शराब कारोबार के समर्थन में उतरे लद्दाख के व्यापारी, निष्पक्ष नीति की मांग
लेह। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में शराब की बिक्री और आबकारी नीति को लेकर चल रहा विवाद लगातार चर्चा में बना हुआ है। इस बीच ऑल लद्दाख लिकर ट्रेडर्स एसोसिएशन (ALTOA) ने शराब के वैध कारोबार का बचाव करते हुए निष्पक्ष और पारदर्शी आबकारी नीति की मांग उठाई है। संगठन ने शराब कारोबार के खिलाफ चुनिंदा विरोध पर सवाल खड़े किए हैं। व्यापारियों का कहना है कि शराब से जुड़े व्यवसाय को केवल सामाजिक विरोध के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इससे जुड़े आर्थिक, कानूनी और रोजगार संबंधी पहलुओं पर भी विचार करना जरूरी है।लद्दाख में पिछले कुछ समय से शराब की दुकानों और बार के लाइसेंस को लेकर विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों ने विरोध दर्ज कराया है। खासकर महिला संगठनों ने शराब की उपलब्धता बढ़ने से समाज और युवाओं पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई है। दूसरी ओर, शराब कारोबार से जुड़े व्यापारियों का पक्ष है कि वैध लाइसेंस के तहत संचालित व्यवसायों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। ऐसे में शराबबंदी और कारोबार के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती प्रशासन के सामने खड़ी हो गई है।
ऑल लद्दाख लिकर ट्रेडर्स एसोसिएशन का कहना है कि शराब के कारोबार को लेकर होने वाली बहस में सभी पक्षों की बात सुनी जानी चाहिए। संगठन ने चुनिंदा विरोध पर सवाल उठाते हुए समान नियमों और निष्पक्ष व्यवहार की आवश्यकता पर जोर दिया है। हालांकि, संगठन के विस्तृत ताजा बयान और उसके पदाधिकारियों के शब्दशः कथन की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं हैदरअसल, लद्दाख प्रशासन ने जून 2026 में नई आबकारी नीति लागू करने की घोषणा की थी। इस नीति का उद्देश्य शराब कारोबार के नियमन में बदलाव, पारदर्शिता बढ़ाने और पर्यटन से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना बताया गया था। प्रस्तावित नीति के तहत शराब की खुदरा दुकानों की संख्या दो से बढ़ाकर 20 करने की व्यवस्था थी। हालांकि, स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों के विरोध के बाद प्रशासन ने अगस्त में नई नीति वापस ले ली और पुरानी आबकारी व्यवस्था बहाल कर दी।
लद्दाख प्रशासन ने 28 अक्टूबर को जारी आधिकारिक बयान में स्पष्ट किया कि वर्तमान में पूरे केंद्र शासित प्रदेश में केवल एक खुदरा शराब की दुकान संचालित है। प्रशासन के अनुसार, पुरानी आबकारी नीति के तहत लेह के वार्ड संख्या चार और छह में दो दुकानों की अनुमति थी। इनमें से वार्ड संख्या छह में 14 अक्टूबर को हुई नीलामी के बाद एक दुकान शुरू हुई, जबकि वार्ड संख्या चार की दुकान के लिए कोई बोली नहीं मिली।प्रशासन ने यह भी बताया कि लद्दाख में रेस्तरां से जुड़े 50 शराब परोसने वाले बार संचालित हैं। इनमें 38 लेह, सात नुब्रा, तीन जांस्कर और दो चांगथांग क्षेत्र में हैं। इसके अतिरिक्त लेह में दो बीयर बार भी संचालित हैं। प्रशासन का दावा है कि शराब लाइसेंस निर्धारित नियमों और शैक्षणिक तथा धार्मिक संस्थानों से दूरी संबंधी मानकों के आधार पर जारी किए जाते हैं।
इस बीच 27 अक्टूबर को लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा की अध्यक्षता में विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में आबकारी आयुक्त रोमिल सिंह डोंक, लद्दाख बौद्ध एसोसिएशन, ऑल लद्दाख गोम्पा एसोसिएशन और अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ शराब व्यापारियों के संगठन ALTOA के प्रतिनिधि भी शामिल हुए।बैठक में महिला प्रतिनिधियों ने लद्दाख को पूर्ण शराबबंदी वाला केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग रखी। उनका कहना था कि शराब की उपलब्धता बढ़ने से क्षेत्र की सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक पहचान और युवाओं के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने बार लाइसेंस की बढ़ती संख्या पर भी चिंता व्यक्त की।मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने कहा कि शराबबंदी जैसा महत्वपूर्ण फैसला सभी संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाना चाहिए। उन्होंने धार्मिक संगठनों, होटल व्यवसायियों, पर्यटन से जुड़े संगठनों और शराब कारोबारियों सहित सभी हितधारकों की राय लेने की आवश्यकता बताई। प्रशासन ने इस मुद्दे पर आपसी सहमति बनाने और संतुलित समाधान तलाशने पर जोर दिया।
लद्दाख की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। यहां देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। होटल, रेस्तरां, परिवहन और अन्य सेवाओं से जुड़े व्यवसाय पर्यटन पर निर्भर हैं। ऐसे में शराब कारोबार से संबंधित नियमों में बदलाव का असर लाइसेंसधारी प्रतिष्ठानों और उनसे जुड़े रोजगार पर पड़ सकता है। हालांकि, इससे होने वाले वास्तविक आर्थिक प्रभाव का आकलन अलग से करना आवश्यक होगा।दूसरी तरफ, सामाजिक संगठनों का तर्क है कि शराब की उपलब्धता और उससे जुड़े संभावित सामाजिक नुकसान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। महिला संगठनों ने विशेष रूप से नशे की समस्या, पारिवारिक जीवन और युवाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाया है। उनका मानना है कि लद्दाख की विशिष्ट सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को देखते हुए शराब नीति तैयार की जानी चाहिए।
इस विवाद के बीच पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी शराब नीति को लेकर प्रशासन की आलोचना की थी। उन्होंने शराब की दुकानों और बार के विस्तार का आरोप लगाया था। हालांकि, लद्दाख प्रशासन ने उनके कई दावों को गलत और भ्रामक बताते हुए कहा कि नई आबकारी नीति पहले ही वापस ली जा चुकी है।ताजा घटनाक्रम में महिला संगठनों ने 29 अक्टूबर को प्रशासन से लिखित आश्वासन मिलने के बाद अपना विरोध प्रदर्शन अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया। प्रशासन ने उनकी मांगों पर सहमति के बिंदुओं को अंतिम रूप देने के लिए एक सप्ताह का समय मांगा है। हालांकि, संगठनों ने स्पष्ट किया है कि शराबबंदी की उनकी दीर्घकालिक मांग अभी भी बरकरार है।
अब शराब व्यापारियों की निष्पक्ष आबकारी नीति की मांग ने इस बहस में एक और महत्वपूर्ण पक्ष जोड़ दिया है। व्यापारियों के हित, सामाजिक संगठनों की चिंताएं और प्रशासन की नियामक जिम्मेदारियां इस मुद्दे के तीन प्रमुख पहलू बनकर सामने आए हैं।फिलहाल लद्दाख में पुरानी आबकारी नीति लागू है। आने वाले दिनों में प्रशासन और विभिन्न संगठनों के बीच होने वाली बातचीत से यह स्पष्ट होगा कि शराब कारोबार के नियमों में कोई नया बदलाव किया जाएगा या पूर्ण शराबबंदी की मांग पर आगे विचार होगा। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रशासन सामाजिक चिंताओं और वैध व्यवसायों के हितों के बीच किस तरह संतुलन स्थापित करता है।