नवरात्र व्रत से वजन घटता है या आती है कमजोरी? जानें सेहत की सच्चाई
नवरात्र में कमजोरी को न करें नजरअंदाज
लाइफस्टाइल : नवरात्र में श्रद्धालु अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं। कोई एक समय भोजन करता है, तो कोई फलाहार अपनाता है। इस दौरान अक्सर माना जाता है कि व्रत रखने से वजन अपने आप घट जाएगा। दूसरी तरफ, कुछ लोग कमजोरी को व्रत का अनिवार्य हिस्सा समझते हैं। वास्तव में असर इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति कितना खाता-पीता है, भोजन में क्या शामिल करता है और उसकी स्वास्थ्य स्थिति कैसी है। धार्मिक व्रत और शोध में अपनाई जाने वाली इंटरमिटेंट फास्टिंग की पद्धतियां भी एक जैसी नहीं हैं।
मिथक: व्रत रखने से वजन जरूर घटता है
सच्चाई यह है कि केवल भोजन का समय बदलने से वजन घटने की गारंटी नहीं होती। यदि फलाहार के नाम पर अधिक मात्रा में तले आलू, पूड़ियां, मिठाइयां और मीठे पेय लिए जाएं, तो कुल कैलोरी जरूरत से ज्यादा हो सकती है। ऐसे में वजन कम होने के बजाय बढ़ भी सकता है। वजन प्रबंधन में भोजन की मात्रा, गुणवत्ता और शारीरिक गतिविधि की भूमिका रहती है। सीमित समय में खाने के कुछ अध्ययनों में वजन में मामूली कमी मिली है, लेकिन इन नतीजों को नौ दिन के हर तरह के धार्मिक व्रत पर लागू नहीं किया जा सकता।
मिथक: जल्दी घटा वजन मतलब चर्बी कम होना
कुछ दिनों में वजन घटता दिखाई दे तो जरूरी नहीं कि उतनी ही चर्बी कम हुई हो। भोजन और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बदलने से शरीर में पानी का संतुलन भी बदल सकता है। सामान्य खानपान शुरू होने पर वजन का कुछ हिस्सा वापस आ सकता है। इसलिए रोज वजन देखकर व्रत की सफलता तय करना सही तरीका नहीं है। लगातार संतुलित भोजन और नियमित गतिविधि से होने वाला बदलाव अधिक उपयोगी होता है। बहुत कम खाने को लंबे समय तक वजन नियंत्रित रखने का आसान रास्ता नहीं समझना चाहिए।
मिथक: कमजोरी आना सामान्य है, सहन करना चाहिए
हल्की भूख और गंभीर कमजोरी अलग स्थितियां हैं। चक्कर, सिरदर्द, मुंह सूखना, गहरा पीला पेशाब और पेशाब कम होना शरीर में पानी की कमी के संकेत हो सकते हैं। पर्याप्त भोजन न मिलना या कुछ लोगों में ब्लड शुगर गिरना भी परेशानी बढ़ा सकता है। लगातार चक्कर आने पर केवल आराम करके व्रत जारी रखना उचित नहीं है। व्रत रोककर तरल और भोजन लें तथा जरूरत के अनुसार चिकित्सा सहायता लें। बेहोशी, भ्रम या सांस लेने में परेशानी होने पर तत्काल इलाज जरूरी है।
मिथक: फलाहारी भोजन जितना चाहें खा सकते हैं
व्रत में स्वीकार्य होना और कम कैलोरी वाला होना अलग बातें हैं। मेवे, घी, मिठाइयां और तले व्यंजन अधिक मात्रा में लेने पर ऊर्जा का सेवन बढ़ा सकते हैं। भोजन में विविधता और मात्रा का संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अपनी परंपरा में अनुमति हो तो फल, सब्जियां, दही, दूध या पनीर जैसे विकल्पों को उचित मात्रा में शामिल किया जा सकता है। केवल आलू और साबूदाने पर निर्भर रहने के बजाय प्रोटीन तथा अन्य पोषक तत्वों का भी ध्यान रखें। संतुलित आहार में अलग-अलग खाद्य समूहों की भूमिका होती है। who.int
मिथक: केवल जूस पीना सबसे स्वस्थ विकल्प है
फलों का जूस पूरे फल का पूर्ण विकल्प नहीं है। पूरे फल में मौजूद फाइबर पेट भरने में मदद करता है। बार-बार बड़ी मात्रा में जूस पीने से शर्करा का सेवन बढ़ सकता है। इसलिए पानी की जगह पूरे दिन जूस पीते रहना उचित नहीं है। बिना अतिरिक्त चीनी वाला जूस भी सीमित मात्रा में लेना चाहिए। nhs.uk
मिथक: व्रत से शरीर के सभी विषैले पदार्थ निकल जाते हैं
‘डिटॉक्स’ के नाम पर लंबे समय तक भूखे रहने या केवल तरल लेने के दावों के पक्ष में मजबूत प्रमाण नहीं हैं। शरीर में लीवर और किडनी अपशिष्ट पदार्थों को संभालने का काम करते हैं। अनावश्यक कठोर प्रतिबंध उलटे पोषण और तरल की कमी पैदा कर सकते हैं। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएं, बच्चे, खाने से संबंधित विकार वाले लोग और डायबिटीज की दवा लेने वाले व्यक्ति कठोर उपवास से पहले डॉक्टर की सलाह लें। दवा की मात्रा स्वयं न बदलें। व्रत के दौरान अपनी शारीरिक जरूरतों और अस्वस्थता के संकेतों को समझना जरूरी है।