाजपा अब इसी प्रशासनिक अनुभव और स्थानीय पहचान को चुनावी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
पहले सरकारी नौकरी छोड़ी फिर राजनीति में एंट्री
देबाशीष शर्मा की राजनीति में एंट्री बेहद तेजी से हुई है। नौगांव जिला आयुक्त के पद पर रहते हुए उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति यानी VRS का विकल्प चुना। असम सरकार ने उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया और इसके बाद उनकी सरकारी सेवा समाप्त हो गई। उनके स्थान पर 2020 बैच के IAS अधिकारी अरण्यक सैकिया को नौगांव का नया जिला आयुक्त नियुक्त किया गया।
VRS के बाद से ही चर्चा शुरू हो गई थी कि शर्मा सक्रिय राजनीति में उतर सकते हैं। साथ ही यह संभावना भी जताई जा रही थी कि भाजपा उन्हें नौगांव लोकसभा उपचुनाव में टिकट दे सकती है।
कुछ ही दिनों में ये अटकलें सही साबित हो गईं।
8 सितंबर को थामा था भाजपा का दामन
देबाशीष शर्मा ने 8 सितंबर को औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार लेनिन सौरव बोरा और गुंजन कलिता भी भाजपा में शामिल हुए थे।
कार्यक्रम में असम भाजपा अध्यक्ष और सांसद दिलीप सैकिया के साथ कैबिनेट मंत्री पीयूष हजारिका, जयंत मल्ला बरुआ और कौशिक राय, नौगांव विधायक रूपक शर्मा समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
दिलचस्प बात यह है कि जब शर्मा भाजपा में शामिल हुए थे, तब पार्टी ने उनका टिकट घोषित नहीं किया था। उल्टा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा था कि शर्मा ने भाजपा में आने से पहले टिकट नहीं मांगा था और पार्टी के पास उम्मीदवारों का एक पैनल मौजूद है। उन्होंने यह जरूर कहा था कि शर्मा या नौगांव के लोगों की ओर से मांग आने पर पार्टी नेतृत्व उनकी उम्मीदवारी पर विचार कर सकता है।
अब पार्टी ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाकर सारी अटकलों पर विराम लगा दिया है।
प्रशासनिक अनुभव पर BJP का भरोसा
भाजपा नेतृत्व ने शर्मा के पार्टी में प्रवेश के समय उनके प्रशासनिक और सामाजिक अनुभव की तारीफ की थी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा था कि शर्मा को असम के सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक जीवन का अनुभव है और उनके आने से पार्टी मजबूत होगी।
यही अनुभव अब चुनाव में भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
एक पूर्व जिला अधिकारी होने के कारण शर्मा को प्रशासनिक व्यवस्था, स्थानीय समस्याओं और क्षेत्र की सामाजिक परिस्थितियों की जानकारी होने की उम्मीद है। हालांकि प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम करना और चुनावी राजनीति में जनता से सीधे वोट मांगना दो अलग भूमिकाएं हैं। इसलिए यह उपचुनाव उनके लिए पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी होगा।
नौगांव BJP के लिए आसान सीट नहीं
देबाशीष शर्मा को टिकट देने के पीछे भाजपा की रणनीति को नौगांव के चुनावी समीकरण से भी जोड़कर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा खुद कह चुके हैं कि नौगांव परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत क्षेत्र नहीं है।
पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां करीब ढाई लाख वोटों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। मुख्यमंत्री ने कहा था कि पार्टी आगामी उपचुनाव में जीत-हार का दावा करने के बजाय अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में अपने प्रदर्शन को बेहतर करने की रणनीति पर काम करेगी।
नौगांव लोकसभा क्षेत्र के तहत जागीरोड, मोरीगांव, राहा, सामागुरी, धींग, लाहोरीघाट और रूपहीहाट विधानसभा क्षेत्र आते हैं। 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जागीरोड, मोरीगांव और राहा में जीत दर्ज की थी, जबकि बाकी चार क्षेत्रों में कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने बाजी मारी थी।
अल्पसंख्यक वोट होंगे बड़ी चुनौती
नौगांव संसदीय क्षेत्र में अल्पसंख्यक मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। यही वजह है कि भाजपा इस बार अपने परंपरागत आधार के साथ उन इलाकों में भी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रही है जहां पार्टी पहले कमजोर रही है।
हाल ही में धींग क्षेत्र में भाजपा ने बड़ा चुनावी कार्यक्रम किया था। इस दौरान कांग्रेस से जुड़े 21 पंचायत प्रतिनिधियों और 100 से ज्यादा नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के भाजपा में शामिल होने का दावा किया गया। इसी कार्यक्रम में देबाशीष शर्मा भी संभावित भाजपा उम्मीदवार के रूप में मौजूद थे।
इससे संकेत मिलता है कि पार्टी टिकट की औपचारिक घोषणा से पहले ही शर्मा को चुनावी गतिविधियों के केंद्र में ला चुकी थी।
क्यों खाली हुई नौगांव सीट?
नौगांव लोकसभा सीट कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई के इस्तीफे के बाद खाली हुई है। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने यहां उपचुनाव का कार्यक्रम घोषित किया। मतदान 6 अक्टूबर को होना है।
इस उपचुनाव में भाजपा के सामने अपनी पिछली बड़ी हार का अंतर कम करने और सीट पर वापसी की चुनौती है। पार्टी पहले इस लोकसभा क्षेत्र में चार बार जीत हासिल कर चुकी है, इसलिए भाजपा इसे फिर अपने खाते में लाने की कोशिश कर रही है।
दूसरे दलों ने भी शुरू की तैयारी
नौगांव में केवल भाजपा ही सक्रिय नहीं है। उपचुनाव की घोषणा के साथ दूसरे दल भी उम्मीदवार और चुनावी रणनीति तैयार करने में जुट गए हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने सेवानिवृत्त प्रोफेसर अब्दुल सलाम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि AIUDF की ओर से रेजाउल करीम सरकार को मैदान में उतारा गया है।
ऐसे में मुकाबला केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित रहने के बजाय कई उम्मीदवारों के कारण दिलचस्प हो सकता है। खासकर अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा चुनाव परिणाम पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
पूर्व DC होने का मिलेगा फायदा या बनेगा सवाल?
देबाशीष शर्मा के लिए सबसे बड़ी ताकत उनकी प्रशासनिक पृष्ठभूमि है। नौगांव के DC रहने की वजह से वह क्षेत्र और वहां की समस्याओं से परिचित हैं। भाजपा इसी पहचान को चुनाव में भुनाने की कोशिश कर सकती है।
लेकिन उनकी तेज राजनीतिक एंट्री विपक्ष को हमला करने का मौका भी दे सकती है। कुछ दिन पहले तक सरकारी अधिकारी रहे शर्मा अब उसी क्षेत्र में सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार हैं। इसे लेकर राजनीतिक सवाल उठना स्वाभाविक है।
उनकी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को लेकर पहले ही राजनीतिक विवाद सामने आया था और उनके नौगांव DC तथा जिला निर्वाचन अधिकारी के कार्यकाल को लेकर चुनाव आयोग से जांच की मांग भी की गई थी।
चार दिन में बदल गई पूरी भूमिका
कुछ ही दिनों के भीतर देबाशीष शर्मा की भूमिका पूरी तरह बदल गई है। पहले वह नौगांव के प्रशासनिक प्रमुख थे, फिर VRS लेकर सरकारी सेवा से बाहर आए, 8 सितंबर को भाजपा में शामिल हुए और अब पार्टी ने उन्हें लोकसभा उपचुनाव का उम्मीदवार बना दिया है।
अब उनके सामने प्रशासनिक अधिकारी की पहचान को राजनीतिक समर्थन में बदलने की चुनौती है। नौगांव का सामाजिक और चुनावी समीकरण भाजपा के लिए आसान नहीं है और मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी पिछली बड़ी हार को स्वीकार करते हुए सावधानी से चुनाव लड़ने की बात कर चुके हैं।
इसलिए 6 अक्टूबर का उपचुनाव केवल नौगांव की सीट का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि पूर्व नौकरशाह देबाशीष शर्मा का प्रशासन से राजनीति में आया नया सफर कितना सफल होता है।
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