जिंदल नेचरक्योर इंस्टीटयूट के डेप्युटी चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ जी प्रकाश ने कहा कि हर साल 1 से 7 सितम्बर तक मनाये जाने वाले 'नेशनल न्यूट्रीशन वीक' का लक्ष्य स्वास्थ्य और बेहतर पोषण के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाना होता है। भारत की होने वाली कुल बीमारी का 15% बीमारी बच्चे और मां में कुपोषण होने से होती है। इसलिए बच्चों को अच्छी तरह से पोषण से युक्त रखने के लिए माँ को उचित पोषण प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। जीवन भर एक स्वस्थ, अच्छी तरह से संतुलित डाईट खाने से गर्भावस्था का परिणाम अच्छा होता है। बेहतर पोषण शरीर के स्वस्थ वजन को बनाए रखने में मदद करता है, सामान्य वृद्धि, विकास और सामान्य तरीके से उम्र बढ़ने में सहयोग करता है, और क्रोनिक बीमारी के खतरे को कम करता है, जिससे सम्पूर्ण स्वास्थ्य अच्छा रहता है। स्वस्थ रहने के लिए संतुलित डाइट का सेवन हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इसके लिए पोषण के बारे में सही जानकारी होना जरूरी है। नेशनल न्यूट्रीशन वीक विभिन्न समुदायों में विभिन्न डाईट और पोषण से संबंधित समस्याओं को समझने, डाईट और पोषण से संबंधित देश की स्थिति की निगरानी करने, राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रमों की योजना और कार्यान्वयन के लिए ऑपरेशनल रिसर्च करने और उपयुक्त तकनीकों को अपनाने पर केंद्रित होता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य बेहतरीन रिसर्च के माध्यम से पोषण संबंधी समस्याओं को नियंत्रित करना और उन्हें कम करना शामिल होता है।
उजाला सिग्नस ग्रुप ऑफ़ हॉस्पिटल्स के डायरेक्टर तथा फाउंडर डॉ शुचिन बजाज ने कहा कि भारत में अंडरन्यूट्रिशन (अल्पपोषण), ओवरन्यूट्रिशन (अतिपोषण) या माइक्रो-न्यूट्रिएंट (सूक्ष्म पोषक तत्वों) की कमी के रूप में नॉन- न्यूट्रिशियस (गैर-पौष्टिक), नॉन-बैलेंस्ड (गैर-संतुलित) खानपान की समस्या है। बाजारों में पौष्टिक भोजन की उपलब्धता समाज के सभी तबके को सही चुनने के लिए प्रेरित करने में समान रूप से महत्वपूर्ण होती है। कोरोनावायरस महामारी के दौरान हम सभी के लिए विशेष रूप से महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए संतुलित और पौष्टिक भोजन को प्रोत्साहित करना और प्रदान करना समय की जरुरत बन गयी है क्योंकि ये दो ऐसे वर्ग हैं, जो हमारे समाज की नींव रखते हैं। पोषण अभियान के तहत आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से उपलब्ध कराए गए पोषण को पूरे देश में एक जन आंदोलन में बदला जा रहा है। 2017 में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 190.7 मिलियन कुपोषित लोग है और भारत में पांच साल से कम उम्र के 38.4% बच्चे स्टंटेड हैं और इन गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि विभिन्न पोषण वाली योजनाओं या हस्तक्षेपों का लाभ समाज के हर तबके को मिले ताकि कमजोर आबादी पोषण से सम्बंधित समस्याओं से निजात पा सके और देश के समग्र विकास में योगदान दे सके। सामुदायिक संस्थाओं और सर्विस प्रोवाइडर को पर्याप्त रूप से पोषण की कमी के प्रति जवाबदेह होना चाहिए ताकि समाज में कुपोषण की शीघ्र पहचान और समाधान किया जा सके।