Lifestyle लाइफ स्टाइल :आए दिन टीवी, अखबार और सोशल मीडिया पर सड़क दुर्घटनाओं की खबरें सामने आती रहती हैं। इन घटनाओं में एक बात अक्सर देखने को मिलती है कि मौके पर मौजूद भीड़ होने के बावजूद घायलों की मदद के लिए बहुत कम लोग आगे आते हैं। कई बार लोग मदद करने का मन बनाते हैं, लेकिन किसी न किसी कारण से पीछे हट जाते हैं। इस व्यवहार को मनोविज्ञान में ‘बायस्टैंडर इफेक्ट’ कहा जाता है।
साइकोलॉजिस्ट राजेश पाण्डेय के अनुसार, यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में मौजूद लोग यह सोचते हैं कि कोई और व्यक्ति मदद कर देगा। इसी कारण जिम्मेदारी का बंटवारा हो जाता है और कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से आगे आने की पहल नहीं करता।
विशेषज्ञों का कहना है कि भीड़ जितनी अधिक होती है, मदद मिलने की संभावना उतनी ही कम हो जाती है। इसका मुख्य कारण “डिफ्यूजन ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी” यानी जिम्मेदारी का बंटना होता है। लोग यह मान लेते हैं कि वहां मौजूद अन्य लोग पहले कदम उठाएंगे, इसलिए वे खुद पीछे रह जाते हैं।
राजेश पाण्डेय बताते हैं कि इस स्थिति में लोग कई तरह की मानसिक उलझनों का सामना करते हैं। कुछ लोग यह सोचते हैं कि अगर उन्होंने गलत तरीके से मदद की तो स्थिति और बिगड़ सकती है। कुछ को यह डर होता है कि कहीं वे किसी कानूनी या पुलिस जांच में न फंस जाएं। वहीं कई लोग सामाजिक दबाव या शर्मिंदगी के कारण भी आगे नहीं आते।
एक और महत्वपूर्ण कारण “इवैल्युएशन एप्रिहेंशन” यानी दूसरों द्वारा आंका जाने का डर भी होता है। लोग यह सोचते हैं कि अगर उन्होंने कुछ गलत किया तो आसपास मौजूद लोग उन्हें जज करेंगे। इसी कारण वे निष्क्रिय बने रहते हैं।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर वीडियो बनाने और घटना को रिकॉर्ड करने की प्रवृत्ति ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। लोग पहले मदद करने के बजाय वीडियो बनाने या घटना को शेयर करने पर ज्यादा ध्यान देते हैं।
हालांकि सरकार और प्रशासन लगातार लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे हैं कि सड़क दुर्घटना या आपात स्थिति में तुरंत मदद करना बेहद जरूरी है। कई राज्यों में “गुड समैरिटन कानून” भी लागू किया गया है, जिसमें मदद करने वाले व्यक्ति को कानूनी सुरक्षा दी जाती है।
फिर भी समाज में इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है। विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों को यह समझना होगा कि हर व्यक्ति की छोटी सी मदद किसी की जान बचा सकती है। अगर हर व्यक्ति यह जिम्मेदारी खुद ले, तो बायस्टैंडर इफेक्ट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।