अमरावती। आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों (BC) को 34 प्रतिशत आरक्षण देने के मुद्दे पर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। शुक्रवार को वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के नेताओं ने मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और उनकी सरकार पर पिछड़े वर्गों के साथ वादाखिलाफी करने का आरोप लगाया। पार्टी नेताओं ने कहा कि चुनाव के दौरान पिछड़े वर्गों को 34 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया गया था, लेकिन सरकार इसे लागू करने के लिए आवश्यक कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने में विफल रही।पूर्व मंत्री चेलुबोयिना वेणुगोपाला कृष्णा और धर्मना प्रसाद राव ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को आरक्षण से संबंधित कानूनी सीमाओं की जानकारी पहले से थी। इसके बावजूद चुनावी घोषणापत्र में पिछड़े वर्गों को 34 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया गया। नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार ने इस वादे को पूरा करने के लिए जरूरी कानूनी ढांचा तैयार नहीं किया।YSRCP नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इससे राज्य सरकार की तैयारियों में कमियां सामने आई हैं। हालांकि, उपलब्ध विवरण में अदालत के आदेश की तारीख, मामला संख्या और उसके विस्तृत निर्देशों का उल्लेख नहीं है।
34 प्रतिशत BC आरक्षण को लेकर सरकार पर निशाना
वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों को 34 प्रतिशत आरक्षण देना राज्य सरकार के चुनावी वादों में शामिल था। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता में आने के बाद सरकार इस वादे को पूरा करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठा सकी।पूर्व मंत्री चेलुबोयिना वेणुगोपाला कृष्णा ने कहा कि आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर केवल घोषणा करना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए कानूनी और संवैधानिक आवश्यकताओं का पालन करना भी जरूरी है।उनका आरोप है कि सरकार ने पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने का भरोसा तो दिलाया, लेकिन इसे कानूनी रूप से सुरक्षित करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी नहीं कीं।YSRCP नेताओं ने इस स्थिति को पिछड़े वर्गों के हितों से जुड़ा गंभीर मामला बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री से चुनावी वादे को लेकर जवाबदेही की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
पूर्व मंत्री धर्मना प्रसाद राव और चेलुबोयिना वेणुगोपाला कृष्णा ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए राज्य सरकार की तैयारियों पर सवाल उठाए।उन्होंने दावा किया कि अदालत के फैसले से स्पष्ट होता है कि सरकार आरक्षण के लिए आवश्यक कानूनी ढांचा तैयार करने में सफल नहीं रही।स्थानीय निकायों में आरक्षण का निर्धारण संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक दिशानिर्देशों के अधीन होता है। ऐसे मामलों में राज्य सरकारों को लागू कानूनी आवश्यकताओं का पालन करना होता है।हालांकि, YSRCP नेताओं की ओर से की गई सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या को अदालत के आदेश का पूर्ण विवरण नहीं माना जा सकता। फैसले की वास्तविक सीमा और उसके प्रभाव का आकलन आधिकारिक आदेश के आधार पर ही किया जा सकता है।
आरक्षण की कानूनी सीमा बनी विवाद का केंद्र
आंध्र प्रदेश सरकार ने अगस्त 2026 में स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों के लिए 34 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित आदेश जारी किए थे। लेकिन 1 अक्टूबर को आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इन आदेशों को रद्द कर दिया।अदालत ने पाया कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों के लिए कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की निर्धारित सीमा से अधिक हो रहा था। अदालत ने आरक्षण के प्रतिशत को उचित ठहराने के लिए आवश्यक अनुभवजन्य आंकड़ों और कानूनी शर्तों की पर्याप्त पूर्ति नहीं होने का भी उल्लेख किया।इसके बाद राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शुक्रवार, 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
जानबूझकर समय बर्बाद करने का आरोप
पूर्व मंत्री वेणुगोपाला कृष्णा ने आरोप लगाया कि सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण सुरक्षित करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के बजाय समय बर्बाद किया।उन्होंने कहा कि सरकार को आरक्षण संबंधी संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक सीमाओं की जानकारी थी। इसके बावजूद ऐसी व्यवस्था तैयार नहीं की गई, जो अदालत की कसौटी पर खरी उतर सके।YSRCP नेताओं के अनुसार, स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है। उन्होंने सवाल उठाया कि चुनावी वादे को पूरा करने के लिए सरकार ने पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की।
प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह का भी किया जिक्र
वेणुगोपाला कृष्णा ने केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार में चंद्रबाबू नायडू की भूमिका पर भी सवाल उठाए।उन्होंने कहा कि तेलुगु देशम पार्टी केंद्र में NDA की महत्वपूर्ण सहयोगी है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री ने पिछड़े वर्गों के आरक्षण का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के सामने मजबूती से क्यों नहीं उठाया?YSRCP नेता ने सवाल किया कि केंद्र सरकार में सहयोगी होने के बावजूद राज्य सरकार आरक्षण के लिए आवश्यक संवैधानिक समाधान हासिल करने में क्यों सफल नहीं हुई।
चंद्रबाबू नायडू सरकार ने भी रखा था अपना पक्ष
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने पहले कहा था कि उनकी सरकार पिछड़े वर्गों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण के लिए प्रतिबद्ध है।हाईकोर्ट के फैसले के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की थी। उनका कहना था कि सरकार ने पिछड़े वर्गों के लिए 34 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने का प्रयास किया है और इस मुद्दे पर पीछे नहीं हटेगी।राज्य सरकार ने अदालत में अपने पक्ष में आंकड़े और सर्वेक्षण संबंधी सामग्री भी प्रस्तुत की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को हाईकोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया।
स्थानीय निकाय चुनावों से पहले बढ़ा राजनीतिक विवाद
आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनावों से पहले पिछड़े वर्गों के आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।YSRCP नेताओं का कहना है कि सरकार को केवल घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय आरक्षण की कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए थी। पार्टी ने पिछड़े वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर भी सवाल उठाए हैं।वहीं, राज्य सरकार का पक्ष है कि उसने आरक्षण बहाल करने का प्रयास किया और अदालत में भी अपने फैसले का बचाव किया।सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल 34 प्रतिशत आरक्षण से संबंधित सरकारी आदेशों को राहत नहीं मिली है। ऐसे में आगे की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।शुक्रवार को YSRCP नेताओं ने मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर चुनावी वादा पूरा नहीं करने का आरोप लगाते हुए जवाबदेही की मांग की। हालांकि, जानबूझकर देरी करने और पिछड़े वर्गों के साथ धोखा करने के आरोप विपक्षी नेताओं के हैं, अदालत के स्थापित निष्कर्ष नहीं।
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