नई दिल्ली। दिवाली का त्योहार आते ही घरों में मिठाइयों और पारंपरिक पकवानों की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भारत के अलग-अलग राज्यों में इस पर्व को मनाने की अपनी विशेष परंपराएं हैं। कहीं खील-बताशे और लड्डू बनाए जाते हैं, तो कहीं शक्करपारा, चकली और करंजी जैसे पकवान तैयार होते हैं। इन्हीं पारंपरिक मिठाइयों में एक खास नाम अनरसा का भी है। चावल, गुड़ और घी से बनने वाली यह मिठाई बिहार और महाराष्ट्र की खाद्य संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
अनरसा की सबसे बड़ी खासियत इसका स्वाद और बनाने की पारंपरिक विधि है। बाहर से कुरकुरी और अंदर से मुलायम यह मिठाई कई पीढ़ियों से त्योहारों की मिठास बढ़ा रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अनरसा की शुरुआत कहां से हुई और इसका दिवाली से क्या संबंध है? इसका इतिहास जितना दिलचस्प है, उतनी ही खास इसकी सांस्कृतिक पहचान भी है।
कहां से हुई अनरसा मिठाई की शुरुआत?
अनरसा भारत की पुरानी पारंपरिक मिठाइयों में गिनी जाती है। हालांकि, इसकी उत्पत्ति कब और किस स्थान पर हुई, इसका कोई सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।कुछ खाद्य परंपराओं में इसकी शुरुआत उत्तर भारत से जुड़ी बताई जाती है, जबकि अन्य विवरण इसे प्राचीन चावल आधारित दक्षिण भारतीय मिठाइयों से जोड़ते हैं।आज अनरसा विशेष रूप से बिहार और महाराष्ट्र में लोकप्रिय है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल की खाद्य परंपराओं में भी इससे मिलती-जुलती मिठाइयां बनाई जाती हैं।अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी सामग्री, आकार और बनाने के तरीके में अंतर मिलता है।
बिहार में अनरसा का खास महत्व
बिहार में अनरसा केवल दिवाली तक सीमित नहीं है। इसे तीज, विवाह समारोह और अन्य शुभ अवसरों पर भी तैयार किया जाता है।विशेष रूप से गया और जहानाबाद क्षेत्रों में यह काफी लोकप्रिय है। गया की पारंपरिक मिठाइयों में अनरसा का महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है।स्थानीय परंपराओं के अनुसार, पहले शादी-ब्याह में रिश्तेदारों को अनरसा और बताशे भेजने का प्रचलन था।गया के तीर्थ पुरोहित परिवारों में भी अनरसा का धार्मिक और सामाजिक महत्व रहा है। कुछ परिवारों में शुभ अवसरों पर अनरसा की टोकरियां रखने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।यह मिठाई बिहार की पारंपरिक खाद्य संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।
महाराष्ट्र में दिवाली के फराल का हिस्सा
महाराष्ट्र में दिवाली के अवसर पर विशेष पारंपरिक पकवान तैयार किए जाते हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से 'फराल' कहा जाता है।इसमें चकली, चिवड़ा, करंजी, शंकरपाळे, लड्डू और अनरसा जैसी मिठाइयां शामिल होती हैं।महाराष्ट्र के कई परिवारों में अनरसा लक्ष्मी पूजन के नैवेद्य के रूप में बनाया जाता है।विशेष बात यह है कि इसे तैयार करने की प्रक्रिया दिवाली से कई दिन पहले शुरू हो जाती है।परंपरागत रूप से परिवार की महिलाएं मिलकर त्योहार के पकवान बनाती थीं। इस दौरान अनरसा तैयार करना केवल रसोई का काम नहीं, बल्कि पारिवारिक परंपरा का हिस्सा हुआ करता था।
अनरसा नाम के पीछे क्या है कहानी?
अनरसा नाम की उत्पत्ति को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं।एक प्रचलित व्याख्या के अनुसार, यह नाम 'अन्न' और 'रस' शब्दों से जुड़ा हो सकता है। अन्न का संबंध अनाज से है, जबकि रस स्वाद और सार का प्रतीक माना जाता है।चूंकि यह मिठाई मुख्य रूप से चावल से बनती है, इसलिए इसे अनाज आधारित पारंपरिक पकवान के रूप में देखा जाता है।हालांकि, इस शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषाई विशेषज्ञों में कोई एक निश्चित मत स्थापित नहीं है।अनरसा के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम भी इसकी व्यापक खाद्य परंपरा को दर्शाते हैं।
किन चीजों से बनती है अनरसा मिठाई?
अनरसा बनाने के लिए बहुत अधिक सामग्री की जरूरत नहीं होती।इसकी मुख्य सामग्री चावल, गुड़ या चीनी, घी और खसखस अथवा तिल हैं।महाराष्ट्र की कई पारंपरिक विधियों में खसखस का उपयोग किया जाता है, जबकि बिहार में तिल और अन्य सामग्री से भी इसे तैयार किया जाता है।
कुछ क्षेत्रों में खोया मिलाकर भी अनरसा बनाया जाता है।
बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार, स्थानीय अनरसा की एक विधि में चावल के पाउडर, चीनी, खोया और तिल का उपयोग किया जाता है।अनरसा बनाने में क्यों लगता है ज्यादा समय?अनरसा बनाने की प्रक्रिया सामान्य मिठाइयों से थोड़ी अलग है।इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले चावल को अच्छी तरह धोकर पानी में भिगोया जाता है।कई पारंपरिक विधियों में चावल को लगभग तीन से चार दिनों तक भिगोकर रखा जाता है। इस दौरान नियमित अंतराल पर पानी बदला जाता है।इसके बाद चावल का पानी निकालकर उसे हल्का सुखाया जाता है और बारीक पीस लिया जाता है।
फिर चावल के आटे में गुड़ या चीनी मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है।
कुछ विधियों में इस मिश्रण को भी कुछ समय तक रखा जाता है, ताकि उसकी बनावट अनरसा बनाने के अनुकूल हो जाए।इसके बाद छोटी लोइयां बनाकर उन्हें हल्का चपटा किया जाता है। ऊपर से खसखस या तिल लगाकर घी में धीमी आंच पर तला जाता है।धीमी आंच पर तलने से आता है खास स्वाद
अनरसा बनाने में सबसे महत्वपूर्ण बात सही तापमान बनाए रखना है।अगर घी बहुत ज्यादा गर्म हो, तो मिठाई बाहर से जल्दी पक सकती है और अंदर कच्ची रह सकती है।वहीं, बहुत कम तापमान पर तलने से अनरसा ज्यादा घी सोख सकता है।इसलिए पारंपरिक रूप से इसे नियंत्रित और धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है।अच्छी तरह बना अनरसा बाहर से हल्का कुरकुरा और अंदर से मुलायम होता है।इसकी मिठास गुड़ और चावल के विशेष मिश्रण से आती है।
दक्षिण भारत में भी मिलती है मिलती-जुलती मिठाई
अनरसा से मिलती-जुलती मिठाइयां दक्षिण और पूर्वी भारत में भी बनाई जाती हैं।तमिलनाडु में 'अधिरसम', आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में 'अरिसेलु' तथा ओडिशा में 'अरिसा पीठा' प्रसिद्ध हैं।इन मिठाइयों में भी चावल के आटे और गुड़ का उपयोग होता है।हालांकि, इनके आकार, स्वाद, सामग्री के अनुपात और तैयार करने की विधि में क्षेत्रीय अंतर देखने को मिलते हैं।इन समानताओं से यह पता चलता है कि चावल और गुड़ से बनने वाले पकवान भारत की कई प्राचीन खाद्य परंपराओं का हिस्सा रहे हैं।लेकिन केवल समानता के आधार पर इन्हें एक ही स्थान से उत्पन्न हुई मिठाई मानना उचित नहीं होगा।
पीढ़ियों से चली आ रही है अनरसा की परंपरा
अनरसा की खासियत सिर्फ इसके स्वाद में नहीं, बल्कि इससे जुड़ी पारिवारिक यादों में भी है।पहले घरों में दिवाली की तैयारियां कई दिन पहले शुरू हो जाती थीं। परिवार के सदस्य मिलकर मिठाइयां तैयार करते थे।बड़े-बुजुर्ग नई पीढ़ी को पकवान बनाने की बारीकियां सिखाते थे। इस तरह पारंपरिक व्यंजनों की जानकारी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही।आज बाजार में अनेक आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध हैं, फिर भी बिहार और महाराष्ट्र के कई परिवारों में अनरसा बनाने की परंपरा कायम है।
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