IVF इलाज हुआ महंगा, सरकारी रिपोर्ट में खुलासा – गरीब दंपती क्यों हो रहे हैं दूर
Lifestyle,लाइफस्टाइल : इंडिया में इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) यानी कृत्रिम गर्भाधान इलाज का खर्च बढ़ता जा रहा है, और सरकारी रिपोर्ट में इसे लेकर गंभीर खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, IVF का औसत खर्च भारतीय दंपतियों के लिए भारी आर्थिक बोझ बन गया है, जिससे खासकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग इस इलाज से दूर हो रहे हैं।
सरकारी स्वास्थ्य मंत्रालय की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में IVF साइकिल की औसत लागत लगभग ₹1.5 लाख से ₹2.5 लाख तक पहुँच चुकी है। यह रकम अस्पताल, डॉक्स और मेडिकल टेस्ट्स सहित अलग-अलग खर्चों के जोड़ से बनती है। जबकि कुछ निजी क्लिनिक में यह लागत ₹4 लाख तक भी जा सकती है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि सरकारी अस्पतालों में IVF सेवाएँ सीमित हैं और अक्सर लंबी प्रतीक्षा सूची होती है। इसके विपरीत, निजी क्लिनिक में इलाज जल्दी हो जाता है, लेकिन उनका खर्च आम जनता के लिए बहुत बड़ा है। यही वजह है कि गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इस इलाज से दूरी बना रहे हैं।
एक सरकारी अधिकारी ने बताया, “IVF का खर्च केवल पैसों का सवाल नहीं है, बल्कि यह दंपतियों की मानसिक और भावनात्मक स्थिति को भी प्रभावित करता है। कई लोग इलाज शुरू भी नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें पता होता है कि कई साइकिल के बाद भी सफलता की कोई गारंटी नहीं है।”
सामाजिक शोधकर्ताओं का कहना है कि IVF के बढ़ते खर्च से केवल आर्थिक असमानता ही नहीं बढ़ रही, बल्कि सामाजिक असमानता भी गहरी हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जो लोग उच्च आय वर्ग में हैं, वे आसानी से IVF इलाज करवा सकते हैं और संतान सुख पा सकते हैं, जबकि गरीब दंपती इसे विकल्प के रूप में देख भी नहीं पाते।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, देश में हर साल IVF साइकिल के लिए दायर किए गए आवेदन में 70% से अधिक लोग निजी क्लिनिक में जाते हैं। सरकारी क्लिनिक में उपलब्ध सीमित जगह और लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग पैसे खर्च करके भी इलाज नहीं कर पाते।
एक मरीज ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, “हमने IVF के लिए कर्ज लेना पड़ा क्योंकि हमारे पास इतना पैसा नहीं था। इलाज महंगा होने के कारण मानसिक तनाव भी बढ़ गया और कई बार हमें साइकिल रद्द करनी पड़ी।”
सरकारी रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि IVF इलाज को और अधिक किफायती बनाने के लिए पॉलिसी स्तर पर कदम उठाने की ज़रूरत है। इसमें सरकारी अस्पतालों में IVF केंद्रों की संख्या बढ़ाना, सब्सिडी योजना लाना और निजी क्लिनिक में अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करना शामिल है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि IVF इलाज पर सब्सिडी देने से ना केवल गरीब दंपतियों को मदद मिलेगी, बल्कि देश में प्रजनन स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सुधार होगा। इसके साथ ही, यह महिलाओं और पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित करेगा।
रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अगर IVF खर्च में कमी नहीं की गई और किफायती विकल्प नहीं दिए गए, तो भविष्य में भारत में जनसंख्या असंतुलन और प्रजनन असमानता जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
इस खुलासे ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या भारत में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएं केवल अमीरों के लिए ही उपलब्ध हैं, या सभी वर्गों के लोगों के लिए समान रूप से इसे सुलभ बनाया जा सकता है।
सरकारी रिपोर्ट की सिफारिश है कि IVF इलाज को किफायती बनाने और गरीब दंपतियों तक पहुँचाने के लिए त्वरित कदम उठाए जाएँ। तभी ही लाखों भारतीय दंपतियों का सपना – माता-पिता बनने का सपना – साकार हो सकता है।