विशाखापत्तनम: चाहे इसे ‘बोम्मई गोलु’, ‘गोलु’, ‘बोम्माला कोलुवु’ या ‘बोम्बे हब्बा’ कहा जाए, नवरात्रि के दौरान कई घरों में गुड़ियों, देवी-देवताओं की मूर्तियों, मिट्टी की कलाकृतियों और उनसे जुड़ी पौराणिक कथाओं को खास तरीके से सजाया जाता है।
हर साल, अलग-अलग तरह की छोटी मूर्तियां, मिट्टी की प्रतिमाएं, लकड़ी के शिल्प और रंग-बिरंगी गुड़िया—जिनमें से कुछ परिवार के बुजुर्गों से विरासत में मिली होती हैं, तो कुछ नई जोड़ी जाती हैं—उन्हें एक खास थीम के अनुसार सजाया जाता है।
स्टोर रूम या अलमारियों से बक्से और थैले निकाले जाते हैं। फिर इन मूर्तियों को बाहर निकालकर साफ किया जाता है और रेशमी साड़ियों या सफेद धोतियों से सजे ‘पडियों’ (शेल्फ) पर बहुत सावधानी से रखा जाता है। हर थीम के लिए शेल्फ पर एक तय जगह होती है।
गुड़ियों को सजाने में कई दिन लग जाते हैं। मूर्तियों को सावधानी से खोलना, उन पर जमी धूल साफ करना, कुछ को धूप दिखाना, तो कुछ पर नया रंग-रोगन करना—इस काम में काफी मेहनत लगती है, जिसे परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूरा करते हैं।
‘बोम्माला कोलुवु’ की सजावट में कई चीजें शामिल होती हैं, जैसे—‘मरपाची’ (पारंपरिक गुड़िया), शादी का सेट, ‘दशावतार’, नौ देवियां (नवदुर्गा), ध्यान मुद्रा में बैठे ऋषि-मुनि, भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी। इसके अलावा, ‘सेट्टी-सेट्टम्मा’ (व्यापारी दंपति) और उनके सामने छोटे-छोटे बर्तनों में रखी रोजमर्रा की चीजें, साथ ही ग्रामीण परिवेश (जिसमें एक छोटा तालाब या ‘कोनेरु’ भी होता है) इस सजावट का अहम हिस्सा होते हैं।
एक बार जब शेल्फ (पडियां) सज जाती हैं, तो ‘नैवेद्य’ (भोग) के लिए मेन्यू तय किया जाता है। घर आने वाली महिलाओं को देने के लिए पारंपरिक ‘ताम्बूलम’ (भेंट) और रिटर्न गिफ्ट तैयार किए जाते हैं। इस त्योहार के दौरान एक-दूसरे के घर जाकर इन सजावटों को देखना, जिसे ‘गोलु-हॉपिंग’ कहा जाता है, एक बहुत ही लोकप्रिय परंपरा बन गई है।
तमिल समुदाय से जुड़ीं सी.के. राजा लक्ष्मी बताती हैं, “हम हमेशा ‘गोलु-हॉपिंग’ का बेसब्री से इंतजार करते हैं। हर घर में अलग-अलग थीम देखने को मिलती है। दशकों पहले, यह त्योहार रिश्तेदारों और चचेरे भाई-बहनों के साथ समय बिताने का सबसे अच्छा मौका होता था, जब कोई स्क्रीन (मोबाइल या टीवी) नहीं हुआ करती थी।” पिछले 20 सालों से, जाने-माने त्वचा विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट) गंडिकोटा रघुराम राव और उनकी पत्नी जी. शांति अपने घर पर 'बोम्माला कोलुवु' (गुड़ियों और मूर्तियों की प्रदर्शनी) लगाने की परंपरा निभाते आ रहे हैं। नौरोजी रोड पर स्थित उनके घर में सीढ़ियों पर मिट्टी की मूर्तियों, गुड़ियों, लकड़ी और सिरेमिक की हस्तकलाओं की एक बड़ी श्रृंखला सजी होती है, जो नवरात्रि के दौरान आने वाले लोगों के लिए सबसे पसंदीदा जगह बन जाती है।
वे बताते हैं, "ये गुड़िया और मूर्तियां देश के अलग-अलग हिस्सों से लाई गई हैं। इस 'कोलुवु' संग्रह में 1,000 से भी ज़्यादा मूर्तियां शामिल हैं। इन मूर्तियों के ज़रिए पौराणिक कथाओं और अन्य कहानियों को दर्शाने के साथ-साथ, हमारा मकसद नई पीढ़ी के बीच अपनी परंपरा और संस्कृति को बढ़ावा देना भी है।"
कई दशक पहले, ज़्यादातर घरों में दशहरा के दौरान 'बोम्माला कोलुवु' लगाना एक अहम हिस्सा हुआ करता था। लेकिन अब हालात बदल गए हैं; आज शहरों में बहुत कम लोग ही इस पुरानी परंपरा को निभा रहे हैं।