नई दिल्ली। बच्चों की खाने की आदतों को लेकर माता-पिता के मन में कई तरह के सवाल रहते हैं। खासकर जब बच्चा मिर्च-मसाले वाला खाना खाने से मना करता है, तो अक्सर परिवार में यह चर्चा शुरू हो जाती है कि शायद इसकी वजह प्रेगनेंसी के दौरान मां का खानपान रहा होगा। कई लोगों का मानना है कि अगर गर्भावस्था के दौरान मां ने मिर्च-मसाला कम खाया हो, तो आगे चलकर बच्चा भी तीखा खाना पसंद नहीं करता। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह संबंध इतना सीधा नहीं है।
बच्चों की डॉक्टर माधवी भारद्वाज के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान मां के खानपान का बच्चे के शुरुआती स्वाद अनुभव पर कुछ असर जरूर पड़ सकता है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि बच्चा आगे चलकर मिर्च खाएगा या नहीं। बच्चे की पसंद कई अलग-अलग चीजों से बनती है, जिनमें उम्र, स्वाद के प्रति संवेदनशीलता, घर का खाना, बार-बार किसी खाद्य पदार्थ से परिचय और बच्चे की व्यक्तिगत पसंद शामिल होती है।
गर्भावस्था के दौरान मां के भोजन के कुछ फ्लेवर एम्नियोटिक फ्लूड के जरिए भ्रूण तक पहुंच सकते हैं। इसी तरह जन्म के बाद स्तनपान के दौरान भी मां के खानपान के कुछ स्वाद ब्रेस्ट मिल्क में महसूस हो सकते हैं। इससे बच्चे को अलग-अलग स्वादों से शुरुआती परिचय मिल सकता है। हालांकि इसका यह मतलब नहीं है कि मां ने अगर गर्भावस्था के दौरान ज्यादा मिर्च खाई तो बच्चा भी जरूर तीखा खाना पसंद करेगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक, छोटे बच्चों को मिर्च अधिक तेज लगना सामान्य बात है। मिर्च में कैप्साइसिन नाम का तत्व होता है, जो मुंह में जलन और तीखेपन का एहसास पैदा करता है। बच्चों की स्वादेंद्रियां काफी संवेदनशील होती हैं, इसलिए जो मिर्च किसी वयस्क को सामान्य लग सकती है, वही बच्चे को बहुत ज्यादा तीखी महसूस हो सकती है।
यही कारण है कि कई बच्चे कम उम्र में मिर्च वाला भोजन खाने से तुरंत मना कर देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि इसे जिद या खराब आदत मानकर बच्चे को जबरदस्ती तीखा खाना खिलाना सही तरीका नहीं है। बच्चे की स्वाद पसंद समय के साथ बदल सकती है और वह धीरे-धीरे मसालेदार भोजन का आदी हो सकता है।
बच्चों को नए स्वाद से परिचित कराने के लिए धीरे-धीरे शुरुआत करना बेहतर माना जाता है। खाने में एकदम से ज्यादा मिर्च डालने की बजाय बहुत हल्के मसाले से शुरुआत की जा सकती है। दाल, सब्जी, खिचड़ी या अन्य घरेलू भोजन में कम मात्रा में मसाला शामिल करके बच्चे को नए स्वाद का अनुभव कराया जा सकता है।
इस दौरान यह भी जरूरी है कि माता-पिता बच्चे की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें। अगर बच्चा किसी भोजन को खाने के बाद बेचैनी महसूस करता है, मुंह में ज्यादा जलन होती है या वह उस भोजन को पूरी तरह नकार देता है, तो कुछ समय बाद दोबारा बहुत कम मात्रा में उसे दिया जा सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पौष्टिक भोजन के लिए मिर्च जरूरी नहीं है। अगर बच्चा मिर्च नहीं खाता, लेकिन उसे पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन, मिनरल, कार्बोहाइड्रेट और स्वस्थ वसा मिल रही है, तो चिंता की जरूरत नहीं है। दाल, रोटी, चावल, हरी सब्जियां, फल, दूध, दही, अंडा और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों से भी संतुलित आहार दिया जा सकता है।
माता-पिता को यह भी समझना चाहिए कि मसाले का मतलब केवल लाल या हरी मिर्च नहीं होता। हल्दी, जीरा, धनिया, दालचीनी, इलायची और अन्य हल्के मसालों के जरिए भी बच्चे के भोजन में स्वाद जोड़ा जा सकता है। इससे बच्चा अलग-अलग भारतीय स्वादों से परिचित हो सकता है, बिना ज्यादा तीखापन महसूस किए।
जबरदस्ती खिलाना इस मामले में उल्टा असर डाल सकता है। अगर बच्चे को बार-बार उसकी इच्छा के खिलाफ मिर्च वाला खाना दिया जाए तो उसके मन में भोजन को लेकर डर या नकारात्मक भावना पैदा हो सकती है। ऐसे में वह केवल मिर्च ही नहीं, बल्कि दूसरे नए खाद्य पदार्थों से भी दूरी बनाने लग सकता है।
डॉक्टर माधवी भारद्वाज के मुताबिक, बच्चे की खाने की आदत विकसित करने में धैर्य बेहद जरूरी है। परिवार में अगर सभी लोग एक ही तरह का भोजन खाते हैं, तो बच्चे को भी धीरे-धीरे वही खाना सीखने का मौका मिलता है। लेकिन उसकी उम्र और सहनशीलता के हिसाब से मिर्च की मात्रा कम रखी जा सकती है।
सिर्फ मिर्च न खाना आमतौर पर किसी बीमारी का संकेत नहीं है। हालांकि अगर बच्चा बहुत सीमित चीजें ही खाता है, लगातार नए भोजन से इंकार करता है, वजन या लंबाई उम्र के अनुसार नहीं बढ़ रही है, खाना निगलने में परेशानी होती है या बार-बार उल्टी जैसी समस्या होती है, तो बच्चों के डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर होता है।
कुल मिलाकर, बच्चे का मिर्च न खाना सीधे तौर पर प्रेगनेंसी के दौरान मां के खानपान से नहीं जोड़ा जा सकता। गर्भावस्था बच्चे के शुरुआती स्वाद अनुभव को जरूर प्रभावित कर सकती है, लेकिन आगे की पसंद परिवार के खानपान, बच्चे की उम्र और उसके व्यक्तिगत अनुभवों से ज्यादा तय होती है। इसलिए माता-पिता को बच्चे पर दबाव डालने के बजाय धीरे-धीरे नए स्वादों से परिचित कराना चाहिए और पौष्टिक भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए।