असम। असम के प्रसिद्ध वन्यजीव क्षेत्र से सटे गांवों में इंसान और जंगली जानवरों के बीच वर्षों से एक अलग तरह का सह-अस्तित्व देखने को मिलता है। यहां रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि जंगल और गांव की सीमाएं भले अलग हों, लेकिन उनका जीवन वन्यजीवों के साथ तालमेल बनाकर चलता है।
असम के एक ऐसे ही गांव मोहपारा के किसान तुलोन गोगोई का कहना है कि उनके घरों के आसपास अक्सर जंगली जानवर दिखाई देते हैं, लेकिन ग्रामीणों ने उनके साथ रहने का तरीका सीख लिया है। उन्होंने कहा कि यहां गैंडे घूमते रहते हैं, हिरणों का दिखना आम बात है और कुछ महीने पहले एक तेंदुए ने भी इलाके में बच्चे को जन्म दिया था।
वन्यजीवों के बीच बसा है गांव
मोहपारा गांव जंगल क्षेत्र की सीमा से सटा हुआ है। यहां रहने वाले लोग लंबे समय से वन्यजीवों की मौजूदगी के बीच अपना जीवन जी रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार, जंगल से सटे होने के बावजूद यहां जानवरों और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाएं बेहद कम देखने को मिलती हैं। लोग वन्यजीवों के व्यवहार को समझते हैं और उनके आने-जाने के रास्तों में बाधा नहीं डालते।
तुलोन गोगोई बताते हैं कि उनके गांव में जंगली जानवरों की मौजूदगी नई बात नहीं है। ग्रामीण इसे खतरे की बजाय प्रकृति का हिस्सा मानते हैं।
पक्के घर, लेकिन नहीं हैं ऊंची दीवारें
मोहपारा और आसपास के गांवों में कई पक्के मकान बने हुए हैं। कुछ घर तो कई मंजिला भी हैं, लेकिन खास बात यह है कि अधिकतर घरों के चारों ओर पक्की बाउंड्री वॉल नहीं बनाई गई है।
ग्रामीणों ने घरों के आसपास बांस की साधारण बाड़ लगा रखी है। उनका मानना है कि इससे जंगली जानवरों की आवाजाही में रुकावट नहीं आती और वे अपने प्राकृतिक रास्तों से गुजर सकते हैं।
गोगोई का कहना है कि गांव के लोग जानबूझकर ऐसी व्यवस्था रखते हैं ताकि इंसानों और जानवरों के बीच दूरी और संतुलन बना रहे।
नए नियमों पर ग्रामीणों ने उठाए सवाल
ग्रामीणों ने कुछ नए नियमों और व्यवस्थाओं को लेकर सवाल भी उठाए हैं। उनका कहना है कि जब वर्षों से गांव में इंसान और वन्यजीव बिना बड़े संघर्ष के साथ रह रहे हैं, तो नई पाबंदियों की जरूरत क्यों पड़ रही है।
तुलोन गोगोई का सवाल है कि ऐसी व्यवस्थाएं लागू करने से पहले स्थानीय लोगों के अनुभवों और परंपराओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
उनका कहना है कि जंगल के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों के व्यवहार को सबसे बेहतर समझते हैं।
सह-अस्तित्व की मिसाल
असम के कई इलाकों में मानव और वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती रहा है। हाथी, गैंडे और अन्य जंगली जानवर कई बार आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं।
हालांकि, मोहपारा जैसे गांवों की कहानी अलग है। यहां ग्रामीणों ने प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर रहने की परंपरा विकसित की है।
ग्रामीणों का कहना है कि वन्यजीवों को परेशान न किया जाए तो वे भी इंसानों को नुकसान नहीं पहुंचाते।
ग्रामीणों की भूमिका अहम
वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ भी मानते हैं कि स्थानीय समुदायों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जंगलों के आसपास रहने वाले लोग जानवरों की गतिविधियों को सबसे पहले समझ पाते हैं और कई बार संरक्षण कार्यों में मददगार साबित होते हैं।
ग्रामीणों की पारंपरिक समझ और अनुभव वन विभाग के लिए भी उपयोगी हो सकते हैं।
बदलते समय में बढ़ रही चुनौतियां
हालांकि, तेजी से बढ़ता विकास, सड़क निर्माण और मानव गतिविधियों का विस्तार वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है।
ऐसे में कई क्षेत्रों में इंसानों और जानवरों के बीच टकराव की स्थिति बन जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।