ओंगोल: ज़िला कलेक्टर पी. राजा बाबू ने भोपाल में 'काउंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च - एडवांस्ड मैटेरियल्स एंड प्रोसेसेस रिसर्च इंस्टीट्यूट' (CSIR AMPRI) के वैज्ञानिकों से कहा है कि वे चिमाकुर्थी से निकलने वाले ग्रेनाइट कचरे पर रिसर्च करें ताकि इसे टिकाऊ तरीके से दोबारा इस्तेमाल किया जा सके।

कलेक्टर ने सोमवार शाम ओंगोल में अपने कैंप ऑफिस से CSIR AMPRI के डायरेक्टर डॉ. थल्लाडा भास्कर के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस की।

वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान राजा बाबू ने कहा कि चिमाकुर्थी के आस-पास ग्रेनाइट खदानें, पत्थर की खदानें और पॉलिशिंग यूनिट्स लगभग चार दशकों से चल रही हैं और उनसे निकलने वाला कचरा एक बड़ी समस्या बन गया है।

उन्होंने बताया कि पॉलिशिंग के दौरान 'ग्रेनाइट स्लरी' नाम का गीला कचरा बड़ी मात्रा में सफ़ेद तरल के रूप में निकलता है। पत्थर और दूसरे ठोस कचरे के ढेर लग जाते हैं। आस-पास की ज़मीन कचरे के ढेर में बदल गई है और इस्तेमाल के लायक नहीं रही।

उन्होंने कहा कि सूखी स्लरी से उड़ने वाली धूल और प्रदूषित पानी स्थानीय पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

उन्होंने डायरेक्टर और वैज्ञानिकों की टीम से खदानों और पॉलिशिंग यूनिट्स से निकलने वाली स्लरी और पत्थर के कचरे का अध्ययन करने का अनुरोध किया। उन्होंने उनसे एक रिपोर्ट और गाइडलाइंस देने को कहा कि कैसे इस कचरे को ऐसी निर्माण सामग्री में बदला जा सकता है जिससे पर्यावरण को नुकसान न हो। उन्होंने आगे कहा कि रिसर्च पूरी होने के बाद ज़िला प्रशासन वैज्ञानिकों के सुझावों के आधार पर कचरा प्रबंधन के उपाय अपनाएगा।

इस बैठक में माइंस एंड जियोलॉजी के डिप्टी डायरेक्टर रामचंद्र, APIIC के ज़ोनल मैनेजर मदन मोहन और ज़िला उद्योग अधिकारी श्रीनिवास राव शामिल हुए।

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