फॉसिल फ्यूल का विकल्प बनेगी भूतापीय ऊर्जा? खोज से जगी नई उम्मीद
भूतापीय ऊर्जा से बदलेगा भविष्य
ईटानगर : दुनिया में स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा स्रोतों की जरूरत लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के बीच भूतापीय ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आ रही है। धरती के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी का इस्तेमाल कर बिजली और गर्मी पैदा की जा सकती है। इसी क्षमता को तलाशने और उपयोग में लाने की दिशा में वैज्ञानिकों तथा ऊर्जा विशेषज्ञों का ध्यान बढ़ रहा है।
भूतापीय ऊर्जा का आधार धरती के भीतर मौजूद ताप है। जमीन के नीचे कई स्थानों पर चट्टानों और भूगर्भीय संरचनाओं में अत्यधिक गर्मी मौजूद रहती है। कुछ क्षेत्रों में यह गर्मी प्राकृतिक रूप से गर्म पानी और भाप के रूप में सतह के करीब पहुंचती है। इसी भाप या गर्म पानी का इस्तेमाल टर्बाइन चलाकर बिजली उत्पादन में किया जा सकता है।
परंपरागत भूतापीय बिजली संयंत्रों में गर्म पानी या भाप को भूमिगत स्रोत से निकाला जाता है। भाप टर्बाइन को घुमाती है और टर्बाइन जनरेटर के जरिए बिजली पैदा करता है। इसके बाद पानी को दोबारा जमीन के भीतर भेजने की व्यवस्था भी की जा सकती है। इससे ऊर्जा स्रोत का अपेक्षाकृत टिकाऊ तरीके से इस्तेमाल संभव होता है।
भूतापीय ऊर्जा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मौसम पर सौर और पवन ऊर्जा की तरह सीधे निर्भर नहीं रहती। जहां पर्याप्त भूगर्भीय गर्मी उपलब्ध हो, वहां लगातार ऊर्जा उत्पादन की संभावना रहती है। यही वजह है कि इसे विश्वसनीय और स्थिर स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों में गिना जाता है।
हालांकि भूतापीय क्षमता हर जगह समान नहीं होती। किसी क्षेत्र में परियोजना शुरू करने से पहले यह पता लगाना जरूरी होता है कि जमीन के नीचे कितना ताप मौजूद है, जलाशय की स्थिति क्या है और वहां से ऊर्जा निकालना तकनीकी तथा आर्थिक रूप से कितना संभव है। इसके लिए भूगर्भीय सर्वेक्षण, ड्रिलिंग और तापमान संबंधी जांच की जाती है।
भूतापीय ऊर्जा की खोज में शुरुआती लागत भी काफी अधिक हो सकती है। गहरे कुएं खोदने और भूमिगत संरचनाओं की जांच के लिए विशेष तकनीक और उपकरणों की जरूरत पड़ती है। यदि अपेक्षित ताप या जलाशय नहीं मिलता तो परियोजना की लागत बढ़ सकती है। इसलिए किसी क्षेत्र की क्षमता का सटीक आकलन बेहद महत्वपूर्ण है।
नई तकनीकों के विकास के साथ भूतापीय ऊर्जा के दायरे को बढ़ाने की कोशिश भी हो रही है। कुछ परियोजनाओं में ऐसी चट्टानों से ऊर्जा निकालने पर काम हो रहा है जहां प्राकृतिक रूप से पर्याप्त गर्म पानी उपलब्ध नहीं है। इसे उन्नत या संवर्धित भूतापीय प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है।
स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में भूतापीय क्षमता की खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कम कार्बन वाली बिजली उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है। सौर और पवन ऊर्जा के साथ इसे मिलाकर ऊर्जा प्रणाली में विविधता बढ़ाई जा सकती है। इससे किसी एक स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
भारत के संदर्भ में भी भूतापीय ऊर्जा की संभावनाएं मौजूद मानी जाती हैं। देश के कुछ हिस्सों में गर्म जलस्रोत और भूगर्भीय गतिविधियां इस दिशा में संभावनाएं दिखाती हैं। हिमालयी क्षेत्र के अलावा कुछ अन्य भूगर्भीय क्षेत्रों में भी भूतापीय संसाधनों का अध्ययन किया गया है।
भूतापीय ऊर्जा केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल सीधे गर्म पानी उपलब्ध कराने, औद्योगिक प्रक्रियाओं और कुछ क्षेत्रों में हीटिंग के लिए भी किया जा सकता है। इससे ऊर्जा की बचत और जीवाश्म ईंधन की खपत कम करने में सहायता मिल सकती है।
फिलहाल भूतापीय क्षमता की खोज स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य को लेकर नई संभावनाएं पैदा कर रही है। तकनीकी विकास, सटीक भूगर्भीय अध्ययन और निवेश के साथ यह ऊर्जा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। धरती की गहराई में मौजूद गर्मी को उपयोगी ऊर्जा में बदलने की कोशिश आने वाले वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है।